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शाहीन बाग में बैठी जमात को सीएए पर भरोसा या अफवाह की राहों पर!

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Murali Manohar Srivastava

शाहीन बाग में नागरिकता संशोधन एक्ट के विरोध में पिछले एक माह से अधिक से विरोध प्रदर्शन जारी है. एक तरफ जहां देश की संसद में इस बिल को एक्ट की मान्यता मिल चुकी है. वहीं सड़कों पर सत्तानसीन होने के लिए विपक्षी पार्टियां इस मुद्दे पर जमकर राजनीति कर रही है. ऐसा नहीं कि केवल राजनीति ही हो रही बल्कि इस पर विरोध प्रदर्शन लंबे समय से जारी है.

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नागरिकता संशोधन एक्ट और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर के खिलाफ देश के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है. थोड़ी धूमिल पड़ती इसकी आंच को फिर से हवा देकर इसमें लहर पैदाकर सियासत भी कम नहीं हो रही है. मंगलवार को शाहीन बाग में जारी प्रदर्शन से जुड़ा मामला सुप्रीम कोर्ट में भी उठ सकता था. दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी पुलिस की अपील अभी तक काम नहीं कर पा रही है.

लोकतंत्र में विरोध जताना कोई गलत बात नहीं है. मगर विरोध से किसी तरह की परेशानी होगी तो इसपर सवाल उठना लाजिमी है. शाहीन बाग में पिछले एक माह से विरोध प्रदर्शन के जारी रहने के कारण दिल्ली,नोएडा मार्ग पूरी तरह से बाधित है. जिससे आम जनता को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है.

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एक तरफ ये प्रदर्शनकारी कहते हैं कि नागरिकता संसोधन एक्ट के नहीं लागू होने के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं. वहीं दूसरी तरफ इनकी लड़ाई का खामियाजा नागरिकों को ही भुगतना पड़ रहा है. विरोध प्रदर्शन करने वाले लोगों की संख्या हजारों में है, इसलिए आम यात्रियों को इस मार्ग पर विरोध कर पाना उनके बूते का नहीं है.

इतना ही नहीं अब तो लोग गलती से भी उन राहों पर जाना नहीं चाह रहे हैं, कहीं उनके साथ किसी तरह की कोई घटना न हो जाए. खैर, मसला यहां विरोध जताने का है.

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शाहीन बाग में धरना पर बैठे प्रदर्शनकारियों में अधिकांशतः मुस्लिम महिलाएं हैं. यहां यह कैंपेने 15 दिसंबर 2019 से लगातार 24 घंटे नागरिकता संशोधन एक्ट और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर के खिलाफ चलाया जा रहा है.

सड़क से लेकर संसद तक इनके विरोध की आवाज जा चुकी है, इसके साथ ही शाहीन बाग की ग्रामीण जनता ने अपनी परेशानी को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर कर रखी है. जिसमें कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को उचित एक्शन लेने के लिए कहा था.

बावजूद इसके प्रदर्शनकारी अपनी मांग के समर्थन में धरना पर अड़े हुए हैं. ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि सुप्रीम कोर्ट इस मसले पर गंभीर कदम उठा सकती है.

देश का विकास कैसे होगा, इस मुद्दे को छोड़कर शाहीन बाग और जामिया सहित अन्य कई राज्यों में नागरिकता संशोधन एक्ट और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर के खिलाफ प्रदर्शन कर लोगों को कांग्रेस और सूबे की अलग-अलग पार्टियों का समर्थन मिल रहा है.

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हालांकि दिल्ली के शाहीन बाग में प्रदर्शन के एक माह बीत चुके हैं. लखनऊ के घंटाघर, प्रयागराज के रोशनबाग, कोलकाता के पार्क सर्कस, हावड़ा के पीलखाना, बिहार के गया का शांतिबाग, कानपुर के मोहम्मद अली पार्क, पुणे के कोंडवा में, अहमदाबाद के रखियाल और कोटा के ईदगाह मैदान में विरोध प्रदर्शन जारी है.

