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लोकपाल नियुक्ति में प्रावधानों को किया गया दरकिनार, अब फरियादी पहुंचे हाइकोर्ट

Ranchi : मनरेगा (ग्रामीण विकास विभाग) ने 20 जिलों के लिए लोकपाल का नाम फाइनल कर लिया है. 24 सितंबर को इस संबंध में राज्य के 4 जिलों को छोड़ बाकी जिलों के लिए एक-एक नाम की घोषणा की. सिमडेगा, रांची, पलामू, साहेबगंज, पाकुड़, खूंटी, रामगढ़, हजारीबाग, बोकारो, कोडरमा, गिरिडीह, चतरा, लातेहार, गढ़वा, पश्चिमी सिंहभूम, पूर्वी सिंहभूम, गोड्डा, दुमका, धनबाद और देवघर जैसे जिलों के लिए इंटरव्यू के आधार पर लोकपाल तय हुए हैं. इनमें से किसी जिले के लिए तय नाम पर लोगों से 25 अक्टूबर तक आपत्ति भी मांगी गयी है. पर इसकी समूची प्रक्रिया पर ही अब सवाल उठाये जा रहे हैं. लोकपाल की रेस में शामिल रहे अभ्यर्थियों ने प्रावधानों के उल्लंघन का हवाला दिया है. केंद्र सरकार द्वारा इस संबंध में निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं करने की शिकायत की है. अब हाइकार्ट में इसे चैलेंज कर दिया गया है.

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एक से अधिक जिलों के लिए डाले गये आवेदन

लोकपाल के लिए आवेदन करनेवालों में शामिल अरविंद सिंह (चतरा), लक्ष्मी प्रसाद (लोहरदगा), डॉ प्रभाकर कुमार (बोकारो) सहित अन्य अभ्यर्थियों ने पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता बरते जाने की मांग कोर्ट से की है. विभाग को आपत्ति भी भेजी है. कहा है कि ग्रामीण विकास विभाग द्वारा लोकपाल के लिए जारी विज्ञापन के मुताबिक आवेदकों से किसी एक ही जिले से आवेदन करने को कहा गया था. पर कई ऐसे कैंडिडेट हैं जो निवासी किसी और जिले के हैं पर उनका चयन दूसरे जिले के लिए हुआ. 8 ऐसे कैंडिडेट हैं जो उस जिले से आवेदक ही नहीं हैं. बल्कि वहां से सिंगल आवेदन ही पड़ा. गोड्डा के लिए चयनित पूनम कुमारी दुमका की निवासी हैं. इसी तरह से अरुणाभ कर (पूर्वी सिंहभूम) पश्चिमी सिंहभूम के निवासी हैं. सुशील कुमार तिवारी (लातेहार) गढ़वा में रहते हैं. संतोष कुमार पंडित (चतरा) गढ़वा के, धरणीधर प्रसाद सिन्हा (कोडरमा), गिरिडीह के, रेणु वर्मा (बोकारो) गिरिडीह की, डॉ सुदेश्वर प्रसाद सिंह (रामगढ़) हजारीबाग के, विनोद प्रमाणिक (पाकुड़) साहेबगंज से हैं. इन्होंने अपने अपने जिले के लिए आवेदन किया था, पर उनका दूसरे जिले के लिए नाम लोकपाल के तौर पर तय कर दिया गया. बाकी फाइनल कैंडिडेट ने अपने अपने जिलों से ही आवेदन किया था.

20 में से 13 जिले ऐसे हैं जहां योग्यता की उपेक्षा किये जाने की शिकायत हो रही है. जिनके पास संबंधित फील्ड में अधिकतम योग्यता है, उसे दरकिनार किया गया है. 13 जिलों में 70 फीसदी चयनित कैंडिडेट वकालत के पेशे से हैं. उन्होंने चयन होने पर कोर्ट में प्रैक्टिस नहीं किये जाने संबंधी अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) नहीं लगाया है. ऐसे में लोक प्रशासन, सामाजिक कार्यकर्ता, एकेडमिक और प्रबंधन क्षेत्रों से जुड़े उच्चतर योग्यता धारकों को मौका नहीं मिल सका. जबकि उच्च डिग्री धारकों, कार्यानुभव रखने वालों को प्राथमिकता दिये जाने की बात विज्ञापन में कही गयी थी. पलामू का एक केस सामने आया है जिसमें ग्रामीण विकास में डिग्री और कार्यानुभव रखने वाले कैंडिडेट को छोड़ कर सामान्य ग्रेजुएट और राजनीतिक संगठन से जुड़े एक अभ्यर्थी को चुन लिया गया है. ऐसा ही कुछ केस दूसरे जिलों से भी है.

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प्रक्रियाओं का उल्लंघन

मनरेगा लोकपाल की नियुक्ति के लिये गठित चयन समिति में विकास आयुक्त को चेयरमैन बनाया गया था. साथ ही इसमें ग्रामीण विकास सचिव, पंचायती राज सचिव, जेएसएलपीएस की सीईओ को रखा गया था. इसके अलावा केंद्र से एक अधिकारी भी ऑनलाईन जुड़े हुए थे. अभ्यर्थियों के मुताबिक लोकपाल चयन के लिए तय शर्तों का इसमें उल्लंघन हुआ है. इंटरव्यू प्रक्रिया के दौरान अभ्यर्थियों से एक संक्षिप्त लिखित परीक्षा ली गयी. अभ्यर्थियों के मुताबिक ग्रुप डिस्कशन कराया गया. सर्टिफिकेट जांच, इंटरव्यू के आधार पर मार्किंग की गयी. नियमानुसार ऐसा करने की बजाय हर जिले से प्राप्त आवेदनों के लिए एक पैनल बनाकर सर्टिफिकेट (योग्यता, कार्यानुभव) के आधार पर मेधा लिस्ट तैयार करनी थी.

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