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अच्छाई की अनंत यात्रा की शुरूआत अंतर्यात्रा से जरूरी

अग्निमीले पुरोहितं यज्ञस्य देवं ऋत्विजम्. होतारं रत्नधात्मम. यानी-अग्निमीले(प्रकाश रूप ईश्वर की उपासना करो) पुरोहितं यज्ञस्य देवं (वह अभिमुख है, साधना का लक्ष्य है) ऋत्विजम् होतारं (सतत साधना से प्रकट होता है प्रेरक) रत्नधात्मम(सकल ऐश्वर्यों का स्वामी है). अर्थात् आओ हम प्रकाश रूपी ईश्वर की उपासना करें. वही अभिमुख है, साधना का लक्ष्य है. वह सकल ऐश्वर्यों का स्वामी है जो सतत साधना से प्रकट होता है. (ऋग्वेद- प्रथम सुक्त)

अच्छाई की अनंत यात्रा की शुरूआत अंतर्यात्रा से जरूरी
Mayank Murari

जीवन को शुभ और सुंदर बनाना हो, तो स्वयं को अच्छाई का प्रतिरूप बनाना होता है. अच्छाई के कई रूप हैं. हर गति और क्रिया जिसका अर्थ निकलता है. वहां अच्छाई छिपी है. फिर भी हम खुद को अपूर्ण मानते हैं. पूर्णता के लिए अच्छाई खोजते हैं. लेकिन हम अच्छाई का पूर्ण प्रतिमान नहीं बन पाते. अच्छाई का ज्ञान कहां से मिलेगा? कहां है सत्य? यह जीवनभर हमें झकझोरता है. कमी का एहसास दिलाता है.

 

अच्छाई किसी किताब में, किसी व्यक्ति में या किसी उपदेश और सीख में ही हो, यह जरूरी नहीं. यह हर कण और हर क्षण में है. यह एक छोटे कण में भी समावेशित है, जो शुरूआत में पहाड़ के साथ जुटा था.

बाद में पहाड़ टूटा तो वह खुरदुरा और नुकीला पत्थर के रूप में अलग हुआ. वह पहले पहाड़ की तलहटी में पड़ा रहा, फिर जल की धारा उसे बहाकर नाली, नाली से छोटी नदी और फिर बड़ी नदी में ले गयी. वह जल के नीचे गति करते हुए लुढ़कता रहा, घिसता रहा और तब चमकीला शालिग्राम बनकर मंदिर में प्रतिष्ठित हो गया.

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कभी वही पत्थर से बना बालू का जर्रा घर का आधार बना. भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरूजी ने पत्रों की एक श्रृंखला में इस बात का उल्लेख कर कहा कि यह पृथ्वी एक किताब है. हमें एक छोटा सा रोड़ा बहुत सारी बातें बता सकता है, तो और दूसरी चीजें जो हमारी चारों ओर हैं, हमें और कितनी बातें कह सकती है!

संसार एक खुली किताब है. और उसमें दृश्यमान रूप, तत्व या शब्द उस किताब के विभिन्न पृष्ठ. हम उसे पढ़ते नहीं. अगर हमें नदी, पहाड़, मंदिर, जंगल, प्रकृति, शब्द को पढ़ने आ गया, तो उससे अच्छाई की एक धारा फूट पड़ेगी. हमारे आंखों के सामने प्रकृति खुली पड़ी है, हम इसे पढ़ना और समझना सीख ले, तो कई सुंदर कहानियां बन जायेगी.

अच्छाई खोजना है, तो चलना होगा. उपनिषद कहते हैं- चरैवेति, चरैवेति अर्थात् चलते रहो. चलते रहने का नाम ही जीवन है.

 

जीवन का तात्पर्य ही गतिशील रहना है. गति है, तो सबकुछ ठीक. अन्यथा कहीं रुक गये, तो हमारे लिए कुछ नहीं रूकेगा. इस सृष्टि में सबकुछ गतिशील है. सब अपने इच्छित लक्ष्य के लिए क्रियाशील हैं.
गतिशीलता सद्विचार पर आधारित होती है. इन सद्विचार को कहां खोजा जाए? ये अच्छाईयां कहां मिलें. यह हमारी दृष्टि, सोच एवं कौतुकता से जुड़ी बात है. अच्छाई के लिए अन्वेषण करना होगा, स्वयं से सवाल करना होगा और सत्य के साथ खड़ा होना होगा.

अच्छाई हर पल, हर जगह है. हम कौतुक होकर खोजेंगे, तो मिलेगा. अनुभव करेंगे, तो हरेक वस्तु या तत्व स्वयं को प्रकट करेगा. हम पर्याप्त करुणा से परिपूर्ण है, तो सृष्टि के हरेक तत्व अपने रहस्य को उदिघाटित कर देंगे. हम खुद बहुत कम ही खोज करते हैं या अनुसंधान करते हैं. इसलिए कम पता चलता है.

दूसरी ओर ईश्वर हमारे माध्यम से कार्यरत हैं. इसलिए उसने अच्छाई और सुंदरता के कई प्रतिमान बनाये. उसने सृष्टि को सुंदर और सजीव बनाने के लिए फूल, पेड़, नदी, पहाड़, सूर्य, तारे जैसी वस्तुएं या पदार्थ बनाये. यात्रा, प्रार्थना, अभिवादन, संघर्ष, समय, स्थान जैसे शब्द की रचना की.