नागरिकता संशोधन एक्ट में बांग्लादेश, अफ़गानिस्तान और पाकिस्तान के छह अल्पसंख्यक समुदायों हिंदू, बौद्ध, जैन, पारसी, ईसाई और सिखद्ध से ताल्लुक़ रखने वाले लोगों को भारतीय नागरिकता देने का प्रस्ताव शामिल है. वर्तमान में भारतीय नागरिकता लेने के लिए जहां 11 साल भारत में रहना अनिवार्य था, उसे घटाकर पड़ोसी देशों के अल्पसंख्यकों के लिए 6 साल कर दिया गया है.

इतना ही नहीं इसके लिए नागरिकता अधिनियम 1955 में कुछ संशोधन भी होंगे, जिससे नागरिकता देने में क़ानूनी मदद की जा सके. साथ ही अवैध तरीके से रहने वालों के लिए संकट जरुर होगी.

बिल का विरोध यह कहकर किया जा रहा है कि एक धर्मनिरपेक्ष देश किसी के एक धर्म के आधार पर भेदभाव कैसे कर सकता है. विपक्ष अपना अलग राग अलापते हुए कह रहा है कि यह विधेयक मुसलमानों के ख़िलाफ़ है और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14: समानता का अधिकार का उल्लंघन करता है.

बांग्लादेश की सीमा से सटे भारत के पूर्वोत्तर राज्यों असम, मेघालय, मणिपुर, मिज़ोरम, त्रिपुरा, नगालैंड और अरुणाचल प्रदेश में भी इस विधेयक का विरोध हो रहा है. वजह भी है, क्योंकि इन राज्यों में बांग्लादेशी मुसलमान और हिंदू बड़ी संख्या में आकर बसे हुए हैं.

 

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अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों की कथित घुसपैठ की वजह से हुए जनांदोलनों के कारण असम भारत का पहला राज्य बना जहां वर्ष 1951 के बाद एनआरसी लिस्ट अपडेट किया गया. 1986 में सिटिज़नशिप एक्ट में संशोधन कर उसमें असम के लिए विशेष प्रावधान किया गया. 2005 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में बैठक में असम सरकार और आसू;ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन साथ-साथ केंद्र ने भी हिस्सा लिया था.

सुप्रीम कोर्ट पहली बार इस प्रक्रिया में 2009 में शामिल हुआ और 2014 में असम सरकार को एनआरसी को अपडेट करने की प्रक्रिया पूरी करने का आदेश दिया. इस तरह 2015 से सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में यह पूरी प्रक्रिया एक बार फिर शुरू हुई. 31 अगस्त 2019 को एनआरसी की आख़िरी लिस्ट जारी कर दी गयी. जिसमें 19,06,657 लोग इस सूची से बाहर हो गये.

एनआरसी से पता चलता है कि कौन भारतीय नागरिक है और कौन नहीं जिसका नाम इस लिस्ट में नहीं उसे अवैध निवासी माना जाता है.

मोदी सरकार ने अपने पिछले कार्यकाल में पेश किए गए बिल में कहा था कि पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश से आये हिंदू, सिख, पारसी, जैन और दूसरे धर्मावलंबियों को कुछ शर्तें पूरी करने पर भारत की नागरिकता दी जाएगी.

मगर2016 नागरिकता संशोधन बिल में मुसलमानों का ज़िक्र तक नहीं था. नागरिकता अधिनियम 1955 भारतीय नागरिकता से जुड़ा एक विस्तृत क़ानून है. जिसमें किसी व्यक्ति को भारतीय नागरिक होने के जरुरी शर्तों का जिक्र किया गया है.

इस अधिनियम में अब तक पांच बार;1986,1992,2003,2005 और 2015 में संशोधन किया जा चुका है. इस संसोधन को लेकर वर्तमान सरकार पर यह भी आरोप लग रहा है कि हिंदू मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए प्रवासी भारतीयों को भारत की नागरिकता देना चाह रही है.

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