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वो हिरोइन जिसने प्रधानमंत्री के हाथों NCC की बेस्ट कैडेट का तमगा हासिल करने का गौरव हासिल किया

जया भादुड़ी के जन्मदिन पर विशेष

Naveen Sharma

Ranchi : जया भादुड़ी का नाम लेने पर सबसे पहली उनकी जो फिल्म याद आती है वो गुड्डी. वो चुलबुली से अल्हड़ किशोरी की भूमिका में बहुत ही सहज व सुंदर लगी थीं. उनकी अभिनय प्रतिभा का कमाल कोशिश फिल्म में भी देखा जा सकता है.

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जया की अभिनय प्रतिभा की तुलना अमिताभ बच्चन से भी की जाए तो वो जबर्दस्त टक्कर देतीं नजर आतीं हैं. इनका मामला करीब करीब अभिमान फिल्म की कहानी जैसा लगता है जिसमें जया जिस गायिका के किरदार को निभा रही थीं वो पति बने अमिताभ की तुलना में ज्यादा बेहतर गायिका थीं.

इसके अलावा ज्यादा लोकप्रिय भी. यह स्थिति दोनों के बीच मनमुटाव पैदा करती है. खासकर पति के मेल इगो को यह बात बर्दाश्त नहीं होती की उसकी पत्नी की पूछ उससे ज्यादा है.

खैर असल जिंदगी में जया ने अमिताभ को इस स्थिति में आने से बचा लिया. बच्चों के लानन- पालन के लिए जया ने फिल्मों में काम करना बंद कर दिया था.

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पिता थे सुधांशु स्वतंत्रता सेनानी

जया भादुड़ी के पिता सुधांशु 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में शामिल हुए थे. पकड़े गए तो गलत नाम तरुण कुमार भादुड़ी बताया. इसके बाद इनका सुधांशु नाम लापता हो गया. वे ‘नागपुर-टाइम्स’ में पत्रकार थे.

1956 में वे ‘स्टेट्समैन’ के प्रतिनिधि के रूप में भोपाल चले गए. उन्होंने 1944 में पटना की इंदिरा गोस्वामी से विवाह किया. जया का जन्म 9 अप्रैल 1950 को हुआ. जया की दो छोटी बहनों के नाम नीता और रीता हैं.

जया भोपाल के सेंट जोसेफ कॉन्वेंट में पढ़ती थीं. खेलकूद में भी वे शिरकत करती थीं और 1966 में उन्हें प्रधानमंत्री के हाथों एन.सी.सी. की बेस्ट कैडेट होने का तमगा मिला था. उन्होंने छह साल तक भरतनाट्यम का प्रशिक्षण भी लिया था.

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सत्यजीत रे ने महानगर में दिया था ब्रेक

हायर सेकंडरी पास करने के बाद जया ने पुणे के फिल्म इंस्टीट्यूट में प्रवेश लिया था, लेकिन इससे पहले ही उन्होंने सिने करियर की शुरूआत 15 वर्ष की उम्र में निर्माता -निर्देशक सत्यजीत रे की बंग्ला फिल्म ‘महानगर’ से की. इसके बाद उन्होंने एक बंग्ला कामेडी फिल्म ‘धन्नी मेये’ में भी काम किया जो टिकट खिड़की पर सुपरहिट साबित हुई.

फिल्म पूरी होने के बाद सत्यजीत राय ने जया को जो प्रमाण-पत्र दिया था, उसका मजमून कुछ इस प्रकार था : ‘अभी तक मैंने जितने भी नवोदित कलाकारों के साथ काम किया, जया उनमें शायद सबसे अच्छी थी.’ जया ने फिल्म-इंस्टीट्यूट के आवेदन-पत्र के साथ इस सर्टिफिकेट की प्रति लगा दी थी. अब वहां उनका एडमिशन होना ही था.

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पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट में सीखीं अभिनय की बारीकियां

जया जब फिल्म इंस्टीट्यूट में पहुंचीं, तो उनके बैच में शत्रुघ्न सिन्हा, रेहाना सुल्तान और डैनी थे. पहली टर्न में ही उन्हें मेरिट स्कॉलरशिप मिल गई. पहली छात्रवृत्ति जया को, दूसरी डैनी को. ऋषिकेश मुखर्जी ने उन्हें देखते ही पसंद कर लिया था. जया इंस्टीट्यूट में पढ़ रही थीं कि बासु चटर्जी अपनी फिल्म में काम करने के लिए उनसे बात करने आए थे.

18 अगस्त 1970 को जया ने मोहन स्टूडियो में ऋषिकेश मुखर्जी की गुड्डी’ फिल्म की शूटिंग शुरू की. गुड्डी के सेट पर ही अमिताभ बच्चन, जलाल आगा और अनवर अली से जया की मुलाकात हुई थी.

1972 से 81 तक जया ने अमिताभ बच्चन के साथ बंसी-बिरजू, एक नजर,जंजीर, अभिमान, चुपके-चुपके, मिली, शोले और सिलसिला आठ फिल्में की थीं . ‘बाद में कभी खुशी-कभी गम’ में भी वे साथ-साथ आए थे.

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गुड्डी से हिंदी सिनेमा में शुरुआत

जया भादुड़ी को प्रारंभिक सफलता दिलाने में निर्माता-निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्मों का बड़ा योगदान रहा. उन्हें पहला बड़ा ब्रेक उनकी ही फिल्म ‘गुड्डी’1971 से मिला.

इस फिल्म में जया भादुड़ी ने एक ऐसी लड़की की भूमिका निभाई जो फिल्में देखने की काफी शौकीन है और अभिनेता धर्मेंद्र से प्यार करती है. अपने इस किरदार को जया भादुड़ी ने इतने चुलबुले तरीके से निभाया कि दर्शक उस भूमिका को आज भी भूल नहीं पाये हैं.

