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सूदखोरों ने कर दी थी हेमंत सोरेन के दादा की हत्या

  • बेटे के लिए चावल लेकर जा रहे थे, तब घेर कर मार डाला था महाजनी गुंडों ने
  • प्रतिकार में खड़े हुए शिबू सोरेन बन गये जन-जन के नायक
  • सोबरन सोरेन की शहादत को नमन करने पहुंचे झारखंड के सीएम

Ranchi : झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन आज नेमरा में हैं. उनके साथ उनके पिता और झारखंड मुक्ति मोर्चा के प्रमुख शिबू सोरेन भी हैं. नेमरा में आज सोबरन सोरेन का शहादत दिवस मन रहा है. गांधीवादी विचारधारा के सोबरन सोरेन की शहादत कोई मामूली घटना नहीं है.

यह घटना 63 साल पुरानी है, लेकिन इसी घटना के प्रतिकार में खड़े हुए सोबरन सोरेन के पुत्र शिबू सोरेन कालांतर में एक नायक के तौर पर उभरे और अन्याय व शोषण के खिलाफ संघर्ष के प्रतीक पुरुष बन गये. पिता सोबरन सोरेन की शहादत के बाद शिबू सोरेन के मन में विद्रोह के जो बीज उपजे, उसी का नतीजा रहा कि पूरे इलाके से सूदखोरी प्रथा का अंततः खात्मा हो गया.

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बेटे शिबू के लिए चावल लेकर जा रहे थे सोबरन सोरेन, तभी..

नेमरा रामगढ़ जिले के गोला प्रखंड में है. यही हेमंत सोरेन और उनके पिता शिबू सोरेन का पैतृक गांव है. शिबू सोरेन के पिता सोबरन सोरेन पेशे से गांव के शिक्षक और गांधी से प्रभावित कांग्रेसी विचारधारा के थे. उन्होंने महाजनी शोषण और गांव में शराबबंदी के खिलाफ आवाज उठायी. तब पूरे इलाके में महाजनों का ही राज था.

महाजनों को अपने विरोध में उठी यह आवाज नागवार गुजरी तो उन्होंने सोबरन सोरेन की हत्या करवा दी. वह तारीख थी 27 नवंबर 1957. जिस वक्त सोबरन सोरेन की हत्या हुई, वह अपने गांव नेमरा से गोला हाई स्कूल जा रहे थे. असल में उनके बेटे शिबू सोरेन इसी स्कूल के हॉस्टल में रह कर पढ़ाई कर रहे थे. सोबरन सोरेन उनके लिए एक बोरी में चावल लेकर जा रहे थे.

इस हत्याकांड ने किशोर शिबू सोरेन के मन पर गहरा असर डाला. उनकी मां सोनामणि कई साल तक हजारीबाग कोर्ट के चक्कर लगाती रहीं, ताकि वह अपने पति के हत्यारों को सजा दिला सकें. लेकिन पुलिस और अदालत की चौखट पर चक्कर लगाते हुए उनका हौसला टूट गया. मां सोनामणि के साथ शिबू सोरेन भी रहते. आखिरकार थक-हारकर उन्होंने तय किया कि वह महाजनी प्रथा के खिलाफ संघर्ष करेंगे और शोषण-दमन के इस दुष्चक्र का खात्मा करेंगे.

शिबू सोरेन पढाई छोड़ जंगल में लकड़ी काटने जाते. उसी दौरान इलाके में सक्रिय कम्युनिस्ट नेता मंजूर हसन की निगाह शिबू सोरेन पर पड़ी. शिबू सोरेन के संघर्ष को उन्होंने दिशा दी. उनके साथ रह कर उनमें राजनीतिक चेतना भी पैदा हुई. शिबू सोरेन ने गांव के लोगों को एकजुट किया और महाजनों के खिलाफ धनकटनी आंदोलन शुरू कर दिया.

महाजनों और सूदखोरों ने आदिवासियों की जिन जमीनों पर गलत तरीके से कब्जा कर रखा था, उसकी फसल एकजुट होकर काटी जाने लगी. इस आंदोलन की अगुवाई करते शिबू सोरेन के नाम का खौफ ऐसा था कि सूदखोरों-महाजनों की रुह कांपने लगी.

बाद में शिबू सोरेन का संघर्ष व्यापक होता गया. वे संथालों के नायक बनकर उभरे. उन्हें पूरे समुदाय का गुरु माना गया. शिबू सोरेन के दिशोम गुरु बनने की कहानी के पीछे सोबरन सोरेन की शहादत ही है. आज इसी शहादत को नमन करने हेमंत सोरेन अपने गांव पहुंचे.

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