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वाई-फाई के नाम पर कहीं कमीशनखोरी का खेल तो नहीं खेल रहा उच्च शिक्षा विभाग

दो साल बीतने के बाद भी कोई यूनिवर्सिटी वाई-फाई नहीं

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Ranchi : झारखंड के उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग में इंटरनेट एवं वेबसाइट डिजाइन के नाम पर अधिकारियों की मिलीभगत से करोड़ों की कमीशनखोरी के संकेत मिल रहे हैं. दो वर्ष पूर्व झारखंड सरकार ने राज्य के सभी सरकारी विश्वविद्यालयों के कैंपस को वाई-फाई सुविधा से लैस करने हेतु 78 करोड़ रुपये की राशि सभी विश्वविद्यालयों को आवंटित की. विभाग के तत्कालीन सचिव अजोय कुमार सिंह ने सभी विश्वविद्यालयों को चिट्ठी लिखकर राशि को भारत सरकार के संस्थान निक्की (इंटरनेट संबंधित कार्य के लिए सरकारी सेवा) के खाते में राशि डालने को कहा, ताकि निक्की के माध्यम से सभी विश्वविद्यालयों में वाई-फाई पर काम आरंभ किया जा सके. सभी विश्वविद्यालयों ने इस राशि का भुगतान निक्की को कर दिया. लगभग एक साल बीतने के बाद भी किसी विश्वविद्यालय में निक्की द्वारा कार्य आरंभ नहीं किया जा सका. विश्वविद्यालयों एवं छात्र संगठनों के दबाव के बाद निक्की ने वाई-फाई का काम विप्रो कंपनी को दे दिया. विप्रो कंपनी को काम के संदर्भ में अग्रिम भुगतान निक्की के माध्यम से कर दिया गया. विप्रो छह महीने तक काम नहीं आरंभ कर पायी. विभाग के अधिकारियों के दबाव के बाद विप्रो ने काम तो शुरू किया, लेकिन अभी तक झारखंड के किसी भी विश्वविद्यालय को वाई-फाई सुविधा से लैस नहीं कर सकी है.

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विप्रो के काम शुरू करते ही आरयू के सभी विभाग हुए इंटरनेटविहीन

विप्रो कंपनी ने रांची विश्वविद्यालय में वाई-फाई का काम शुरू किया. इसके लिए कंपनी की ओर से कैंपस में फाइबर केबल बिछाने का काम शुरू किया गया, लेकिन इस काम के शुरू होते ही रांची विश्वविद्यालय का बीएसएनएल का फाइबर केबल काट दिया गया. लगभग छह माह से आरयू के किसी भी विभाग में इंटरनेट सेवा नहीं है. आरयू के सीसीडीसी प्रो लालजी शाहदेव ने बताया कि वाई-फाई सुविधा आरयू को कब मिलेगी, यह तो भविष्य की बात है, लेकिन वर्तमान में विप्रो कंपनी ने कैंपस में जबसे कार्य शुरू किया है, पूरे कैंपस की इंटरनेट सेवा ठप हो गयी है. पिछले छह माह से आरयू के किसी भी विभाग एवं प्रशानिक भवन में इंटरनेट सेवा नहीं है. आरयू में वर्तमान में इंटरनेट का कार्य शिक्षक एवं छात्र निजी मोबाइल के माध्यम से कर रहे हैं. विभाग स्तर से कार्य चल रहा है, इसके लिए इतना समय लग रहा है. आवंटित राशि के अग्रिम भुगतान के बाद भी कैंपस में वाई-पाई सेवा न मिलना जांच का विषय है. सबसे कमाल की बात है कि हाल में सड़क की मरम्मत होने के कारण विप्रो का केबल कट गया है, इसलिए काम रुक गया है. अब निक्की और एनआईसी का कहना है कि केबल की मरम्मत के पैसे भी विश्वविद्यालय को देने होंगे. इसको देने से विश्वविद्यालय ने इनकार कर दिया है.

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नौ लाख में एसपीएमयू कैंपस हुआ है वाई-फाई

वहीं, एक साल पहले ही रांची कॉलेज (वर्तमान में डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय) का कैंपस मात्र नौ लाख रुपये में ही पूरी तरह वाई-वाई है. विश्वविद्यालय के सीसीडीसी प्रो मो अयूब ने कहा, “हमारे विश्वविद्यालय का कैंपस पूरी तरह से वाई-फाई है. नौ लाख रुपये खर्च करने के बाद विवि में 30 एमबीपीएस की स्पीड से छात्रों को इंटरनेट की सेवा प्रदान की जा रही है.”

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वाई-फाई के लिए निक्की को जिम्मा दिया गया है : विभाग

उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग के सहायक निदेशक संजीव चतुर्वेदी ने कहा कि राशि का आवंटन निक्की को कर दिया गया है. पूरे राज्य के विश्वविद्यालयों को वाई-फाई की सुविधा से निक्की के माध्यम से ही लैस किया जायेगा. निक्की को ही इसका जिम्मा क्यों मिला, इस विषय में वरीय अधिकारी ही बता सकते हैं.

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उठ रहे ये सवाल

  • सरकार ने जब वाई-फाई कैंपस के लिए राज्य के सभी विश्वविद्यालयों को 78 करोड़ रुपये की राशि आवंटित कर दी, तो उसे पुन: निक्की को देने के लिए विश्वविद्यालयों को चिट्ठी क्यों निर्गत की गयी?
  • जब पूरा काम निक्की को ही करना था, तो सरकार ने निक्की को राशि क्यों नहीं आवंटित की?
  • निक्की को जब वाई-फाई का काम करना था, तो उसने विप्रो को यह काम क्यों दिया?
  • उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने बिना किसी योजना के राशि को पहले निक्की को क्यों आवंटित किया?
  • निक्की की स्थिति का आकलन क्यों नहीं किया गया कि वह इस काम को करने में सक्षम है या नहीं?
  • विभाग के अधिकारियों ने विप्रो जैसे संस्थान से काम के लिए कोटेशन क्यों नहीं मांगा?
  • कुल मिलाकर देखा जाये, तो वाई-फाई के नाम पर विभाग द्वारा कमीशन का एक लंबा खेल खेले जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है, जो जांच का विषय है.

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वाई-फाई के नाम पर कमीशन का खेल हुआ है विभाग में : ABVP

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद सह आरयू के सीनेट सदस्य अटल पांडेय ने कहा कि वाई-वाई के नाम पर उच्च एवं तकनीकी विभाग में कमीशन का खेल हुआ. इसमें सचिव स्तर के अधिकारी तक शामिल हैं. मामले को गंभीरतापूर्वक लेते हुए परिषद की ओर से जांच के लिए राज्यपाल को ज्ञापन सौंपा गया है.

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