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मुक्तिबोध की किताब कामायनी: एक पुनर्विचार’ के प्रकाशित होने की रोचक कहानी

गजानन माधव मुक्तिबोध की जयंती पर विशेष

Naveen Sharma

Ranchi : गजानन माधव मुक्तिबोध वैसे कवि नहीं हैं जिनकी कविताएं पढ़ कर सामान्य पाठक आनंदित हो सके. उनकी कविताएं पढ़ना कुछ कुछ वैसा ही है जैसे किसी पहाड़ पर चढ़ना या किसी घने जंगल से होकर गुजरना. खासकर उनकी लंबी कविताएं अंधेरे में और चांद का मुहं टेढा है. मैंने सिविल सर्विस मेन एक्जाम के लिए मुक्तिबोध की ये दोनों कविताएं पढ़ी थी. इन्हे पढ़ने व समझने के लिए अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती है.

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अंतर्वस्तु जितनी व्यापक है, उससे भी ज्यादा गहरी

दरअसल, मुक्तिबोध के काव्य की अंतर्वस्तु जितनी व्यापक है, उससे भी ज्यादा गहरी है. अपनी रचनाओं के माध्यम से वे समाज, जीवन और युग के जिस यथार्थ का साक्षात्कार करते हैं और जिसे अभिव्यक्त करते हैं, वह वस्तुतः जटिल और इतना उलझा हुआ और षड्यंत्रियों से पटा हुआ है कि उसे सीधे-सीधे पकड़ पाना या अभिव्यक्त कर पाना मुक्तिबोध के लिए स्वभावतः ही संभव नहीं था.

स्केच : प्रभात ठाकुर, कला निर्देशक, बॉलीवुड .

उनकी अन्तर्वस्तु में राजनीति की उलझी हुई, पेंचदार बाजियों, नेताओं के भ्रष्टाचार और इसकी जड़ें समाज में रह रहे मध्यवर्गीय, बुद्धिजीवी व्यक्ति के मन के बाह्य और भीतरी संघर्ष, निरन्तर विघटित होते मूल्यों के बीच में जिंदा रहने की छटपटाहट में फंसे हुए जन तथा इसके साथ ही साहित्य से जुड़े हुए तमाम-तमाम सवाल भी हैं.

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मुक्तिबोध को हिंदी साहित्य में चमकते सितारे में तब्दील करने में हिंदी साहित्य के नामचीन समालोचक नामवर सिंह की भूमिका काफी अहम रही हैं.

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हरिशंकर परसाई की नजरों से मुक्तिबोध

हरिशंकर परसाई ने मुक्तिबोध पर एक संस्मरण लिखा था. इसमें वे कामायनी: एक पुनर्विचार’ के प्रकाशित होने की कहानी बताते हैं. परसाई लिखते हैं कि कामायनी: एक पुनर्विचार’ को छापने के लिए एक पुस्तक विक्रेता मित्र शेषनारायण राय राजी हो गए थे. वे पेशे से प्रकाशक नहीं हैं. पैसा लगा देने को तैयार थे. मुक्तिबोध जी पर उनकी श्रद्धा थी.

उस दौर में मुक्तिबोध को कोई प्रकाशक नहीं मिलता था. पुस्तक की कम्पोजिंग चल रही थी, तब वे जबलपुर आए. तीन दिन हो गए पर उन्होंने न किताब की बात की, न राय से मिलने की इच्छा.

पहले तो रात-दिन पुस्तक छापने की लौ लगी रहती थी और अब यह विराग. मैंने कहा, ‘आप प्रकाशक से तो मिल लीजिए. वे यहीं पास में रहते हैं.’ मुक्तिबोध खिन्न भाव से बोले, ‘मिल लेंगे पार्टनर. कोई उससे मिलने थोड़े ही आए हैं.’

मैंने कहा, ‘सच बताइए मामला क्या है?’ वे बोले, ‘अब पाण्डुलिपि तो दे ही चुके हैं. अमुक साहब कह रहे थे कि आप बुरे फंस गए. वह राय तो बहुत खराब आदमी है. खैर! मैंने राय से कहा, राय हंसा. कहने लगा- वही साहब मुझसे कह गए थे कि तुम पैसा पानी में डाल रहे हो. उस किताब को कौन खरीदेगा.’