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हरेक दृश्यमान या अस्तित्व वाले पदार्थ, शब्द, भाव, वस्तु या स्थिति में अच्छाईयां अंतर्निहित हैं. हम शांत हैं, करुणा से भरे हैं, तो बहते झरनों में किताबें, पत्थर में उपदेश, वृक्ष में मस्तिष्क, मिट्टी या पौधों में रोगमुक्ति के ज्ञान को प्राप्त कर सकते हैं.

अच्छाई अगर हमारा लक्ष्य है, तो यह मिलेगा. भगवान राम ने इसे मर्यादा से, श्रीकृष्ण ने योग से, महात्मा बुद्ध ने करुणा से, महावीर ने अहिंसा से, सुकरात ने सत्यता से, विवेकानंद ने सेवा से अच्छाई का मार्गदर्शन पाया. डॉ जार्ज वाशिंगटन कार्वर अमेरिका के एक कृषि वैज्ञानिक थे, जिन्होंने मूंगफली, शकरकंद और सोयाबीन से नये उत्पाद विकसित किये.

उनकी कृषिगत खोज से दक्षिण अमेरिका की कृषि अर्थव्यवस्था में क्रांति आयीं. उनका कहना है कि यह सृष्टि कार्यशाला है. जीवन में ऐसा कुछ भी नहीं, जिसे मैंने चाहा हो और उसके लिए ईश्वर ने सरल मार्ग नहीं सुझाया हो. उन्होंने मूंगफली और शंकरकंद से वार्तालाप की और उनके क्रमशः 300 एवं 150 नये प्रयोग किये. वे कहते हैं, जब मैं नन्हे फूल व मूंगफली से बात करता हूं तो वे अपना रहस्य मेरे सामने रख देते हैं.

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हम सोचते हैं कि कहां है अच्छाई ? क्या प्रेरणा दे सकता है? एक व्यक्ति ईश्वर से पूछा कि प्रभु! हमें यह बताइये कि इस सृष्टि की रचना क्यों की गयी थी. ईश्वर ने जवाब दिया कि तुम अपने मानसिक क्षमता से ज्यादा बड़ा सवाल कर रहे हो. फिर उस व्यक्ति ने कहा कि अच्छा यह बताइये कि मानव की रचना किसलिए की गयी?

ईश्वर ने कहा कि अभी भी सवाल बड़ा है. इसे सीमित करो. तब व्यक्ति ने पूछा कि यह मूंगफली क्यों बनायी गयी थी ? ईश्वर बोले-यह ठीक है, लेकिन इसका जवाब भी अनंत है. मूंगफली के विषय में क्या जानना चाहते हो? तब व्यक्ति ने कहा कि मैं मूंगफली से दूध बना सकता हूं?

ईश्वर बोले-कैसा दूध! जर्सी दूध, सादा, गाढ़ा या कुछ और. तब ईश्वर ने उस व्यक्ति को मूंगफली से विभिन्न प्रकार के दूध एवं अन्य उत्पाद बनाने की कला सिखायी.

चीनी दार्शनिक लाओत्से ने कहा कि जो नहीं दिखता उसे देखो, उसे सुनो जो सुनने के लिए कान नहीं लगाये गये, और जहां नहीं पहुंचा जा सकता वहां जाने का प्रयास करो. जीवन में अच्छाई को पाना है या सत्य की ओर यात्रा करनी है, तो समर्पण करना होगा. झुकना होगा. खाली होना होगा.

तभी स्वीकार सकेंगे, संवाद कायम हो सकेगा और समझ सकेंगे. जीवन के विविध स्त्रोतों एवं तत्वों से निकलती अच्छाईयों को, जो हर जगह है. हर कण और क्षण में समाहित है.

याद है, बचपन में मेरी बड़ी बेटी जिया ने सवाल किया था ? पढ़ाई क्यों जरूरी है ? मैंने कहा ज्ञान के लिए. तब उसका सवाल था कि इसके लिए स्कूल जाने ही जरूरी क्यों ? इसी प्रकार अच्छाई के लिए अंतर्यात्रा करनी होगी. स्वयं के अंदर, स्वयं से बाहर. इस समय और समाज के साथ. अच्छाई की खोज के दौरान मैंने मां को खोया. तब मुझे आंसू की अच्छाई का बोध हुआ.

आंसू की महिमा निराली है. बड़ी से बड़ी परेशानी को पल में धोकर बहा ले जाती है. इससे व्यक्ति अनुभव को प्रगाढ़ करता है.नदी क्या है ? नदी यानी बूंद-बूंद पानी का असीम स्वरूप. एक यात्रा. सभ्यता का, परंपरा का, उत्सव का, रचनात्मकता का. जीवन भी बूंद-बूंद भरता है. चूंकि अच्छाई की यात्रा अनंत है, अतएव खोज भी जारी रहेगी.

अच्छाई की यात्रा खुद से शुरू होती है. इसके बाद परिवार में इसका ज्ञान बोध होता है. हमारे बच्चे, हमारे माता और पिता, हमारे दोस्त व साथी, हमारे सहकर्मी और इनके साथ घुलामिला हमारी दिनचर्या के साथ अच्छाईयां लगातार सन्निहित रहती है. हमारे पास समय नहीं है कि हम खोजें.

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