LITERATURE

मानव की भाषिक क्षमता ही उसे अन्य प्राणियों से अलग करती है

Sudhanshu Shekhar

भाषा क्या है? इस प्रश्न के उत्तर की खोज करते हुए प्राय: सभी विद्वान मानव सभ्यता के आदिग्रंथ ऋग्वेद की ओर सर्वप्रथम देखते हैं, जहां वाक्तत्व के रूप में भाषा पर चर्चा प्राप्त होती है. ऋग्वेद के दशम मंडल में 125वां सूक्त वाक्सूक्त है, जहां वाक्तत्व की महिमा बताते हुए समस्त चराचर का पालन करने वाली देवी कहा गया.

वाङ्मनस उपाख्यान भी हमें मिलता है, जहां यह चर्चा है कि मन में जो चिंतन होता है उसे वाणी (भाषा) ही प्रकट करती है. फिर जब यह प्रश्न उठता है कि भाषा कैसे प्रकट या उत्पन्न होती है तो हमें ऋक्प्रातिशाख्य एवं पाणिनीय शिक्षा आदि ग्रंथों में इसका विशद एवं वैज्ञानिक अध्ययन प्राप्त होता है.

फिर हमें निघण्टु, निरुक्त, पानिनीय व्याकरण और उसपर लिखे गये वार्तिक, महाभाष्य आदि ग्रन्थों की विपुलता प्राप्त होती है जो यह सिद्ध करती है कि भाषा, जो समस्त चराचर का पालन करती है, उसका विश्लेषण एवं विवेचन भारतीय ज्ञान परंपरा का सर्वाधिक महत्वपूर्ण अंग रहा है.

यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि मानव को अन्य प्राणियों से अलग करने वाला तत्व उसकी भाषिक क्षमता ही है. यदि मानव की भाषा का विकास न हुआ रहता तो मानवों की संस्कृति का प्रश्न ही नहीं उठता. मानव जीवन में सामान्य व्यवहार से लेकर संस्कृति के स्तर तक तथा विभिन्न संस्कृतियों में भेद के आधार पर परिलक्षित होने वाली सामाजिक विविधताओं का मूल आधार भाषा ही है.

भाषा को कई विद्वानों ने अनेक प्रकार से परिभाषित करना चाहा है. इसी क्रम में किसी ने साइंस ऑफ लैंग्वेज कह कर परिभाषित किया तो किसी ने फिलोलॉजी कहकर इसे परिभाषित करने का प्रयास किया.

डॉ. श्यामसुंदर दास ने इसे परिभाषित करते हुए कहा- भाषा विज्ञान उस शास्त्र को कहते हैं जिसमें भाषा मात्र के भिन्न-भिन्न अंगों तथा स्वरूपों का विवेचन तथा निरूपण किया जाता है. इनकी परिभाषा से स्पष्ट होता है कि भाषा मात्र के अध्ययन का कोई न कोई निश्चित आधार है, कुछ सार्वत्रिक नियम हैं जो समस्त भाषाओं के विश्लेषण का आधार हैं.

डॉ. मंगलदेव शास्त्री कहते हैं कि भाषा विज्ञान में भाषा की रचना एवं इतिहास के अलावा विभिन्न भाषाओं के वर्ग की पारस्परिक समानताओं एवं विशेषताओं का भी अध्ययन करते हैं.

उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भावाभिव्यक्ति के लिए भाषा के अतिरिक्त अन्यान्य साधन जीवन के संपूर्ण प्रवृत्तियों या विचारों का स्पष्टीकरण नहीं कर सकते हैं. भाषा के ऐतिहासिक एवं तुलनात्मक अध्ययन की पद्धति से यह भी स्पष्ट होता है कि भाषा में जो नित्यता है वह कूटस्थ-नित्यता न होकर प्रवाहनित्यता है जिसकी चर्चा महाभाष्यकार ने विस्तार से की है.

प्रस्फुट भाषा के प्रयोग एवं बाह्य परिवर्तन के सन्दर्भ में समाज, संस्कृति, धर्म एवं राज्यों (क्षेत्रीयता या भौगोलिकता) का परिदृश्य हमें भाषा का संस्कृति से सम्बन्ध एवं सांस्कृतिक विविधता में भाषा या बहुभाषिकता के पक्ष पर विचार होता है.
तत्वत: प्रयोग के अंतर्गत प्रयोगक्षेत्र, साधुता एवं सामाजिक/प्रयोगकर्तृक प्रचलन पर ही ध्यान दिया जाता है. इनके आधार पर भाषा आदर्श भाषा या फिर कई बोलियों के रूप में कई सामाजिक परिवेश में कई बोलियों पर अपना अलग-अलग स्वरूप दिखाती है.

भाषा की भौगोलिकता उसके उच्चारण पर प्रभाव डालती है, इसलिए हम कई वर्णों के उच्चारण में भेद पाते हैं. हरियाणवी या जाट की शैली की तुलना राजस्थान या पंजाब के उच्चारण शैली से करें तो हम पाते हैं कि एक ही वर्ण को दोनों अलग-अलग तरीके से बोलते है, एक ही वस्तु को सूचित करने के लिए अलग-अलग क्षेत्र में अलग-अलग शब्दों का भी प्रयोग सहज रूप से पाया ही जाता है.

