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विश्व रंगमंच दिवस पर इप्टा व प्रलेस ने की विचार गोष्ठी, वक्ताओं ने कहा-जब तक डर रहेगा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं रहेगी

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Palamu : आदमी पारंपरिक तौर से डरा हुआ है. इस डर का संजाल सत्ता के द्वारा बनाया गया है. जब तक डर रहेगा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं रहेगी. पहली जरूरत है कि डर को बाहर निकाला जाय. उक्त बातें विश्व रंगमंच दिवस के मौके पर प्रगतिशील लेखक संघ व इप्टा द्वारा ‘अभिव्यक्ति-समस्या व समाधान’ विषय पर इप्टा कार्यालय में आयोजित विचार गोष्ठी में रचनाकारों व रंगकर्मीं को संबोधित करते हुए पत्रकार गोकुल बसंत ने कही.

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आज सवाल खड़ा करना काफी मुश्किल हो गया

गोष्ठी के प्रारंभ में प्रेम प्रकाश ने विषय प्रवेश कराते हुए वर्तमान स्थिति की विस्तृत चर्चा की. उन्होंने कहा कि आज सवाल खड़ा करना काफी मुश्किल हो गया है. अपने वक्तव्यों में रंगमंच दिवस के मकसद की चर्चा करते हुए कहा कि सन 1961 में इंटरनेशनल थियेटर इंस्टीट्यूट के द्वारा नब्बे देश के कलाकारों के बीच यह घोषणा की गई थी कि रंगमंच उपेक्षित आवाज को मजबूत करेगा, साथ ही एक सुंदर दुनिया के निर्माण के लिए शांति का व्यापक संदेश प्रसारित किया जाए.

रोजगार की बात करना देशद्रोह है

गोष्ठी के क्रम को आगे बढ़ाते हुए पीयूसीएल के अध्यक्ष नंदलाल सिंह ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को खतरे में बताते हुए कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बिना समाज जीवित नहीं रह सकता. उन्होंने ने अपने वक्तव्य में काश्मीरियों पर हो रहे अत्याचार पर चिंता व्यक्त की. गोष्ठी में नुदरत नवाज, रवि शंकर, विनोद पांडे, शीला श्रीवास्तव, शिवशंकर प्रसाद, गौतम चटर्जी ने अपने विचारों को व्यक्त करते हुए कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मांग नयी नहीं है. यह सवाल प्राचीन काल से उठाया जा रहा है. हमारे बोलने की आजादी को दो बड़ी सत्ता-राजनीतिक सत्ता व धार्मिक सत्ता के द्वारा दबाया जा रहा है. आज बोलने कहां दिया जा रहा है. अवाम मंदिर, मस्जिद, हिन्दू, मुसलमान, गोबर, मूत, गाय, सूअर की चर्चा में फंसा हुआ है. रोजगार की बात करना देशद्रोह है. ऐसी स्थिति में कलाकार व रचनाकार को अपनी अपनी विधा को लेकर संघर्ष की तैयारी करनी होगी, तभी हमारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार सुरक्षित रहेगा और समृद्ध होगा.

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सत्‍ता चाहती है रचनाकार या कलाकार मन की बात लिखे और बोले

गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे पंकज श्रीवास्तव ने विचारों को समेकित करते हुए कहा कि राज सत्ता बराबर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलने का काम करती रही है. सत्ता बराबर चाहती है कि रचनाकार या कलाकार उसके मन की बात लिखे और बोले. इस मौके पर इप्टा के कलाकारों ने यश मालवीय की कविता का सस्वर पाठ किया. गोष्ठी के अंत में ‘युद्धरत आदमी’ पत्रिका की संपादक सह मार्क्सवादी चिंतक रमणिका गुप्ता के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की गयी.

गोष्ठी में शशि पांडे, मनिष कुमार, सुजीत कुमार, वंदना श्रीवास्तव, अब्दुल हमीद ,एम्ब्रेसिया लकड़ा, इंतखाब असर, अशिवनि घई, आसिफ खान, अजीत ठाकुर, दिनेश शर्मा सहित कई लोग मौजूद थे.

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