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पेशगी में रुपये मिले तो बच्चों की तरह खुश हुए

मुक्तिबोध उनका विश्वास करते थे. वे बड़े हैरान हुए. कहने लगे- आखिर उसने ऐसा किया क्यों? बाद में राय ने उन्हें रुपये पेशगी दिए. दुकान से वो कुछ किताबें भी ले गए. बहुत गदगद थे. ऐसे मौकों पर वे बच्चे की तरह हो जाते थे- वाह पार्टनर, आपका यह राय भी मजे का आदमी है. उसने इतने रुपये दे दिए.

अगर उन्हें किसी से मुश्किल से सौ रुपये मिलने की उम्मीद है और वह दो सौ रुपये दे दे, तो वह चकित हो जाते. कहते- पार्टनर, यह भी बड़ी मजे की बात है. उसने तो दो सौ रुपये दे दिए. इतने रुपये कोई कैसे दे देता है.

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प्रकाशक को लिखा, पुस्तक अच्छी छपनी चाहिए

इस पुस्तक का प्रकाशन वो अपने ऊपर अहसान मानते थे. राजनांदगांव से उन्होंने राय को अंग्रेजी में एक चिट्ठी लिखी, जो कोई लेखक प्रकाशक को नहीं लिखेगा. लिखा था- पुस्तक अच्छी छपनी चाहिए. मैं आपको लिखकर देता हूं कि मुझे आपसे एक भी पैसा नहीं चाहिए बल्कि आपका कुछ ज़्यादा खर्च हो जाए तो मैं हर्जाना देने को तैयार हूं.

राजनांदगांव में वे अपेक्षाकृत आराम से रहे. शरद कोठारी तथा अन्य मित्रों ने उनके लिए सब कुछ किया. पर वे बाहर निकलने को छटपटाते थे. वे साल में एक-दो बार किसी सिलसिले में जबलपुर आते और खूब खुश रहते, रंगीन सपने में डूबते हुए कहते- पार्टनर ऐसा हो कि एक बड़ा-सा मकान हो. सब सुभीते हों. कोई चिंता न हो.

वहां हम कुछ मित्र रहें. खूब बातें करें, खूब लिखे-पढ़ें और जंगल में घूमें. फिर कहते- आप राजनांदगांव आइए. वहीं कुछ दिन रहिए. बहुत बड़ा मकान है. कोई तकलीफ नहीं होगी. नो, नो, आई इनवाइट यू.

मुक्तिबोध की आर्थिक दुर्दशा किसी से छिपी नहीं थी. उन्हें और तरह के क्लेश भी थे. भयंकर तनाव में वे जीते थे. पर फिर भी बेहद उदार, बेहद भावुक आदमी थे. उनके स्वभाव के कुछ विचित्र विरोधाभास थे.

पैसे की तंगी में जीनेवाले, पैसे को लात भी मारते थे

पैसे-पैसे की तंगी में जीनेवाला यह आदमी पैसे को लात भी मारता था. वे पैसा देनेवाली पत्रिकाओं में लिखकर आमदनी बढ़ा सकते थे पर लिखते नहीं थे. कहते- अपनी पत्रिका में लिखेंगे. बस मुझे कागज आप दे दीजिए.
यों वे बहुत मधुर स्वभाव के थे. खूब मजे में आत्मीयता से बतियाते थे.

मगर कोई वैचारिक चालबाजी करे या ढोंग करे तो मुक्तिबोध चुप बैठे तेज नज़र से उसे चीरते रहते. उस वक्त उनके ओंठ किसी बदमाश स्कूली लड़के की तरह मुड़ जाते.