जो शब्द जिस भाषा में नहीं होता है, उस शब्दजगत से जुड़ी हुई वस्तुजगत का भी समाज विशेष में अभाव पाया जाता है. यही कारण है कि सभ्यता के विकास के साथ नए शब्दों का निर्माण भी होता है. आज तकनीक के विकास के साथ इस शब्द निर्माण प्रक्रिया को हम समाज में अच्छी तरह देख सकते है.

झारखंड जैसे बहुभाषी राज्य जहां तीन भाषा परिवारों से संबंध रखने वाली भाषाएं बोली जाती हैं जो कि इण्डो-आर्यन , ऑस्ट्रियो-एशियाटिक एवं द्रविड़ परिवारों से हैं. भाषा के सामाजिक, सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक भूमिकाओं को गहराई से समझने की जरूरत है.

ये समझने के लिए कि भाषा द्वारा विभिन्न समुदायों की किस प्रकार सामाजिक पहचान बनाई जाती है, और किस प्रकार कुछ समुदाय पिछड़ जाते हैं. किस प्रकार सांस्कृतिक परंपराएं लुप्त हो जाती हैं.

मातृभाषा एवं शैक्षणिक भाषा में विशाल अंतर है. जनजातीय छात्रों के लिए रोजगार के आयामों की भी कमी है. भाषिक बंधकों ने उन्हें समाज से काट रखा और इस कारण वे अपने अधिकारों का प्रयोग करने में असमर्थ है. भाषा के क्षय एवं लोप के बारे में बढ़ती जागरुकता तभी उपयोगी होगी जब अल्पसंख्यक भाषाओं को अर्थपूर्ण स्थान समाज में मिले.

अपने समुदाय एवं देश-दुनिया में समकालीन भाषाओं के बराबर शिक्षा, लेखन, कला एवं मीडिया जैसे क्षेत्रों में सरकार को आर्थिक एवं राजनैतिक मदद देने और स्थानीय समुदाय के साथ मिलकर काम करने की भी जरूरत है.

अपनी भाषिक एवं सांस्कृतिक भिन्नता के कारण झारखण्ड की लोक-कथाएं लोक ज्ञान का सागर हैं. लोककथाएं कई प्रकार की होती हैं, जैसे कि किस्से कहानियां, युद्धगाथाएं, धार्मिक, सामाजिक गाथाएं, व्यक्तिगत अनुभव एवं आत्मकथाएं इनका अध्ययन अब विभिन्न विषयों जैसे कि सामाजिक शोध, समाज विज्ञान एवं कला के क्षेत्रों में हो रहा है.

लोक कथाएं मानव की सबसे पहली अनुभूतियों एवं ज्ञान को व्यक्त करने का माध्यम रही है. इसके अतिरिक्त ये मनोरंजन का एवं मिल बैठकर वक्त गुजारने का सबसे पुराना तरीका भी है. कुछ लोक कथाएं समुदाय के सामाजिक एवं धार्मिक जीवन में योगगान देती हैं.

संज्ञानात्मक विज्ञान कॉग्निटिव साइंस में हुए नए शोध से पता चला है कि मौखिक लोक कथाएं समुदाय के सदस्यों की संज्ञानात्मक गतिविधियों पर असर डालती है.
कई भाषाएं लुप्त होने की कगार पर है. हर भाषा एक नए विचार में खुलने वाली खिड़की होती है, हर भाषा के साथ ज्ञान का एक स्रोत लुप्त हो जाता है.

अब समय आ गया है कि हम विभिन्न भाषाओं और उनके कार्य प्रणालियों का समन्वय करें जैसे कि सामाजिक-भाषा विज्ञान, भाषा-लोप, भाषा-विघटन एवं बदलाव आदि. नहीं तो हम अतिशीघ्र ज्ञान के कई स्रोत खो बैठेंगे.

हर भाषा मानवता की धरोहर है. इसके लोप से मानवता को भारी क्षति पहुंचती है. हमें भाषा संघर्ष, संरक्षण, एवं उपयोग के विषय में परस्पर सहयोग से विषय एवं वर्गों से ऊपर उठकर काम करना चाहिए. समाज, देश, समुदाय के परस्पर सहयोग से ही यह संभव हो सकता है.

इसलिए भाषा मानसिक सामर्थ्य एवं सामाजिक सत्व की पराकाष्ठा- दोनों ही रूपों इतिहास की शक्तियों से प्रतिरूपित होती है. जिसके संरक्षण एवं संवर्धन की सर्वदा अपेक्षा होती है, जिससे मानव की सभ्यता-संस्कृति का सर्वदा सर्वत्र प्रतिनिधित्व होता रहे. भाषा की अद्भुत सार्वकालिक सत्ता बनाए रखने के लिए सभी मानव समुदायों को तत्पर बने रहने की महती आवश्यकता है.

(लेखक सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ झारखंड में सहायक प्राध्यापक हैं)

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