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लोकतांत्रिक शासन की मुख्य पहचान विरोध में उठे स्वर को सम्मान देना है, न कि उसे कुचलना

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Faisal  Anurag

लोकतांत्रिक शासन की मुख्य पहचान विरोध में उठे स्वर को सम्मान देने से होती है. लेकिन नागरिकता संशोधन कानून ओर नागरिकता रजिस्टर के सवाल पर जिस तरह सरकार अड़ी हुई है, इससे जाहिर होता है  कि वह सड़कों से उठी आवाज को अनसुनी कर रही है. और मान रही है कि देरसबेर की थकान इन आंदोलनों को स्वतः ही खत्म कर देगी.

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इस तरह की समझ इतिहास में कई बार गलत साबित हो चुकी है. प्रधानमंत्री मोदी ओर गृहमंत्री शाह के बार-बार सफाई देने के बावजूद उनकी बातों पर आंदोलनकारी विश्वास नहीं कर पा रहे हैं. और हर दिन एक बड़ी भागीदारी और प्रदर्शन वे देश के विभिन्न हिस्सों में कर रहे हैं.

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12 जनवरी की रात को दिल्ली के शाहीनबाग में एक लाख से ज्यादा लोग रात भर प्रदर्शन में शामिल रहे. शाहीनबाग की महिलाएं पिछले 28 दिनों से लगातार दिनरात का धरना दे रही हैं. भारत के लोकतांत्रिक विरोध के इतिहास में यह बिल्कुल नायाब उदाहरण है.

आजादी की लड़ाई में भी इस तरह की मिसाल नहीं मिलती है. और आजादी के बाद तो बिल्कुल नहीं. दिल्ली के रामलीला मेदान से और 12 जनवरी को बेलूर मठ से मोदी ने सीएए को ले कर सफाई दी. इसके अलावे भी कई बार वे अपनी राय दे चुके हैं.

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अमित शाह भी कई सभाओं और चैनलों को साक्षात्कार में अपनी राय बता चुके हैं. बावजूद इसके बांदोलन थम नहीं रहा है. इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है. भारत के इतिहास में ऐसा कम ही हुआ है कि प्रधानमंत्री के कहे जाने के बाद भी उस पर आबादी का एक हिस्सा भरोसा नहीं करता है.

कुल मिलाकर प्रधानमंत्री के बयानों पर देश को विश्वास नहीं हो रहा है कि वे सच बोल रहे हैं. इसका एक कारण तो उन तथ्यों को गलत तरीके से पेश करना भी है जिसे ले कर आंदोलन जारी है. प्रधानमंत्री ने रामलीला मैदान से कहा था कि 2014 में जब से उनकी सरकार है, कभी भी एनआरसी पर चर्चा नहीं हुई है.

जबकि राज्यसभा में उनकी ही सरकार के कई मंत्रियों ने सवालों के जबाव में जो कुछ कहा है उससे प्रधानमंत्री के तथ्य नहीं मिलते हैं. 2019 में राष्ट्रपति के पहले अभिभाषण में भी एनआरसी का उल्लेख किया गया है. इस कारण सरकार को लेकर यह संदेह गहराया है कि वह जितना कह रही है, उससे कहीं ज्यादा छिपा रही है.

शाहीनबाग में विरोध प्रदर्शन की एक और तस्वीर.

असम के एनआरसी के अनुभव से देश के लोग परिचित हैं. वहां एनआसरसी के बाद जारी लिस्ट में पूर्व राष्ट्रपति अली अहमद के परिवार के सदस्य और असम की पूर्व मुख्यमंत्री अनवरा तैमूर भी अपनी नागरिकता साबित नहीं कर सकीं.

आम तौर पर देखा गया है कि आजादी की लड़ाई के दौरान भी हर बड़े आंदोलन के बाद अंग्रेजों को ऐसा नया कानून लाना पड़ा जो आंदोलनकारियों की भावनाओं को संतुष्ट कर सके. अंग्रेज की पहल पूर्ण आजादी की भावना को तो नहीं रोक सकी.

आजाद भारत ने भी कई लोकतांत्रिक आंदोलनों का ज्वार देखा है. और उन आंदोलनों ने भारत के लोकतंत्र की परिपक्वता की दिशा में एक कदम आगे ही बढाया है. पहली बार जिस तरह भारत का संविधान सड़कों पर पढ़ा जा रहा है.

और उसकी दुहाई दी जा रही है. उससे जाहिर होता है कि भारत के लोगों की आस्था इस संविधान की शक्ति का स्रोत बना है. खास कर महिलाओं और लडकियों ने लोकतंत्र की नई इबारत लिख दिया है.

इस आंदोलन का ही दबाव है कि पहली बार भारी बहुमत से चुनी गयी एक सरकार अपने एक कानून के पक्ष में प्रदर्शनों को नहीं रोक पा रही हैं. इस कारण दो पक्ष दिखने लगे हैं. लेकिन इमरजेंसी के समय भी सत्ता पक्ष ने बड़ी ताकत का प्रदर्शन किया था.

पश्चिम बंगाल के बेलुर मठ में सीएए व एनआरसी के समर्थन में सफाई देते पीएम नरेंद्र मोदी.

लेकिन उसे लोगों ने 1977 में नकार दिया था. सीएए विरोधी आंदोलन में जिस बड़े पैमाने पर बालीवुड के लोग समर्थन में उतरे हैं वह बताता है कि बालीवुड भी विभाजित है. एक तरफ बड़े नामों ने चुप्पी साध ली है कि युवा दिलों पर राज करने वाले कई युवा कलाकार इस आंदोलन के पक्ष में खड़े हैं. इसके साथ ही कई न्यायविदों का पक्ष भी सामने आ चुका है.

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य जस्टिस के इस बयान को ले कर भी दो राय है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वे तबतक सुनवाई नहीं करेंगे जब तक आंदोलन के क्रम में हिंसा थमेगी नहीं. सुप्रीम कोर्ट से रिटायर हुए कई जजों ने इस बयान की आलोचना की है.

साथ ही यह बहस भी हो रही है कि देश में जब इस तरह के हालात हैं तो चीफ जस्टिस चुप्पी नहीं साध सकते. कानून की दुनिया के कई बड़े नाम इस तरह का बयान दे चुके है. क्रिकेटर सुनील गावस्कर की बात भी बेहद महत्वपूर्ण है कि देश के युवा जिन्हें कैंपसों में पठनपाठन की गतिविधियों में होना चाहिये वे सड़क पर हैं.

यह अच्छी बात नहीं है. उनकी बातों का निहितार्थ साफ हे कि आंदोलन तीखा है और वह देश के हर सेक्शन में बहस को तेज कर चुका है और अपनी ओर ध्यानाकर्षन कर रहा है.

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