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अंधेरे में कविता का अंश
अकस्मात्
चार का ग़जर कहीं खड़का
मेरा दिल धड़का,
उदास मटमैला मनरूपी वल्मीक
चल-विचल हुआ सहसा.
अनगिनत काली-काली हायफ़न-डैशों की लीकें
बाहर निकल पड़ीं, अन्दर घुस पड़ीं भयभीत,
सब ओर बिखराव.
मैं अपने कमरे में यहाँ लेटा हुआ हूँ.
काले-काले शहतीर छत के
हृदय दबोचते.
यद्यपि आँगन में नल जो मारता,
जल खखारता.
किन्तु न शरीर में बल है
अँधेरे में गल रहा दिल यह.
एकाएक मुझे भान होता है जग का,
अख़बारी दुनिया का फैलाव,
फँसाव, घिराव, तनाव है सब ओर,
पत्ते न खड़के,
सेना ने घेर ली हैं सड़कें.
बुद्धि की मेरी रग
गिनती है समय की धक्-धक्.
यह सब क्या है
किसी जन-क्रान्ति के दमन-निमित्त यह
मॉर्शल-लॉ है!
दम छोड़ रहे हैं भाग गलियों में मरे पैर,
साँस लगी हुई है,
ज़माने की जीभ निकल पड़ी है,
कोई मेरा पीछा कर रहा है लगातार
भागता मैं दम छोड़,
घूम गया कई मोड़,
चौराहा दूर से ही दीखता,
वहाँ शायद कोई सैनिक पहरेदार
नहीं होगा फ़िलहाल
दिखता है सामने ही अन्धकार-स्तूप-सा
भयंकर बरगद–
सभी उपेक्षितों, समस्त वंचितों,
ग़रीबों का वही घर,वही छत,
उसके ही तल-खोह-अँधेरे में सो रहे
गृह-हीन कई प्राण.
अँधेरे में डूब गये
डालों में लटके जो मटमैले चिथड़े
किसी एक अति दीन
पागल के धन वे.
हाँ, वहाँ रहता है, सिर-फिरा एक जन.
किन्तु आज इस रात बात अजीब है.
वही जो सिर फिरा पागल क़तई था
आज एकाएक वह
जागृत बुद्धि है, प्रज्वलत् धी है.
छोड़ सिरफिरापन,
बहुत ऊँचे गले से,
गा रहा कोई पद, कोई गान
आत्मोद्बोधमय!!
खूब भई,खूब भई,
जानता क्या वह भी कि
सैनिक प्रशासन है नगर में वाक़ई!
क्या उसकी बुद्धि भी जग गयी!
(करुण रसाल वे हृदय के स्वर हैं
गद्यानुवाद यहाँ उनका दिया जा रहा है)
“ओ मेरे आदर्शवादी मन,
ओ मेरे सिद्धान्तवादी मन,
अब तक क्या किया?
जीवन क्या जिया!!
उदरम्भरि बन अनात्म बन गये,
भूतों की शादी में क़नात-से तन गये,
किसी व्यभिचारी के बन गये बिस्तर,
दुःखों के दाग़ों को तमग़ों-सा पहना,
अपने ही ख़यालों में दिन-रात रहना,
असंग बुद्धि व अकेले में सहना,
ज़िन्दगी निष्क्रिय बन गयी तलघर,
अब तक क्या किया,
जीवन क्या जिया!!
बताओ तो किस-किसके लिए तुम दौड़ गये,
करुणा के दृश्यों से हाय! मुँह मोड़ गये,
बन गये पत्थर,
बहुत-बहुत ज़्यादा लिया,
दिया बहुत-बहुत कम,
मर गया देश, अरे जीवित रह गये तुम!!
लो-हित-पिता को घर से निकाल दिया,
जन-मन-करुणा-सी माँ को हंकाल दिया,
स्वार्थों के टेरियार कुत्तों को पाल लिया,
भावना के कर्तव्य–त्याग दिये,
हृदय के मन्तव्य–मार डाले!
बुद्धि का भाल ही फोड़ दिया,
तर्कों के हाथ उखाड़ दिये,
जम गये, जाम हुए, फँस गये,
अपने ही कीचड़ में धँस गये!!
विवेक बघार डाला स्वार्थों के तेल में
आदर्श खा गये!
अब तक क्या किया,
जीवन क्या जिया,
ज़्यादा लिया और दिया बहुत-बहुत कम
मर गया देश, अरे जीवित रह गये तुम…”

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