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चुनावों में कामयाब कोई भी हो, हारता मतदाता ही है, क्योंकि उसके सवालों को चुनावों बाद राजनीतिक दल भूल जाते हैं

हर चुनाव के पहले जन घोषणापत्र जारी करने वाले एनजीओ भी साध लेते हैं चुप्पी

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pravin kumar

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राज्य में बेटियां बेची जा रही हैं. बहू हत्याएं हो रही है. बच्चों को स्कूल में दाखिला से ज्यादा जरूरी साइकिल से कोयला ठेलना है. जेंडर औसत बदल रहा है. कभी अबरख की चमक से इलाके की आर्थिक संरचना मजबूत थी.

अब तो खेती का भी संकट है. राज्य की खेती आज भी मनसून पर निर्भर है. साथ ही जंगल और जमीन से बेदखली जारी है. लैंड बैक, पांचवीं अनुसूचि, टीएसपी के पैसे से रोड, जेल, एयरपोर्ट बने हैं.

फिर भी गांव के लोग चुओं से प्यास बुझा रहे हैं. वन कानून का लाभ ग्रमीणों को नहीं मिल रहा है. राज्य में नये तरह की महाजनी का आतंक है. मृत पशुओं के नाम पर इंसानों की हत्या की जा रही है.

नक्सल की आड़ में ग्रामीण  क्षेत्र का विकास की अनदेखी जारी है. उस पर राजनीतिक प्रक्रिया में धनपशुओं का बोलबाला. जहां पक्ष और विपक्ष दोनों के उम्मीदवार कॉरपरेट तय कर रहे है. ग्रामीण अपनी पीड़ा सुनायें तो किससे.

सामाजिक संगठनों और एनजीओ का कार्य जन घोषणा पत्र तैयार कर गांव के मुद्दे को प्रमुखता से डठाते हैं और राजनीतिक दलों तक उसे पहुचाते भी हैं. राजनीतिक दल उन सवालों को अपने एजेंडा में शामिल करें या नहीं, यह उनकी प्राथमिकता है.

लेकिन जिस तरह जनप्रतिनिधि और राजनीतिक दल अपने एजेंडे को चु़नावी कामयाबी के बाद भूल जाते हैं, वैसे ही सिविल सासाइटी भी उन सवालों को ले कर राजनीतिक दलों से दो चुनावों के बीच कोई संवाद नहीं करता है.

पूरे इलाके में एक किस्म की समानांतर प्रक्रिया भी है. जिससे हर वोटर प्रभावित है. इस तरह के हालात में रोजी और रोटी का सवाल कौन उठायेगा.

मुबई और सूरत भागनेवालों की संख्या बढ़ रही है. गांवों में जवानों की संख्या कम दिखती है. ऐसे हालात में राजनीति का मतलब हो गया है कि लोग केवल वोट के लिए हैं. जिससे वे अपनी हारजीत तय करते हैं.

लेकिन आम अवाम का मुद्दा देश में चुनाव दर चुनाव हारता जा रहा है. राजनीतिक प्रक्रिया में इस हार को न तो समझने की कोशिश की जाती है और न ही जनमानस में कोई रोष पनप रहा है.

चुनाव बना प्रबंधन कौशल का खेल, राजनीतिक दलालों ने पूरी प्रक्रिया को किया कब्जा

जनता की बेरूखी के बारे में सोचने से कतराने की राजनीतिक प्रक्रिया का नुकसान यह हो रहा है कि आर्थिक और सामाजिक रूढ़ियों पर न तो कोई बहस होती है और ही इसके निदान का सामाजिक अभिक्रम चलता है.

जिसे कभी अभ्रकांचल का गौरव हासिल था उसकी यही दशा है. गांवों में मामूली बीमारियां मौत का कारण बन रही हैं. भूख से मौत हो रही है और मॉब लिचिंग का लोगो को शिकार बनाया जा रहा है.

ऐसे में ग्रामीण अंचल में नेताओं के वायदों पर भरोसा करना मुश्किल हो रहा है.

