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सोनभद्र हत्याकांडः जिस भूमि के लिए 10 लोगों की हत्या की गयी, सरकार के पास उसका राजस्व रिकॉर्ड ही नहीं है

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Sonbhadra: 10 लोगों की हत्या को लेकर उत्तर प्रदेश का सोनभद्र जिला और जिले के घेरावल तहसील का उम्भा गांव सुर्खियों में है. यहां बीते 17 जुलाई को जिस विवादित जमीन को लेकर नरसंहार हुआ, उस भूमि का राजस्व रिकॉर्ड ही उपलब्ध नहीं हैं.

इस मामले में अपर जिलाधिकारी योगेंद्र बहादुर सिंह ने बताया है कि रिकॉर्ड जिस अवधि का है, उस अवधि में  सोनभद्र मिर्जापुर जिले का हिस्सा हुआ करता था. फिर एक निर्धारित अवधि के बाद इसके कुछ रिकॉर्ड नियमानुसार नष्ट कर दिये जाते हैं. कार्यशैली के आधार पर ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि कागजात के रखने के लिए स्थान की कमी पड़ने लगती है.

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उन्होंने आगे बताया कि कुछ मामलों में हालांकि रिकॉर्ड रखे भी जाते हैं. लेकिन जहां हत्याकांड हुआ, यानी उभ्भा गांव की इस विवादित भूमि से संबंधित 1955 के रिकॉर्ड नष्ट कर दिये गये हैं.

हत्याकांड के बाद सूब के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपर मुख्य सचिव (राजस्व) के नेतृत्व में एक समिति का गठन किया था. इस समिति को दस दिन में रिपोर्ट देने के लिए कहा गया था.

गौरतलब है कि 17 जुलाई को ग्राम प्रधान यज्ञ दत्त और उसके आदमियों की ओर से घोरावल तहसील के उम्भा गांव में 90 बीघा विवादित जमीन पर कब्जे को लेकर खूनी संघर्ष हुआ. इसमें दस लोगों की मौत हो गयी थी. और 28 लोग घायल हो गये थे.

मुख्यमंत्री की रिपोर्ट के हवाले से कहा गया है कि इस भूमि का विवाद काफी पुराना है. और यह विवाद 1955 से ही चला आ रहा है. इससे संबंधित राजस्व अदालतों में कई मामले चल रहे हैं. विवाद को लेकर दोनों ही पक्ष के लोगों ने पुलिस के पास आपराधिक मामले भी दर्ज कराये हैं.

हालिया संवाददाता सम्मेलन में मुख्यमंत्री योगी ने बताया है कि 1955 से 1989 के बीच कांग्रेस के शासनकाल में इस भूमि को गैरकानूनी रूप से आदर्श सोसायटी के नाम से कर दिया गया था. इस हत्याकांड के लिए योगी ने कांग्रेस की तत्कालीन सरकार को जिम्मेदार बताया है.

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इधर एडीएम का कहना है कि मूर्तिया का ग्राम प्रधान यज्ञ दत्त दस लोगों की हत्या के मामले में मुख्य आरोपी है. प्रधान ने अपने घर के सामने भूमि पर अवैध कब्जा कर रखा था. जिसे अब जिला प्रशासन ने हटा दिया है. यहां ये भी बता दें कि जिलाधिकारी अंकित कुमार अग्रवाल ने मूर्तिया में हुए सभी विकास कार्यों की जांच का आदेश पहले से दे रखा है.

भौगोलिक स्थिति की बात करें तो तीन गांव उम्भा, सपाही और मूर्तिया छह किलोमीटर के दायरे एक दूसरे से सटे हुए हैं.

एक अन्य रपोर्ट के अनुसार, ग्राम प्रधान यज्ञ दत्त ने सपाही गांव में अपने घर के सामने स्थित के तालाब पर भी कथित तौर पर कब्जा जमा लिया है. इसके पानी का इस्तेमाल वह सिर्फ अपने खेतों की सिंचाई के लिए करता है. और तालाब में मछलियां पालकर बेचता है.

हालांकि अब इस तालाब को कब्जा करने के लिए डीएम अंकित कुमार अग्रवाल ने घोरावल तहसीलदार सुरेश चंद्र को आदेश दे दिया है.

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इस मामले में घोरावल के तहसीलदार सुरेश चंद्र ने बताया है कि तालाब के संबंध में उनके पास डीएम का फोन आया था. इस  पर अमल किया जा रहा है. तालाब को सील करने के लिए लोकपाल को भेजा गया है.

