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ट्रंप की भारत यात्रा के पीछे का असली खेल – ‘LEMOA’- ‘COMCASA’ – ‘BECA’

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‘LEMOA’- ‘COMCASA’ – ‘BECA’

Girish Malviya

आपको याद होगा कि ट्रंप पिछली बार पूर्वव्यस्तता का बहाना बनाकर मोदीजी द्वारा दिये गये गणतंत्र दिवस समारोह के आमंत्रण को ठुकरा चुके हैं. लेकिन हमने ध्यान नहीं दिया कि इस आमंत्रण को ठुकरा कर आखिर वह गए कहा थे?  वह गये थे सऊदी अरब!

दरअसल उस दौरे में सऊदी अरब ने अगले 10 वर्षों में अमेरिका से कुल 350 अरब डॉलर की खरीदारी की प्रतिबद्धतता जतायी थी और सऊदियों को तत्काल प्रभाव से हथियारों की खरीद का 110 अरब डॉलर का समझौता करना पड़ा.

ट्रम्प की यात्रा का एकमात्र मकसद बिजनेस है. दुनिया में सऊदी अरब के बाद हथियारों की खरीद करने वाला भारत दूसरा सबसे बड़ा देश है, 2016 में अमेरिका ने भारत को डिफेंस पार्टनर का दर्जा दे चुका है. पिछले 12 साल में भारत ने अमेरिका से 18 अरब डॉलर के हथियार खरीदे हैं.

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दौरे से पहले सुरक्षा मसलों की कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (सीसीएस) ने 2.6 अरब डॉलर की लागत से 24 एमएच 60आर मल्टीरोल हेलिकॉप्टर खरीदने की डील को मंजूरी दी. समुद्र में तैनात जहाजों को सबसे ज्यादा खतरा दुश्मनों की पनडुब्बियों से है.

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इन पनडुब्बियों के खिलाफ इन मल्टीरोल हेलिकॉप्टर की निगरानी और मारक क्षमता अहम सुरक्षा कवच है. सूत्रों के मुताबिक, इस करार पर दस्तखत के बाद एक साल के अंदर ही 4-5 हेलिकॉप्टर भारत को मिलने की उम्मीद है. इसके अलावा कम से कम 8 से 10 अरब डॉलर के रक्षा सौदों पर भी दोनों देशों के बीच चर्चा जारी है.

भारत द्वारा रूस से किया गया $400 मिसाइल प्रणाली का सौदा लगभग हो चुका है, लेकिन ट्रम्प इस सौदे को न करने का दबाव बना रहा है.

मोदी सरकार अपने पिछले कार्यकाल में ही देश की सम्प्रुभता को अमेरिका के हाथों गिरवी रखने का पाप कर चुकी है. 2018 में दिल्ली में भारत और अमेरिका के बीच टू प्लस टू की बैठक सम्पन्न हुई थी.

इस बैठक में भारत की तरफ से विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने भाग लिया. अमेरिका के विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री भी इस बैठक में भाग लेने के लिए भारत आये थे. इसके बाद इस कड़ी की अगली बैठक दिसंबर 2019 में वॉशिंगटन में हुई, जिसमें भारत की ओर से रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह व विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भाग लिया. इसमें एतिहासिक रक्षा सहयोग समझौते कॉमकासा को पर आगे बढ़ने की बात की गयी थी.

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भारत ने अमेरिकी दबाव में आकर 2018 में ही ‘कम्युनिकेशन कंपेटिबिलिटी ऐंड सिक्युरिटी अग्रीमेंट’ (कॉमकासा) पर हस्ताक्षर कर चुका है. कॉमकसा का समझौता भारत के संप्रभुता के लिए खतरनाक है. इसे पहले सिसमोआ (CISMOA) के नाम से जाना जाता था.

