JamshedpurJharkhand

पूरी तरह थमा नहीं है कोरोना का कहर, कहीं बंद पड़े क्वार्टर बन न जायें डेंगू-मलेरिया जैसी बीमारियों का घर 

Pratik Piyush

Jamshedpur : लौहनगरी की जनता अभी पूरी तरह कोरोना संक्रमण से उबर भी नहीं सकी है कि अब शहर के लोगों पर डेंगू और वायरल फीवर का खतरा मंडरा रहा है. मच्छर-जनित बीमारियों का प्रकोप भी बढ़ रहा है कुछ दिन पहले खबर आयी थी कि  टाटा कंपनी के कमांड क्षेत्र के 1550 घरों में डेंगू के लार्वा मिले हैं. टाटा स्टील यूटिलिटीज एंड इंफ्रास्ट्रक्चर सर्विसेज लिमिटेड (पहले जुस्को) का दावा है कि उनके स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों ने लार्वा को नष्ट कर दिया है. TSUIS की सुकन्या दास ने बताया कि हर साल हमारी टीम बंद क्वार्टरों में डेंगू को मारने वाली दवा का छिड़काव करती है. जुस्को कमांड क्षेत्र के बाहर की स्थिति और भयावह हो सकती है, क्योंकि वहां की सफाई-व्यवस्था और भी दयनीय है. इस वर्ष अप्रैल से जून के बीच स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों को 1550 घरों में डेंगू का लार्वा मिला है मच्छर जनित बीमारियों में डेंगू और मलेरिया सबसे खतरनाक है. डेंगू में तेज बुखार के साथ-साथ शरीर में प्लेटलेट का स्तर तेजी से कम होता है. कई बार मरीज की जान भी चली जाती है.

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जिले में अभी तक जेई के 12 और डेंगू के 8 मरीज मिल चुके हैं

इस साल जिले में अभी तक जापानी इंसेफिलाइटिस (जेई) के 12 व डेंगू के आठ मरीज सामने आ चुके हैं. यह बीमारी लगातार बढ़ती जा रही है. ऐसे में लोगों को काफी सावधान रहने की जरूरत है. अपर मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी (एसीएमओ) डॉ साहिर पाल ने कहा कि इसकी रोकथाम को लेकर सभी चिकित्सा प्रभारियों को निर्देश दिया गया है कि अगर उनके यहां इससे संबंधित लक्षण को लेकर कोई मरीज पहुंचता है तो, उसकी जांच अवश्य करायी जायें, ताकि सही समय पर मरीजों की पहचान हो सके.

किस साल में डेंगू के कितने मरीज मिले

2015  – 06

2016 – 214

2017 – 435

2018 – 65

2019 – 267

बरसात के मौसम में मच्छरों की संख्या बढ़ जाती है इसके कारण मलेरिया, जेई, डेंगू व चिकुनगुनिया के मरीज बढ़ने लगते हैं. ऐसे में जरूरी है कि घरों के सामने पानी का जमाव नहीं होने दें. डेंगू का लार्वा साफ पानी में ही पनपता है. इसके साथ ही छतों पर रखे गये. गमलों में भी पानी का जमाव नहीं होने दें. साफ-सफाई पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है. लोगों को विशेष रूप से जागरुक होने की जरूरत है.
– डॉ साहिर पाल, एसीएमओ, पूर्वी सिंहभूम

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