क्या सोचते हैं झारखंड के ग्रामीण अंचल के मतदाता

झारखंड के ग्रामीण अंचल के लोग उन नेताओं के बारे में ही सोचते हैं जो उनके साथ कभी-कभार किन्हीं मुद्दों पर साझापन कर ले. इस तरह के माहौल में ग्रामीण अंचल में सोचने का अलग-अलग तरीका बन गया है.

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एक ही लोकसभा क्षेत्र में दो हिस्सों के लोग अब एक तरह से नहीं सोच पा रहे हैं. राजनीतिक तौर पर इस तरह के हालात पर सोचने व विचार करने लगे हैं कि आखिर चुनाव भी राजनीतिक सक्रियता से ज्यादा प्रबंधन का कौशल कैसे बन गया है. राजनीतिक दलालों ने पूरी प्रक्रिया पर कब्जा जमा लिया है.

वहीं दूसरी ओर इन राजनीतिक प्रबंधकों का मानना है कि जिस तरह की बेरोजगारी है, उसमें उन्हें प्रचार करने लायक कार्यकर्ता मिल जाते हैं. वैसे कार्यकर्ता कहना इस शब्द की गरिमा को भी कम करना है.

आखिर इस इलाके में राजनीतिक प्रबंधन के इस दौर का इतना प्रभावशाली हो जाने के पीछे के सामाजिक आर्थिक समीकरणों को कौन खंगालेगा. क्षेत्र के प्रबुद्ध लोग यह सवाल उठाते हैं. लेकिन उनमें भी ज्यादातार इस प्रबंधकीय राजनीति के हिस्सेदार बनने से बच नहीं पाते हैं.

लेकतंत्र की चुनौती यह है कि जिस तरह की प्रबंधकीयता का प्रसार सुदूर इलाकों तक जारी है. उससे जनभागीदारी प्रतीकात्मक भर ही है.

राजनीतिक दल कॉरपोरेट एजेंडे से घिरते जा रहे हैं

राज्य में हो रहे लोकसभा चुनाव में सामाजिक मुद्दे गौण होते जा रहे हैं. पार्टिया जो कारपारेट एजेंडे से घिरती जा रही हैं. ऐसे में चुनाव लड़ रहे राजनीतिक दलों के बीच जन सरोकर के सवालों और मुद्दों का महत्व निरंतर कम हो रहा है.

खास कर उन दलों के बीच जो कि सत्ता के दावेदार हैं. बावजूद अवाम लगातार तकलीफों में डूबा है.

उसके सामाजिक अंतरविरोध तीखे हो रहे हैं. औद्योगिक विफलता के संकट के दैर में आज कई नकारात्मक सामाजिक संदर्भ पैदा हो रहे हैं.

साथ ही कृषि ठहराव और व्यापार के बदलते मिजाज के कारण पूरे ग्रामीण अंचल के सोचने का तरीका भी बदला है.

नवजवान ग्रामीण अंचल तो और भी अलग तरीके से समझ-साख विकसित कर रहा है. ऐसी स्थिति में राजनीतिक आकलन के लिए उन्हीं समीकरणों का सहारा है जिस तरह खदानों से कोयला या अन्य खनिज लेने के बाद उसे मरने के लिए गड्ढों के रूप में छोड़ दिया गया है कुछ उसी तरह चुनाव में भी दिख रहा है.

राज्य की राजनीति में सबसे खराब दशा महिलाओं का

झारखंड के कई इलाकों में महिलाओं की सबसे खराब स्थिति हैं. गिरीडीह से ले कर कोडरमा तक फैले ठगी विवाह के रैकेट का न तो परदाफाश होता है और न ही उसे रोकने के लिए कोई राजनीतिक एकजुटता बनती है.

आदिवासी अंचल में बालिका मानव तस्करी जैसे सवाल पर राजनीतिक हस्तक्षेप का अभाव दिख रहा है. इस विषय को हिंसक रास्ते पर चलनेवाले प्रतिबंधित संगठनों ने भी हल करने की पहल नही की.

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बल्कि हिंसक संगठनों ने इसे आय का जरिया बना लिया है. चुनाव के बाद नेता जीत जायेंगे. लेकिन इन सवालों पर राजनीतिक पहल कब होगी यह दूर तक नही दिखायी देता है.

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