इस बाबत पूछे जाने पर लेखपाल राजकुमार श्रीवास्तव ने बताया कि तालाब से प्रधान के उपकरण हटा दिये गये हैं. आदिवासी ग्रामीणों ने बताया है कि प्रधान किसी को तालाब का पानी नहीं लेने देता था और तालाब की मछलियां भी खुद रख लेता था.

वास्तव में प्रधान यज्ञ दत्त के पास कितनी भूमि है,  इस बारे में लेखपाल ने बताया कि प्रधान के परिवार के पास तीनों गांवों में लगभग 300 बीघा भूमि है. राजनीतिक पहुंच की वजह से वह तीनों गांवों में प्रभावशाली व्यक्ति है. ग्राम प्रधान भूमि का किराया वसूला करता था और उसने यह काम लगातार कई सालों तक किया. दूसरी तरफ, यज्ञ दत्त के वकील केएन मिश्रा ने इन आरोपों को बेबुनियाद बताया है. उनका कहना है कि प्रधान की अपनी भूमि अतिक्रमण किया गया है. एक अखबार से बातचीत के दौरान केएन मिश्रा ने बताया है कि जिन लोगों ने यज्ञ दत्त और उसके परिवार की भूमि पर कब्जा किया है वे गोंड आदिवासी हैं.

तालाब पर कब्जे की बात से इनकार

एक अंग्रेजी अखबार के अनुसार, 2017 में यज्ञ दत्त और उनके परिवार के 10 सदस्यों ने विवादित भूमि में से 145 बीघा जमीन बिहार कैडर के सेवानिवृत आईएएस अधिकारी की पत्नी और पुत्री (पुत्री के पति भी आईएसएस अधिकारी हैं) से खरीदी है. उसी समय से वह यहां खेती करने वाले आदिवासियों से भूमि लेना चाहता था. इस मामले में आदिवासियों ने इस भूमि की खरीद को गैरकानूनी बताते हुए राजस्व विभाग के पास  शिकायत दर्ज करायी थी. इसके साथ ही सिविल कोर्ट में एक याचिका भी दाखिल की गयी है.

इसी मामले में गत वर्ष ग्राम प्रधान यज्ञ दत्त और उसके परिवार ने आदिवासियों के खिलाफ तीन मुकदमे दर्ज कराये थे. दो मुकदृमों में 25-25 लोगों के नाम थे, जबकि तीसरे में पांच लोगों को नामजद बनाया गया था.

हालांकि इन तीनों मामलों में अब तक एक भी गिरफ्तारी नहीं हई है. भूमि का विवाद पांच दशक पुराना है.

पुलिस के अनुसार उत्तर प्रदेश जमींदारी एवं भूमि सुधार अधिनियम 1950 के तहत 1951 में लगभग 600 बीघा भूमि को अनुपजाऊ बताकर इसे ग्रामसभा की जमीन घोषित कर दिया गया. लेकिन स्थानीय लोगों ने इस इस भूमि पर खेती करना शुरू कर दिया.

आदिवासियों के वकील नित्यानंद द्विवेदी ने मामले में बताया कि 1955 में तहसीलदार की ओर से 463 बीघा जमीन आदर्श सहकारी समिति नाम के नाम कर दी गयी. इस समिति में उस समय 10 सदस्य थे और बिहार कैडर के आईएएस अधिकारी के ससुर इसके अध्यक्ष बनाये गये. तब से ये लोग यहां खेती करने वाले  आदिवासियों से भूमि वापस लेना चाहते हैं.

इस दौरान, 1989 में समिति के अध्यक्ष का निधन हो गया. इसके बाद 145 बीघा भूमि एसडीएम के आदेश पर आईएएस अधिकारी की पत्नी और पुत्री के नाम पर कर दी गयी. यही भूमि यज्ञ दत्त और 10 अन्य लोगों ने लगभग दो करोड़ रुपये में खरीदी है. इसकी खबर मिलने पर यहां खेती करने वाले आदिवासियों ने राजस्व विभाग से शिकायत की. लेकिन अधिकारी खामोश बैठे  रहे.

वकील द्विवेदी का कहना है कि उत्तराधिकार परिवर्तन के विरुद्ध जनवरी 2018 में एक अपील सिविल कोर्ट में विचाराधीन है. उत्तराधिकार में बदलाव के लिए छह जुलाई को जिला प्रशासन के अधिकारियों को दी गयी  अपील खारिज हो चुकी है. इसके ठीक एक सप्ताह के बाद हत्याकांड में 10 लोगों की हत्या हुई.

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