Opinion

आर्थिक क्षेत्र में मंदी की आशंका के बीच चुनावों में दरकिनार जरूरी सवाल

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Faisal Anurag

आर्थिक क्षेत्र में सुस्ती को लेकर अब अनेक जानकार सक्रिय हो गए हैं. प्रधानमंत्री आर्थिक सलाहकार बोर्ड के एक सदस्य ने तो इसे लेकर गंभीर चिंता प्रकट करते हुए आर्थिक मंदी का संकेत दिया है. पिछले अनेक महीनों से सरकार के आर्थिक  आंकड़ों को लेकर संदेह प्रकट किया जाता रहा है. देश के जानेमाने कई अर्थशास्त्रियों की इस तरह की चेतावनी को सरकार नकारती रही है.

वित्त मंत्री बार-बार कहते रहे हैं कि भारत की इकोनॉमी गतिमान है. वे मानते हैं कि देश में किसी तरह का आर्थिक संकट का अंदेशा नहीं है. लगभग 80 जानेमाने अर्थशास्त्रियों ने बयान जारी कर कहा था कि भारत सरकार के आंकड़े भ्रम पैदा करने वाले हैं और वास्तविक हालत से बहुत अलग हैं.

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तब सरकार ने त्वरित टिप्पणी कर कहा था कि उसके आंकड़ों के तथ्यों को नकारा नहीं जा सकता है. आर्थिक प्रगति के आंकड़े जारी करने वाले संस्थानों की भूमिका को लेकर भी सवाल किए जा रहे हैं. आरोप है कि भारत सरकार आंकडों में घालमेल कर तथ्यों को छुपा रही है. रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन भी भारत के आर्थिक क्षेत्र के दावों को लेकर आशंका प्रकट कर चुके हैं.

अब जबकि प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकारों में एक कह रहे हैं कि देश की आर्थिक दिशा संकट में है तो खतरे को समझने की जरूरत है. भारत ने पहले भी आर्थिक संकटों का सामना किया है, लेकिन इस सरकार में एक अलग बात यह है कि वह न केवल आंकड़ों को छुपाती है, बल्कि उसको मनानुकूल बनाकर पेश भी करती है ,जो जमीनी सच्चाई की सही तस्वीर पेश नहीं करती है.

भारत के ग्रोथ के तमाम आंकड़े न केवल देश में विवाद के घेरे में हैं बल्कि कई वैश्विक विशेषज्ञों और संस्थानों ने इसपर संदेह भी प्रकट किया है. इससे दुनियाभर में भारत की साख प्रभावित हुई है और दुनियाभर की मीडिया में भारत के विकास और ग्रोथ संबंधी दावों को लेकर असमंजस के हालात बने हुए हैं.

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वर्तमान आम चुनाव में भारत के आर्थिक हालत पर सबसे कम चर्चा मीडिया में हो रही है. विपक्ष के कुछ नेता इन सवालों को उठा रहे हैं, लेकिन उन्हें नजरअंदाज किया जा रहा है. सत्तापक्ष इन चुनावों के सभी चरणों के पहले अपने प्रचार का एजेंडा बदल दे रहा है.

wऐसी कोशिश है कि इस तरह के सवालों पर चुनाव के प्रचार अभियान में किसी तरह का विमर्श हो ही नहीं. यह पहला चुनाव है, जिसमें भारत में सत्तापक्ष न तो बेरोजगारी के सवाल को और न ही किसानों के मुद्दे की चर्चा कर रहा है.

छठे फेज के साथ ही प्रधानमंत्री मोदी ने बहस की दिशा को 28 साल पहले लिट्टे आतंकवादियों के शिकार हुए पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को केंद्रित किया है. कांग्रेस के रफाल के हमले का जबाव देने के बजाय मोदी बोफोर्स का भूत खड़ा कर रहे हैं. बाफोर्स के सवाल पर 2989 में राजीव गांधी की सरकार का पतन हुआ था, तब से गांधी परिवार का कोई सदस्य भारत का प्रधानमंत्री नहीं बना है. सुप्रीम को जबकि इस मामले में राजीव गांधी के लिए क्लीन चिट दे चुका है.

सवाल उठता है कि भारत की राजनीति में संवाद और बहस का अभी जो माहौल बन रहा है, उसमें आर्थिक सवाल या भविष्य के सपनों का अभाव क्यों है. भाजपा ने तो 2014 का चुनाव भविष्य के सपनों के नाम पर ही लड़ा था. जिसमें अच्छे दिन लाने का सपना दिखाया गया था.

इसके साथ ही 2 करोड़ रोजगार हर साल देने का वायदा था और किसानों के लिए स्वामीनाथन  कमिटी की रिपोर्ट लागू करने के साथ उनकी आय दो गुनी करने की बात की गयी थी.

मतदाताओं के प्रति जबावदेह सरकार और राजनीतिक दलों से अपेक्षा की जाती है कि सरकार  आमचुनाव उन वायदों की चर्चा करेगी, जिसके सहारे उसने सत्ता तक पहुचने का लक्ष्य हासिल किया है.

भारत के अबतक चुनावों में सरकारो को अपने वायदों का जबाव देना पड़ा है. लेकिन 2019 का यह चुनाव इस तरह के सवाल को दरकिनाकर कर इतिहास के भूत को खड़ा करने के सत्तापक्ष के प्रयास का गवाह बन कर रह गया है.

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