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मुस्लिम समाजः उधर चांद छूने की कवायद, इधर जमीन में धंसता हुआ आदमी- संदर्भ, मॉब लिंचिंग

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Dr Mahfooz Alam

पिछले कुछ दिनों से देश में एक खतरनाक ‘ट्रेंड’  शुरू हुआ है. कुछ लोगों ने अपना धैर्य खो दिया है. न पुलिस, न अदालत न वकील.  बस अपने लोगों को जमा करते हैं और फैसला “ऑन स्पॉट” हो जाता है. दो-चार दिन हाय-तौबा मचती है. फिर इसी प्रकार की दूसरी घटना कहीं और घट जाती है और पहली घटना बीते दिनों की कहानी बन जाती है.

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पिछले एक महीने से इस तरह की घटनाओं में तेजी आयी है. 18 जुलाई 2019 को बिहार के छपरा जिले के एक गांव में भीड़ ने तीन व्यक्तियों को पीट-पीटकर मार डाला. मृतकों के परिजनों की चीत्कार जिसने भी सुनी, उसका कलेजा दहल गया. परिजनों के रूदन से जैसे आकाश में छेद हो गया. यह दर्द वही समझ सकता है, जिसकी आंखों के सामने उसका लाल छिन गया हो. मांग का सिंदूर उजड़ गया हो. हंसता-खेलता भाई,  बेटा, पति हमेशा के लिए बिछड़ गया हो. मृतकों में 40 वर्षीय नौशाद कुरैशी, 30 वर्षीय राजू नट और 35 वर्षीय बिरेश नट शामिल हैं. इस घटना का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है जो विचलित करने वाला है.  जिसमें चारों ओर खड़े लोग तमाशा देख रहे हैं और दो युवक जमीन पर पड़े मृतप्राय दो आदमी की  डंडे से बुरी तरह पिटायी कर रहे हैं. जैसे लोहार लोहे को पीटता है. इसी प्रकार 21 जुलाई 2019 को झारखंड के गुमला जिला के सिसई थाना क्षेत्र में डायन-ओझा का आरोप लगाकर चार वृद्ध आदिवासियों की पीट-पीटकर हत्या कर दी गयी है.

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जरा सोचिए, देश किधर जा रहा है. लोगों का दिल कितना कठोर हो गया है. लोग किस कदर निर्दयी  होते जा रहे हैं. आखिर इतना क्रोध और जुनून लोगों में कौन भरता है. दूसरी ओर हम न्यू इंडिया की बात कर रहे हैं. क्या न्यू इंडिया की तस्वीर इतनी भयावह होगी?  भारत को विश्व गुरु बनाने का हम एलान कर रहे हैं. हम चांद पर जा रहे हैं. और ज़मीन पर आदमी, आदमी के खून का प्यासा होता जा रहा है. ऐसा मालूम होता है कि प्रजातंत्र पर भीड़तंत्र हावी होती जा रहा है.

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भीड़तंत्र से प्रभावित होने वाले अधिकतर मुस्लिम, दलित और आदिवासी समाज के लोग होते हैं. इनमें मुसलमानों की संख्या सबसे अधिक है. उनमें इतना खौफ समाया हुआ है कि वह विशेष वेषभूषा में बस, ट्रेन से सफर करने में भी अपने आप को असुरक्षित महसूस कर रहा है. अब तो राह चलते हुए लोगों को रोककर नाम पूछकर मारपीट की जाने लगी है. महाराष्ट्र के औरंगाबाद की घटना हमारे सामने मौजूद है.

भीड़तंत्र ने देश को बहुत नुकसान पहुंचाया है. 1992 का बाबरी मस्जिद विध्वंस इसी भीड़तंत्र का कारनामा था. यह भी सच्चाई है कि इस भीड़तंत्र को इस हद तक पहुंचाने में दो-चार लोगों का ही हाथ होता है.  बाकी लोग तो महज उनके मोहरे होते हैं. सरकार को ऐसे लोगों की पहचान सुनिश्चित करनी चाहिए और उन्हें कड़ी सजा दिलानी चाहिए. लेकिन इन ऐसे लोगों को पार्टी की रैली में पहली पंक्ति में बैठाया जाता है. बड़े-बड़े नेता उनका सम्मान करते हैं. उनके साथ फोटो खिंचवाते हैं. उन्हें माला पहनाते हैं. अखलाक की हत्या के एक  आरोपी की  स्वाभाविक मृत्यु होने पर तो उसके पार्थिव शरीर को राष्ट्रीय ध्वज से ही लपेट दिया गया था. यह मानवता और इंसानियत की हार है. अगर मॉब लिंचिंग और मुस्लिम एवं दलितों को प्रताड़ित करने की घटनाओं पर तुरंत रोक नहीं लगायी गयी तो देश का बड़ा नुकसान हो जायेगा. और विकास की पटरी पर आ रहा देश कई सौ साल पीछे चला जायेगा.

इस दिशा में झारखंड सरकार द्वारा आम जनों के लिए मॉब लिंचिंग पर रोक के लिए चलाया जा रहा जागरूकता अभियान स्वागत योग्य है. इसे और अधिक मजबूती और विस्तार देने की आवश्यकता है. इस प्रकार का अभियान देश के अन्य राज्यों, शहरों और गांवों में चलाने की जरूरत है. जागरूकता के साथ-साथ आपसी प्रेम एवं भाईचारा को बढावा देना भी वक़्त का तकाजा है.

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