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गिरती अर्थव्यवस्थाः रोग की पहचान के बिना स्थाई इलाज की कवायद बेमानी साबित हो सकती है

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Faisal Anurag

शरीर में आ रहे किसी भी तरह की अनियमितता या बदलव का फौरी इलाज राहत तो दे सकता है लेकिन वह मर्ज के प्रभावों के विस्तार ओर नुकसान को रोक नहीं सकता. यदि कोई लगातार बुखारग्रस्त है ओर साथ ही कुछ अन्य दिक्कतें भी हमसूस कर रहा होता है तो क्रोसीन उसे तात्कालिक राहत शयद दे दे. लेकिन उससे निदान नहीं मिलता. यदि उसकी मुकम्मल जांच नहीं होगी तो शायद ही वह व्यक्ति स्वस्थ हो सकेगा और मौत को रोक पाये. कैंसर के भी कई लक्षणों के साथ बुखार का बने रहना एक अहम लक्षण है.

केवल बायोप्सी से पता चलता है कि कैंसर है या नहीं. यदि है तो कोन सा कैंसर है. इस जांच के बाद ही मरीज को स्वस्थ्य करने के लिए एंटी बॉडी, कीमोथेरेपी और रेडियेसन की मात्राएं और साइकिल तय की जाती है. यदि बीमारी की पहचान ही न हो तो मरीज मरने के लिए बाध्य है. अभी इकोनामी की हालत भी इसी बुखरग्रस्त मरीज की तरह है. और उसे क्रोसीन दे कर राहत पहुंचाने की कोशिश की जा रही है.

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आर्थिक विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत की इकोनामी का संकट स्कट्रक्चरल है. यह सरकार के केजुअल नजरिये के साथ गलत नीतियों के कारण गहराता जा रहा है. राजकीय दबाव से इस तथ्य को झुठलाया नहीं जा सकता है. मोदी सरकार की समस्या यह है कि वह हालात को स्वीकार नहीं करती है. और विशेषज्ञों के सुझाव को ठुकरा देती है. नीतियों के आलाचकों को देशद्रेही बताने का प्रचलन सामान्य नहीं है. यह बिना किसी सरंक्षण के संभव ही नहीं है. यह भारत की पहली सरकार दिखती है जो हर सही गलत कदम को प्रभावी बताने के लिए ग्राउंड रियलिटी की तुलना में प्रोपेगेंडा का सहरा लेती है. मोदी सरकार वाजपेयी सरकार के अनुभवों से भी कोई सीख लेने से परहेज करती है.

इस सरकार के अनेक लोग उस सरकार में भी प्रभावी थे. और शाइनिंग इंडिया के मिथ्या चमक में चुनावी हार का शिकार हुए थे. मोदी-शाह की भाजपा ने चुनाव में जीत के लिए जो तरीका अपनाया है, उससे सामाजिक सांस्कृतिक दुष्प्रभाव के साथ आर्थिक जगत में भारी खलबली है. डर का माहौल तो बनाये रखा जा सकता है लेकिन वह किसी अच्छे परिणाम की ओर नहीं ले जाता है.

यही कारण है कि दुनिया भर के अर्थज्ञाता भारत के विकास संबंधी आंकडों को संदेह के नजरिये से देखते हैं. और वास्तविक आंकडों तक पहुंचने के लिए कई दूसरे तरीके अपनाते हैं. प्रधानमंत्री मोदी के पूर्व आर्थिक आर्थिेक सलाहकार अरविंद सुब्रहमण्यम तो इस्तीफा देने के बाद आंकडों के फर्जीवाड़े को ले कर शोर मचा रहे हैं.

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इस संदर्भ में कुछ ऐसे भी अर्थशास्त्रियों को याद किया जा सकता है जो मुक्त विश्व बाजार और और ग्लोबल इकोनामी के दौर को प्लेइंग लेबल फील्ड बताया था. लेकिन उसके प्रभावों को आंकने के बाद कुछ सालों बाद अपनी ही अवधारणाओं को गलत बता दिया. कुछ अर्थशास्त्री लगतार बढ़ती आर्थिक विषमता को बड़ी समस्या बता रहे हैं. जानकार जानते हैं कि यह सब नीतियों के परिणाम हैं.

2008 के जमाने में जब मंदी से भारत संघर्ष कर रहा था तो हालात की गंभीरता पर सरकार खुली बहस का सम्मान करती थी. अब हालात बिल्कुल अलग हैं. मुख्यधारा मीडिया में केवल सरकार का पक्ष ही प्रमुखता से रहता है. वास्तविक हालात की चर्चा कभी-कभार ही फुटनोट की तरह कर देने की रस्म की तरह होती है. भारत का संकट इस बार अधिक गंभीर है. शिवम बिज ने लिखा है कि यह सरकार की नीतियों के कारण ही है. उन्होंने अपने लेख में इसके लिए सरकार की 10 नीतियों और तरीके की चर्चा की है.

जिसके कारण हालात गंभीर हुए हैं. शिवम बिज ने अपने आलेख का शीर्षक दिया है- भारत के आर्थिक संकट का कारण केवल एक है मोदी का कमजोर नेतृत्व. यह बेहद सख्त शीर्षक है. मोदी सराकार को कठोर फैसला लेने वाला माना जाता है. लेकिन आर्थिक प्रबंधन में उनकी कमजोरी साफ दिखती है. उनके हिसाब से इस संकट के कारण को गंभीरता से विवेचना करने की जरूरत है.

वे मानते हैं कि इसके लिए अनेक कारण हैं जिनमें कुछ प्रमुख हैं: बैंकिंग सेक्टर के संकट को बढ़ने देना, ठप पड़ी परियोजना, नीति के नाम पर शोरशराबा और तमाशा खड़ा करना, नोटबंदी, बिजनेस का तिरस्कार, जीएसटी का घालमेल, एनबीएफसी संकट के लिए तैयार नहीं रहना और समय पर नहीं निपटना,  मुद्रस्फीति की नीति, निवेश विषयक नीति, अर्थ शास्त्रियों पर नौकरशाहों को तरजीह, प्रभावी नियंत्रण की मानसिकता, टैक्स टेरर, आंकडों का फर्जीवाड़ा, तथ्यों और सच्चाई को नकारने की प्रवृति, बजटीय दिशाहीनता. ये कुछ ही लक्षण हैं. यदि आर्थिक ढांचे को गहराई से खंगाला जाये तब ही कोई रास्ता निकल सकता है. लेकिन इसके लिए अर्थक्षेत्र के विशेषज्ञों को महत्व देना होगा. और उनके सुझाव व अनुकूल नीतियों को अपनाना होगा. साथ ही कुछ कारपारेट को हर तरह की मदद देने की प्रवृति से बाहर निलना होगा.

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