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कांग्रेस की आपसी रंजिश की वजह कहीं प्रदेश अध्यक्ष का पद तो नहीं ?

 विधानसभा चुनाव को देखते हुए पार्टी के हित में नहीं है यह स्थिति, कई नेता तलाश रहे हैं अपना राजनीतिक भविष्य

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Nitesh Ojha

Ranchi : लोकसभा चुनाव में हार के बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने नैतिकता का हवाला देते हुए जिस तरह से पद छोड़ने की पेशकश की, उसे देख कई राज्यों के प्रदेश अध्यक्ष भी उसी राह पर चल पड़े. जाहिर है, झारखंड प्रदेश अध्यक्ष डॉ अजय कुमार ने भी ऐसा करना ज्यादा उचित समझा. डॉ अजय के इस्तीफे के बाद प्रदेश कार्यकर्ताओं को चाहिए था कि वे अपनी कमियों को खोजते हुए आगामी विधानसभा चुनाव के तैयारी में सक्रिय हो जाते. कार्यकर्ताओं के पास अब ज्यादा समय भी नहीं है. लेकिन अभी भी प्रदेश स्तर का एक गुट डॉ अजय पर हार का सारा ठीकरा फोड़ कर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उन्हें राज्य की राजनीति से बाहर करने में लगा है.

सूत्रों की मानें, तो विरोध करने वाले गुट के पीछे वैसे कई नेता भी शामिल है, जो डॉ अजय के हटते ही प्रदेश अध्यक्ष पद पर बैठना चाहते है. बुधवार को कई जिला अध्यक्षों ने डॉ अजय के समर्थन में प्रेस कांफ्रेस कर उन्हें पद पर रहने की मांग तो की, साथ ही यह भी संकेत दे दिया कि विरोधी गुट के पीछे कोई और राजनीतिक ताकत काम कर रही है.

 चुनाव पूर्व ही विरोध की आवाज उठने लगी थी

ऐसा नहीं है कि डॉ अजय कुमार के खिलाफ  विरोध की आवाज उठने की स्थिति लोकसभा चुनाव के बाद शुरू हुई है. महागठबंधन बनने के बाद से लेकर सीट और टिकट बंटवारे को लेकर भी कई नेता उनके विरोध में खड़े थे. इसमें जामताड़ा  विधायक इरफान अंसारी, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रहे फुरकान अंसारी, पूर्व मंत्री ददई दुबे जैसे नेता शामिल थे. उस वक्त पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय के साथ भी उनके मतभेद की बातें अप्रत्यक्ष रूप से सामने आयी थी. लेकिन चुनावी माहौल को देखते हुए ऐसे नेता केवल अपनी टिकट के लिए ही डॉ अजय कुमार का विरोध करते दिखे थे. लेकिन चुनाव बाद पार्टी की जो स्थिति बनी, उससे इन नेताओं को खुलकर प्रदेश नेतृत्व के खिलाफ बोलने का मौका मिल गया.

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  जिला स्तरीय कार्यकर्ता भी उतरे विरोध में

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चुनाव में मिली हार के बाद पार्टी में काफी दबादबा रखने वाले एक नेता के जिला स्तरीय कार्यकर्ता अब डॉ अजय कुमार के खिलाफ उतर गये. यहां तक उन्होंने डॉ अजय कुमार को गैर झारखंडी बताते हुए राज्य की राजनीति से बाहर करने की मांग की. इस दौरान उन्होंने राहुल गांधी के नेतृत्व क्षमता पर तो भरोसा जताया, लेकिन उनके द्वारा प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किये गये डॉ अजय कुमार के खिलाफ ही धरने पर बैठ गये.

कभी थे साथ, अब दिख रहे विरोधी

सबसे बड़ी बात यह देखने को मिली, कि चुनाव पूर्व जिले के एक पद पर विराजमान रहने वाले एक नेता रांची से उम्मीदवार बने सुबोधकांत के साथ खड़े थे. उन्होंने उनके समर्थन में जमकर चुनावी रैलियां भी की. लेकिन वही नेता अब उनके खिलाफ दिख रहे है. इसकी पुष्टि तो प्रेस कांफ्रेस करने के दौरान भी स्पष्ट रूप से दिखी गयी. इसमें उन्होंने सुबोधकांत को  पार्टी की हार का एक कारण तो बताया ही, साथ ही डॉ अजय कुमार के खिलाफ धरने पर बैठे विरोधी गुट के पीछे एक राजनीतिक ताकत होने का भी संकेत दे दिया.

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गौण हो चुके नेताओं के लिए अध्य़क्ष पद ही एकमात्र सहारा

पार्टी के एक महत्वपूर्ण पद पर बैठे नेता ने नाम नहीं लिखने की बात कहकर बताया कि पक्ष-विपक्ष का सारा खेल प्रदेश अध्यक्ष के पद को लेकर है. जैसे ही डॉ अजय कुमार ने इस्तीफे की पेशकश कर राष्ट्रीय नेतृत्व के नक्शे पर चलने की पहल की, तो होना यह चाहिए था कि सभी कार्यकर्ता एकजुट होकर पार्टी की मजबूती पर काम करते. प्रदेश अध्यक्ष कोई रहे, लेकिन पार्टी की मजबूती सबसे पहली प्राथमिकता होनी चाहिए. लेकिन विरोध करने वाले गुट के आड़ में कई नेता अब अपने राजनीति भविष्य की तलाश कर रहे है.

दरअसल लोकसभा चुनाव में हार के बाद ऐसे नेताओं के राजनीतिक भविष्य दांव पर लग गया है. एक तो सोनिया गांधी के अध्यक्ष पद से हटते और राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने के बाद ही वे अपने आप को कमजोर मानने लगे हैं. ऐसे में  राज्य की राजनीति में बने रहने के लिए उनके पास एकमात्र सहारा केवल अध्यक्ष पद ही दिख रहा है.

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