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माफिया और विभाग की मिलीभगत से हो रहा है बालू का अवैध कारोबार, DC की एक रिपोर्ट से हुआ खुलासा

Akshay Kumar Jha

Ranchi: हर जिले में बालू की कालाबाजारी कई सालों से जारी है. प्रशासन के लाख कोशिशों के बाद भी इसपर नकेल नहीं कसा जा सका है. वजह यह है कि खनन विभाग के जिला स्तर अधिकारी से लेकर पुलिस तक बालू की कालाबाजारी करने में माफिया की मदद करती है. इस बात का खुलासा एक जांच रिपोर्ट से हुआ है. जांच गढ़वा के तत्कालीन डीसी हर्ष मंगला ने की थी.

गढ़वा जिला बालू कारोबारियों के लिए काफी माकूल जगह है. यूपी से सटे होने और सक्रिय सिंडीकेट की वजह से इस जिले में सफेद बालू का काला कारोबार बखूबी फल-फूल रहा है. जांच रिपोर्ट में बालू माफिया किस तरह से सक्रिय हैं, उसकी पूरी कुंडली है. कमोबेश पूरे राज्य में बालू को लेकर यही स्थिति बनी हुई है.

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बालू की कमी और उसकी कालाबाजारी की शिकायत बार-बार आने के बाद तत्कालीन डीसी हर्ष मंगला ने जांच की. गढ़वा में दो सक्रिय सरकारी बालूघाट हैं. पाचाडुमर और खरसोता. पाचाडुमर बालू घाट की जांच की गयी. जांच रिपोर्ट एनजीटी की बालू उठाने की पांबदी हटने के बाद की है. नवंबर से 9 जनवरी 2020 तक हुई इस जांच रिपोर्ट से साफ पता चलता है कि कैसे गढ़वा जिले में बालू का अवैध कारोबार चल रहा है.

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जानिए कैसे चलता है झारखंड में बालू का अवैध कारोबार 

–     गढ़वा जिले से बालू खनन का अधिकांश मात्रा राज्य से बाहर यानी उत्तर प्रदेश चला जाता है. जनवरी महीने में सिर्फ 09 दिनों में 62.45 फीसदी बालू (71600CFT) बालू राज्य से बाहर भेज दिया गया.

–     बालू खरीदने वाले माफिया अधिकांश कोटे को अपने नाम बुक करा लेते हैं. ऐसा बिना खनन विभाग के अधिकारियों और कर्मियों के मिलीभगत से हो ही नहीं सकता.

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–     जिस सॉफ्टवेयर से बालू बिक्री का काम संचालित होता है. उसमें ऐसा कोई सिस्टम नहीं है जिससे एक ही पार्टी की तरफ से की जा रही बार-बार बालू की खरीद पर रोक लगायी जा सके. कोई भी जितनी बार चाहे बालू बुक कर सकता है. एक सीमा बंधी हुई है कि कोई भी पार्टी एक बार में 2000 सीएफटी खरीद सकता है. लेकिन कितनी बार, उसपर रोक नहीं है. एक ही पार्टी सैकड़ों बार साइट से बालू बुक करा लेता है.

–     जांच की अवधि के बीच ऐसा देखा गया है कि एक गाड़ी 11, 12, 17, 19, 22 और 24 ट्रिप तक लगाता है. इससे साफ होता कि बालू के कारोबार में किसी खास आदमी का एकाधिकार है.

–     खनन विभाग के अधिकारी कब बालू की उपलब्धता साइट पर अपलोड करेंगे, उसका कोई समय सीमा तय नहीं है. इससे आम लोगों को पता ही नहीं चलता कि बालू की उपलब्धता है या नहीं. माफिया को फायदा पहुंचाने के लिए खनन विभाग के अधिकारी जब माफिया चाहते हैं, बालू की जानकारी साइट पर लोड होती है. जैसे ही जानकारी अपलोड होती है, माफिया बालू बुक करा लेते हैं.

–     डीसी लिखते हैं कि इनसाइडर इन्फॉर्मेशन होने की वजह से आम लोगों को इस अपलोड किये गये बालू का कोई फायदा नहीं मिल पा रहा है. क्योंकि इसे बुक करने वाले सिस्टम, बुक करने वाले व्यक्ति, अपलोड करने वाला सरकारी कर्मी और बालू खरीदने वालों माफिया की मिलीभगत होती है.  जिससे ये सारी व्यवस्था चलती है. जांच के बाद यह स्पष्ट होता है कि बालू की जानकारी अपलोड होने के बाद, कुछ ही मिनटों में बालू बुक हो जाती है. ऐसा अधिकतम 36 मिनटों में हुआ पाया गया है.

–     तत्कालीन डीसी हर्ष मंगला ने अपनी जांच रिपोर्ट में कहा है कि जांच से यह साफ होता है कि आम लोगों को बालू 2500-300 रुपए प्रति 100 सीएफटी मिलता है. लेकिन विभाग इस बालू को माफिया तक सिर्फ 750 रुपए प्रति 10 सीएफटी में पहुंचा देता है. इस हिसाब से सिर्फ दिसंबर और जनवरी में 280100 सीएफटी बालू का हिसाब लगाया जाए तो करीब 56 लाख रुपए का मुनाफा बालू माफिया ने कालाबाजारी कर बनाया.

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–     बालू माफिया जिस नाम और पते का इस्तेमाल बालू उठाव के लिए करते हैं. वो करीब-करीब फर्जी होता है. माफिया जहां चाहते हैं बालू वहां ले जाते हैं. जांच के दौरान ऐसे कई उदाहरण मिले हैं.

–     विभाग के लोगों की माफिया से मिलीभगत ऐसे समझा जा सकती है कि बालू बुक करते वक्त माफिया जिस नाम और पता का जिक्र करते हैं, वो चालान में नहीं होता. चालान में किसी और नाम और पता का जिक्र होता है. इससे स्पष्ट है कि निगमकर्मी और एम-जंक्शन ने गलत तरीके से माफिया को फायदा पहुंचाया.

–     जिस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल बालू खरीद के लिए किया जाता है, उसमें कई तरह की त्रूटियां हैं. उनमें से एक यह है कि बुकिंग की तिथि, समय एवं ट्रांजेक्शन की तिथि में काफी अंतर है. ऐसा क्यों किया गया है इसका कोई तथ्य नहीं दिया गया है.

–     ऐसे-ऐसे मामले पाये गये हैं जहां बुकिंग होने पर सात दिनों तक बालू का उठाव नहीं हुआ. फिर भी बुकिंग कैंसिल नहीं हुई. जबकि बुकिंग पर्ची पर यह साफ है कि ऐसा करने से बुकिंग रद्द कर दी जाएगी. इससे साफ होता है कि माफिया बुकिंग पर बालू छोड़ देते हैं. जैसे ही बालू की मांग होती उन्हें चालान निर्गत कर दिया जाता है.

कल पढ़िएः कौन है बालू के अवैध कारोबार का जिम्मेवार और कैसे लगेगी कालाबाजारी पर नकेल

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