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झारखंड की चुनावी सभाओं में तथ्यों को तोड़ने-मरोड़ने की पुरानी परिपाटी को ही दोहरा गये प्रधानमंत्री

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Faisal  Anurag

टाना भगतों पर सत्याग्रह का प्रभाव गांधी के कारण था या टाना भगत के आंदोलन के बाद टाना भगतों के सत्साग्रह के प्रति उनकी प्रतिबद्धता बढ़ी. इस सवाल को नरेंद्र मोदी ने खूंटी के चुनावी भाषण से फिर जीवंत कर दिया है. है. वैसे तो भारतीय जनता पार्टी और खास कर नरेंद्र मोदी इतिहास के पुनर्लेखन के क्रम में कई तथ्यों के साथ गलतबयानी करते रहे हैं.

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उनकी राजनीति उस इतिहास की तलाश है जो उनके लिए अनुकूलता प्रदान करे. आजादी की लड़ाई के संदर्भ में ऐसी अनेक बाते पिछले दिनों की गयी हैं, जिनका सीधा संबंध  मान्य ऐतिहासिक तथ्यों को झूठा बताना है. टाना भगत के संदर्भ में मोदी ने गांधी के उस प्रभाव की चर्चा की है.

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इतिहास का यह तथ्य है कि गांधी के अफ्रीका से वापस आने के पहले ही जतरा टाना भगत के नेतृत्व में उरांवों के सत्याग्रह संघर्ष की नींव पड़ी थी. और जिसका व्यापक सामाजिक सांस्कृतिक प्रभाव भी पड़ा था. इस तथ्य का कोई प्रमाण आदिवासी इतिहास में उपलब्ध नहीं है कि जतरा टाना भगत का शांतिपूर्ण सत्याग्रह गांधी के प्रभाव के कारण था.

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वस्तुस्थिति यह है कि जतरा टाना भगत ने आदिवासी विरासत से ही संघर्ष की प्रेरणा ली थी. और उनके पूर्ववर्ती बुधु भगत के आंदोलन का उन पर गहरा प्रभाव था. इसके अलावे सरदारी आंदोलन ने भी शांतिपूर्ण सत्याग्रह की एक ऐसी परंपरा की नींव डाली थी. जिसकी मिसाल भारतहीय इतिहास में अनोखी ही है.

आदिवासी आंदोलनों की एक धारा ने ऐसे आंदोलनों की विरासत दी है, जिसमें हिंसा का निषेध रहा है. आदिवासी इतिहास के जो मौखिक स्रोत हैं. उनमें इस बात की पुश्टि होती है.

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आदिवासी आंदोलन जरूर स्थानीय सवालों के कारण परवान चढ़ें हैं, लेकिन उनका संदर्भ व्यापक रहा है.  जिसमें साम्राज्यवाद और सामंतवाद के विरोध के पहलू अंतरनिहित हैं. तिलका मांझी ने भले ही साम्राज्यवाद टर्म का उल्लेख नहीं किया लेकिन उन्होंने जिस आंदोलन का नेतृत्व किया उसका भी मूल स्वर साम्राज्यवाद के खिलाफ था.

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अब तो जानेमाने इतिहासकार भी मानने लगे हैं कि संताल हूल ने पहली बार भारत में स्वतंत्रता आंदोलन की नींव डाली. और 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अनेक नायक उससे प्रभावित थे. कई इतिहासकारों ने यह लिखा भी है कि 1857 के संग्राम में संदेश भेजने के जिन साधनों का इस्तेमाल किया गया उसे संताल हूल से लिया गया था.

सावाल्ट्रन इतिहासकारों ने इसे प्रमाणित करने का प्रयास किया है. हालांकि यह अभी भी बहस का विषय है. लेकिन झारखंड के आदिवासियों की साम्रज्यवाद विरोधी चेतना को कोई मान्यता प्राप्त इतिहासकार भी नकारता नहीं है. अब तो साहित्य की अनेक विधाओं को जब से इतिहास के कच्चे स्रोत के रूप में इस्तेमाल करने की प्रवृति बढी है, आदिवासी इतिहास के मौलिक संघर्षों और उसके योगदान की चर्चा की भी मांग होने लगी है.

नरेंद्र मोदी के बारे में कहा जाता है कि वे इतिहास के अनेक तथ्यों के साथ तोड़-मरोड़ करते हैं. कर्नाटक के चुनाव के समय भी नरेंद्र मोदी ने भगत सिंह ओर नेहरू का विवाद खड़ा किया था. हालांकि उन्होंने नेहरू का नाम तो नहीं लिया था, लेकिन उनके आरोप उन्हीं पर थे. मोदी के भाषण के कुछ घंटों के बाद ही अनेक इतिहासकारों ओर जानकारों ने उन सारे दस्तावेजो को सार्वजनिक कर दिया था, जिसमें भगत सिंह से जेल में नेहरू की मुलाकाल के तथ्य थे.

मोदी और भाजपा के अन्य नेता उन तमाम विरासतों पर कब्जा करने के प्रयास में हैं, जिसके साथ उनका कोई ऐतिहासिक संबंध नहीं रहा है. इस संदर्भ में टाना भगत के नाम के उल्लेख को भी देखा जा सकता है.

जंगल ओर जमीन पर जनहक के सवाल पर ही सारे आदिवासी आंदोलनों की नींव पड़ी. और उन्होंने इतिहास में  अपनी छाप छोड़ी है. कारपारेट राजनीति के जिस एजेंडा को अभी लागू किया जा रहा है, उसमें सबसे ज्यादा निशाना जंगल ओर जमीन पर ही है. मोदी ने यह भी कहा कि भाजपा के रहते आदिवासियों की जमीन और  जंगल पर कोई खतरा नहीं है.

लेकिन झारखंड की भाजपा सरकार ने ही आदिवासियों की जमीन के संरक्षण के लिए बने कानून सीएनटी एक्ट और एसपीटी एक्ट में संशोधन करने का प्रयास किया. मोदी अपने भाषण में कह रहे हैं कि झारखंड के लोग 370 के हटने के साथ हैं. क्योंकि वे कश्मीर का पूर्ण विलय चाहते हैं. लेकिन तथ्य यह है कि 370 खत्म किये जाने के बाद भाजपा सांसद निशिकांत दूबे के नेतृत्व में जिस तरह सीएनटी और एसपीटी एक्ट खत्म किये जाने की बात की गयी है, उससे आशंका का माहौल गहरा हुआ है.

आदिवासी इलाकों में 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को अपेक्षाकृत कम वोट मिले. इसका दंश उसे सता रहा है. आदिवासियों के लिए सुरक्षित पांच लोकसभा क्षेत्रों में से दो पर वह चुनाव हार गयी. और जिन तीन सीटों पर उसे जीत मिली उसमें उसका अंतर बेहद कम रहा. विधानसभा चुनाव में भाजपा आदिवासियों के लिए सुरक्षत 28 सीटों को लेकर चिंतित है. प्रधानमंत्री ओर अमित शाह के भाषण में इस चिंता के अक्स दिखायी पडते हैं.

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Mayfair 2-1-2020

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