इसपर दस्तखत करने के बाद अमेरिका अपनी कंपनियों द्वारा सप्लाई किये गये हथियारों का समय  पर निरीक्षण करने का हकदार हो गया है, यानी वह जब चाहे मांग कर सकता है कि जिन हथियारों पर अमेरिकी संचार उपकरण लगे हैं, वह उनकी जांच करेगा. यह समझौता दोनों देशों के सैन्य बलों के संचार नैटवर्कों का आपस में जोड़ देगा भारत की कोई तकनीक सीक्रेट नहीं रह गयी है.

इसके अलावा लेमोआ यानी लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरंडम ऑफ एग्रीमेंट (Logistics Exchange Memorandum of Agreement :LEMOA) पर भी मोदी सरकार अमेरिका के आगे 2016 मे ही घुटने टेक चुकी हैं. लेमाओ समझौते के प्रावधानों के तहत अमरीका जब चाहे तब हिंदुस्तान के अंदर अपनी फौजों को तैनात कर सकता है.

अमरीकी सशस्त्र बलों को भारतीय नौसैनिक बंदरगाहों तथा हवाई अड्डों का अपने युद्ध-पोतों, जंगी जहाजों की सर्विसिंग, तेल भराई तथा उनके रख-रखाव के लिए इस्तेमाल करने की इजाजत इस समझौते के तहत दी गयी है.

यह भारत द्वारा शीत युद्ध के समय से अपनाये जाने वाले स्वतंत्र रुख और किसी सैन्य गठजोड़ में शामिल न होने की नीति से पलायन कर जाना है.

यूपीए सरकार पर भी इन दोनों समझौतों को मानने का दबाव बनाया गया था, लेकिन मनमोहन सरकार ने इस पर दस्तखत नहीं किये थे. तत्कालीन रक्षा मंत्री, ए के अंथनी ने इस संबंध में स्पष्ट रुख अपनाया था.

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इसे मोदी समर्थक भारत की कूटनीति कहेंगे, लेकिन LEMOA  और COMCASA पर हस्ताक्षर भारत की कूटनीतिक विफलता है, क्योंकि किसी शक्तिशाली देश जैसे अमरीका की गोद में बैठ जाने को कूटनीति नहीं कहते, कूटनीति का अर्थ होता है सभी देशों के साथ अच्छे सम्बंध बना के हर देश का अपने सामरिक हितों के पक्ष में इस्तेमाल करना.

 

भारत पहला गैर-नाटो देश है, जिसके साथ अमेरिका ने इस तरह का रक्षा करार किये हैं. बस एक समझौता ही बाकी है, जो बेसिक एक्सचेंज एंड कोऑपरेशन अग्रीमेंट फॉर जियो-स्पेशल कोऑपरेशन (BECA) है. जिसपर दोनों देशों के मध्य अगले महीने बातचीत होने की संभावना है.

ट्रम्प इस दौरे में चाहते हैं कि इन समझौतों के मद्देनजर मोदी रूस के साथ अपनी हथियारों की डील पूरी तरह से रद्द कर दे. इसके लिए अमेरिकी सरकार ने काउंटरिंग अमेरिकाज एडवर्सिरीज थ्रू सेक्शंस यानी काटसा नाम का यह कानून भी पारित किया है, जो उन देशों को धमकाने के लिए है, जो रूसी हथियार खरीदने की हसरत रखते हैं.

अमेरीका के लिए सैनिक रणनैतिक गठबंधन अपने साथी देशों पर अपना नियंत्रण और दबदबा ज़माने का एक ज़रिया रहा है. जो भी देश अमेरीका के साथ सैनिक रणनैतिक गठबंधन बनाता है, उसे इसकी बहुत भारी क़ीमत चुकानी पड़ती है.

अमेरीका द्वारा पाकिस्तान, मिस्र  और तुर्की में हर दखलंदाजी और उन देशों को अस्थिर बनाये जाने का अनुभव साफ़ दिखाता है  कि जो देश अमरीका के साथ सैनिक रणनैतिक गठबंधन बनाता है, उसके लोगों का क्या हश्र होता है.

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