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ऋषिकेश मुखर्जी ने अभिनय प्रतिभा को निखारा

वर्ष 1972 में जया भादुड़ी को ऋषिकेश मुखर्जी की ही फिल्म ‘कोशिश’ में काम करने का अवसर मिला जो उनके सिने कैरियर के लिये मील का पत्थर साबित हुई. इस फिल्म की सफलता के बाद वह शोहरत की बुंलदियों परजा पहुंचीं.

वह इस फिल्म में दमदार अभिनय के लिये सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के फिल्म फेयर पुरस्कार से भी नामांकित भी की गयी. फिल्म ‘कोशिश’ में जया भादुड़ी ने गूंगे की भूमिका निभायी जो किसी भी अभिनेत्री के लिये बहुत बड़ी चुनौती थी.

बगैर संवाद बोले सिर्फ आंखों और चेहरे के भाव से दर्शकों को सब कुछ बता देना जया भादुड़ी की अभिनय प्रतिभा का ऐसा उदाहरण था. जिसे शायद ही कोई अभिनेत्री दोहरा पाये .

कोशिश की सफलता के बाद ऋषिकेश मुखर्जी जया भादुड़ी के पसंदीदा निर्देशक बन गये. बाद में जया भादुड़ी ने उन के निर्देशन में बावर्ची, अभिमान, चुपके-चुपके और मिली जैसी कई फिल्मों में अपने अभिनय का जौहर दिखाया.

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अमिताभ से दिल मिला शादी की

वर्ष 1972 में प्रदर्शित फिल्म ‘एक नजर के निर्माण के दौरान जया भादुड़ी का झुकाव फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन की ओर हो गया. इसके बाद जया भादुड़ी और अमिताभ बच्चन ने वर्ष 1973 में शादी कर ली. शादी के बाद भी जया भादुड़ी ने फिल्मों में काम करना जारी रखा.

वर्ष 1975 जया भादुड़ी के सिने कैरियर का अहम पड़ाव साबित हुआ. उस वर्ष उन्हें रमेश सिप्पी की सुपरहिट फिल्म ‘शोले’ में काम करने का मौका मिला. इस फिल्म के पहले उनके बारे में यह धारणा थी कि वह केवल रूमानी या चुलबुले किरदार निभाने में ही सक्षम है लेकिन उन्होंने अपने संजीदा अभिनय से दर्शको को मंत्रमुग्ध कर दिया .

17 साल तक फिल्म इंडस्ट्री से दूर रही

अस्सी के दशक में पारिवारिक जिम्मेदारियों को देखते हुए जया भादुड़ी ने फिल्मों में काम करना काफी हद तक कम कर दिया. यश चोपड़ा के निर्देशन में बनी वर्ष 1981 में प्रदर्शित फिल्म ‘सिलसिला’ उनके सिने करियर के पहले दौर की आखिरी फिल्म साबित हुई .

इसके बाद जया भादुड़ी लगभग 17 साल तक फिल्म इंडस्ट्री से दूर रही. हालांकि इस बीच उन्होंने एक फिल्म की कहानी भी लिखी. बाद में उस कहानी पर वर्ष 1988 में अमिताभ बच्चन अभिनीत फिल्म ‘शंहशाह’ प्रदर्शित हुई.

हजार चौरासी की मां’ से दूसरी पारी

वर्ष 1998 में प्रदर्शित फिल्म ‘हजार चौरासी की मां’ के जरिये जया भादुड़ी ने अपने सिने करियर की दूसरी पारी शुरू की. गोविन्द निहलानी के निदेर्शन में नक्सलवाद मुद्दे पर बनी इस फिल्म में जया भादुड़ी ने मां की भूमिका को भावात्मक रूप से पेश कर दर्शकों का दिल जीत लिया.

राजनीति में खेली पारी, राज्यसभा सदस्य बनीं

फिल्मों में कई भूमिकाएं निभाने के बाद जया भादुड़ी ने समाज सेवा के लिए राजनीति में प्रवेश किया और समाजवादी पाटीर् के सहयोग से राज्य सभा की सदस्य बनी. भारतीय सिनेमा में उनके योगदान को देखते हुए 1992 में उन्हें देश के चौथे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्मश्री से अलंकृत किया गया .

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आठ बार फिल्मफेयर

जया भादुड़ी अपने सिने कैरियर में आठ बार फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित की जा चुकी है. बॉलीवुड में जया भादुड़ी उन गिनी चुनी चंद अभिनेत्रियों में शामिल है जो फिल्म की संख्या के बजाये उसकी गुणवत्ता पर ज्यादा जोर देती है.

इसी को देखते हुये उन्होंने अपने चार दशक के सिने कैरयिर में लगभग 45 फिल्मों मे ही काम किया है. उनकी कुछ उल्लेखनीय फिल्में ..जवानी दीवानी, बावर्ची , परिचय, पिया का घर, शोर, अनामिका, फागुन, नया दिन नयी रात, कोई मेरे दिल से पूछे, लागा चुनरी में दाग, द्रोण आदि हैं.

फिल्म ‘कोशिश’ में ‘गूंगे’ की भूमिका हो या फिर ‘शोले’, ‘कोरा कागज’ में संजीदा किरदार या फिर ‘मिली’ और ‘अनामिका’, ‘परिचय’ जैसी फिल्मों में चुलबुला किरदार. हर भूमिका को उन्होंने इतनी खूबसूरती से निभाया, जैसे वह उन्हीं के लिए बनी हो.

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