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लोकतांत्रिक आत्मा की स्वतंत्रता का सवाल

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FAISAL  ANURAG

देश के जानेमाने चिंतक प्रताप भानु मेहता ने एक चैनल के कार्यक्रम में लोकतंत्र के संकट और उम्मीदों पर चर्चा करते हुए एकबार उस राजनीतिक नैरेटिव को उन सवालों की ओर मोड़ा है, जो पुलवामा घटना के पहले  पक्ष विपक्ष की राजनीति पर हावी था. मेहता ने सरकार के कामकाज के पांच साल पर कोई रिपोर्टकार्ड नहीं पेश किया. लेकिन उन प्रश्नों को उठाया जो पिछले कुछ समय से समाज के विभिनन तबकों के भीतर से उठता रहा है. ये ऐसे सवाल हैं जिस पर वर्तमान

शासक दल असहज होता है. पुलवामा के बाद भारतीय जनता पार्टी माहौल को उन तमाम सवालों से परे ले जाने का प्रयास कर रही है जिसे लेकर पिछले पांच सालों में समाज के विभिन्न तबके आंदोलनरत रहे हैं. इसमें किसान, छात्र,  बेरोजगारों के साथ समाज के वंचित समाजों के समूह हैं.

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सामाजिक कल्याण की योजनाओं के साथ नोटबंदी और कृषि संकट के राजनीतिक प्रभावों की चर्चा भी मेहता ने की है. जाहिर है कि इन सवालों पर पिछले चार सालों से न केवल बडे बडे आंदोलन हुए हैं बल्कि इसके प्रभावों को बेरोजगारी और कुछ महत्वपूर्ण सेक्टरों में आये आर्थिक ठहराव के रूप् में भी चिन्हित किया जाता रहा है. हालांकि सरकार इन आरापों को न केवल खारिज करती रही है, बल्कि अपनी योजनाओं और नोटबंदी को बडे आर्थिक प्रभाव के रूप में पेश करती रही है. बावजूद इसके इन सवालों ने असंतोष को बड़े पैमाने पर पैदा किया है. और इन असंतोषों से निपटने के लिए सरकार कुछ फौरी राहत देने की घोषणा करती रही है. इन घोषणाओं के बावजूद देखा गया हे कि इन कारणों ने बड़े पैमाने पर राजनीतिक प्रभाव पैदा किये हैं. और उसका चुनावी असर भी दिखा है, जिसने भाजपा को परेशान किया है.

इन सवालों के अतिरिक्त आरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के लूट पर भी असंतोष देखा जा सकता है. आरक्षण पाये समूहों के बीच यह अंदेशा गहरा गया है कि उनके इस अधिकार पर लगातार खतरा पैदा हो रहा है. इन समूहों की बेचैनी का परिणाम यह है कि इस समाज को प्रभावित करनेवाले गैर दलीय राजनीतिक समूहों ने   संविधान और लोकतंत्र पर खतरे के विमर्श को व्यापक बना दिया है. इन समूहों की गतिविधियों को नकारने की ताकत किसी भी राजनीतिक दल में नहीं हैं. अगर यह नारजगी बनी रही तो इसका असर लोकसभा के चुनाव पर पडेगा.

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कुछ ताकतें इस असंतोष को कम करने के लिए अलग तरह की रणनीति को अमल में ला रही हैं. जिसमें इन समूहों के तर्का के खिलाफ ऐसे विमर्श खडा करने की कोशिश है, जो भावनातमक रूप से इन समहों को व्यापक रूप से एकजूट नहीं होने दे. इस रस्साकशी में इन समूहों की नारजगी पूरी खोमोशी के साथ है और माना जा रहा है कि चुनाव में यह खामोशी एक बडी भूमिका का निर्वाह कर सकती है. पुलवामा के भाजपा की तमाम कोशिशों के बावजूद देखा जा रहा है कि यह खामोशी अपना खतरा बनाये हुए है.

प्रताप भानू मेहता ने लोकतंत्र के संकट पर एक बेहद गंभीर बात कही है जिसे नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है. उन्होंने कहा है कि हमारे लोकतंत्र के साथ कुछ ऐसा हो रहा है जिससे लोकतांत्रिक आत्मा को खतम कर रहा है. हम गुससे से उबलते दिल, छोटे दिमाग और संकीर्ण आत्मावाले राष्ट्र के रूप में निर्मित होते जा रहे हैं. कुछ मामले में लोकतंत्र आजादी और उत्सव का नाम है. ऐसी व्यवस्था में लोग कहां जायेंगे, यह जानना महत्वपूर्ण होता है, न कि पीछे कहां से आये हैं, ये जानना जरूरी होता है.

मेहता की बाते बेहद तल्ख हैं. लेकिन वे आत्म मूल्यांकन करने की जरूररत पर भी बल देती हैं. उन्होंने संविधान और संस्थानों की स्वतंत्रता के सवाल को भी गंभीरता से उठाया है. मेहता ने उन तबकों की आवाज को ही उठाया है, जो पिछले कुछ सालों से विभिन्न विमर्शों से उइते रहे हैं. और समाजों में इसे ले कर भारी तल्खी और बेचैनी है.

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