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देशभर में उभरते नये ‘शाहीनबाग’ इमरजेंसी की भयावहता की यादें ताजा कर रहे हैं

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Faisal  Anurag

शाहीनबाग की आग जैसे-जैसे रोशन हो रही है, देश के शहर दर शहर प्रतिरोध और लोकतंत्र के सेलिब्रेशन के केंद्र बन उभर रहे हैं. औरतें लोकतंत्र की बेमिसाल व्याख्या का केंद्र बन कर एक ऐसे देश में उभरी हैं, जहां सामंती संस्कारों की जड़ मान्यताओं की वे शिकार रही हैं.

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पांचवीं सदी के बाद आजाद हुए देशों में लोकतंत्र का एक नया उभार पिछले साल भर से दिख रहा है. इस उभार के केंद्र में युवा और महिलाएं हैं. युवा आंदोलन तो पहले भी कई बार दुनिया को बदलने की दिशा में कारगर रहे हैं.

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लेकिन पिछले साल भर से जो दिख रहा है वह कई अर्थो में बिल्कुल नयापन लिये हुए है. इन आंदोलनों की रचनात्मकता तो बेहद नायाब है. राजनीतिक सवालों पर हो रहे आंदोलन हर दिन क्रिएटिविटी का नया रिकार्ड बना रहे हैं. दुनिया के हर हिस्से में इन आंदोलनों के बीच कई तरह की समानता भी है.

हांगकांग और फ्रांस के युवा आंदोलन ने नयी ताजगी के साथ  दुनिया भर में अर्थव्यवस्था, असमानता, स्वायत्तता और इकोलोजी के सवाल को राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बना दिया. फ्रांस में इस आंदोलन में मजदूरों की भागीदारी के बाद आंदोलन का तेवर और प्रभावी होता गया.

हांगकांग लोकतंत्र के लिए आंदोलन की एक ऐसी मिसाल बना है, जहां युवाओं ने सत्ता को गंभीर चुनौती दी है. लेबनान के युवा आंदोलन भी कई अर्थों में अलग हैं. अफ्रीका और उत्तरी अमरीका के कई देशों के छा़त्रों ओर युवाओं के आंदोलनों ने सत्ता को बड़ी  चुनौती दी है. और विश्व राजनीतिक को भी प्रभावित किया है.

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भारत का आंदोलन नगरिकता के सवाल से उठ खड़ा हुआ और आर्थिक असमानता के सवालों से गहरे रूप से जुड़ता गया है. भारत की सड़को पर दिनरात के आंदोलनों ने लोकतंत्र ओर गांधीवाद को एक बार फिर प्रासंगिक नजरिया बना दिया है.

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गांधी अपनी डेढ़ सौवीं जयंती के साल में जिस रूप में अंबेडकर के साथ मिल कर एक नये राजनीतिक सामाजिक समीकरण की इबारत गढ़ रहे हैं. इसका दूरगामी असर होना ही है.

शाहीनबग की आग की लपट जैसे ही लखनऊ पहुंची, वहां घंटाघर पर जमा महिलाओं ने एक नया शाहीनबाग गढ दिया. लेकिन यूपी की सरकार और पुलिस ने घंटाघर पर डंटी महिलाओं से जिस तरह कंबल रजाई तक छीना, वह भारत के राजनीतिक इतिहास का सबसे काला अध्याय है.

सवाल उठा है कि शांतिपूर्ण तरीके से लोकतांत्रिक प्रतिरोध से निपटने का जो नजरिया सत्ता अपना रही है, वह इमरजेंसी से भी बुरे दौर का संकेत है. वहीं झारखंड के रांची में भी नया शाहीनबाग उभर कर सामने आया है. यहां आंदोलन में बैठी महिलाओं ने इसे ‘दूसरा शाहीन बाग’ नाम दिया. इसमें सभी धर्म सांप्रदाय की महिलाएं एकजुट होकर सीएए के विरोध में नारा लगाते देखी गयीं.

दिल्ली में एनएसए जो पिछली सदी के सातवें दशक के अंत के सबसे बदनाम कानून है, इसपर अमल की बात कर दिल्ली पुलिस ने इमरजेंसी की याद को ताजा कर दिया है. इस कानून का भारी विरोध हुआ था.

और तब से यह फाइलों की गर्त में पड़ा हुआ था. इमरजेंसी के बदनाम दौर में मीसा का आंतक था. एनएसए उसी कड़ी का कानून है. सवाल उठता है कि लोकतंत्र में संवाद के बजाय दमन का रासता सरकारें क्यों अपनाती हैं. सारी दुनिया में देखा जा रहा है कि लोकतंत्र के लिए हो रहे आंदोलनों के दमन की एक ही भाषा और एक ही तरीका अलग-अल्रग देशों की सरकारें अपना रही हैं.

झारखंड के रांची में सीएए और एनसीआर के खिलाफ धरना पर बैठीं महिलाएं.

देश के हर कोने में जहां सीएए-एनपीआर-एनआरसी के विरोध में प्रदर्शनों की संख्या बढती जा रही है. वहीं सीएए के पक्ष में भाजपा सड़कों पर उतर रही है. इमरजेंसी को भी सही साबित करने के लिए इंदिरा गांधी के समर्थक सडकों पर उतरते थे.

भाजपा ने पूरे देश में पांच हजार प्रदर्शन की योजना की घोषणा की है. भाजपा के तमाम बड़े नेता कह रहे हैं कि सीएए नागरिकता देने का कानून है. और इससे विकास की गति तेज होगी. लेकिन भाजपा के ही दो नेताओं के बयान के बाद दावों को लेकर नयी चर्चा है.

असम के तकतवर भाजपा नेता और असम सरकार के प्रभावी मंत्री हेमंत विश्वकर्मा ने नागरिकता कानून को लेकर जो बाते की है उसकी खूब चर्चा हो रही है. उन्होंने धार्मिक उत्पीड़न वाले पहलू को लेकर कहा है कि इसे प्रमाणित नहीं किया जा सकता.

विश्वकर्मा के बयान के बाद विवाद गहरा हुआ है.  वहीं वित मंत्री सीतारमण का बयान है कि पिछले छह सालों में भारत ने छह हजार से ज्यादा लोगों को नागरिकता दी है. जिसमें वे तीन देश भी शामिल हैं जो सीएए में दर्ज हैं.

अब सवाल पूछा जा रहा है कि जब पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से आने वालों को नागरिकता पहले के कानून के तहत दिया जाता रहा है तो इस नये संशोधन की जरूरत फिर किस बात के लिए पडी. इस सवाल को दीरकिनार भी नहीं किया जा सकता है.

केंद्र और राज्यों के बीच इस कानून को लेकर विवाद बढ़ता ही जा रहा है. एनपीआर की प्रक्रिया को लेकर भी मतभेद बढ़ा हुआ है. दुनिया भर की मीडिया खुल कर इस पर लिख रही है. न्यूयार्क टाइम्स के एक लेख की इस संदर्भ में खूब चर्चा हो रही है.

वहीं फ्रांस के बड़े न्यूज चैनल फ्रांस 24 ने 27 मिनट के एक कार्यक्रम को अपने प्राइम टाइम में दिखाया. जिसमें आंदोलन पर पुलिस की ज्यादती को दिखाया गया है.

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