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कोरोना काल में जान गंवाने वाले डॉक्टरों के योगदान को भूली सरकार, दर दर की ठोकरें खा रहा परिवार

  • 17 महीने में राज्य के 61 डॉक्टरों ने गंवाई जान
  • कोरोना संक्रमितों का इलाज करते हुए थे संक्रमित
  • मुआवजे देने में अब सरकार कर रही है भेद-भाव
  • सिर्फ चार डॉक्टरों के परिवार को मिला मुआवजा
  • आर्थिक संकट से जूझ रहा डॉक्टरों का परिवार

Anita Gupta

Ranchi: राज्य में कोरोना ने जब- जब अपना विकराल रूप दिखाया,चिकित्सकों ने उसका डट कर सामना किया. ना ही उन्होंने अपने जान की परवाह की और ना ही अपने परिवार के सदस्यों की.उस विपरीत समय में आम व्यक्ति से लेकर मंत्री तक के लिए एक मात्र सहारा डॉक्टर ही दिखाई रहे थे. ऐसे में प्राइवेट प्रैक्टिस वाले हो या फिर सरकारी डॉक्टर, सभी ने अपने फर्ज को बखूबी अंजाम दिया. लेकिन जैसे ही कोरोना शांत हुआ, सरकार चिकित्सकों के योगदान को भूल गई.वो प्राइवेट प्रैक्टिस और सरकारी डाक्टरों में फर्क करने लगी. मरीजों को जान बचाते हुए पिछले 17 महीनों में 61 डॉक्टरों ने अपनी जान गवां दी. कोरोना ने उनके परिवार और बच्चों के सिर से पिता का साया छीन लिया. आज उनकी विधवा और बच्चे दर दर की ठोकरें खा रहें हैं. वे अनाथों की जिंदगी जीने को मजबूर है. आज उन्हें आर्थिक रूप से सहायता पहुंचाने के लिए कोई खड़ा नहीं हो रहा है. राज्य सरकार और केंद्र सरकार केवल झूठे वादे ही करके रह गई. गद्दी पर विराजमान अधिकारियों में से कोई उनके परिवार का हाल ए खबर भी नहीं लेने जाता कि वे किस परिस्थितियों से जूझ रहे है.

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न्यूज विंग ने ऐसे ही दिवगंत चिकित्सकों के परिवारों के परिस्थिति पर जब प्रकाश डाला तो पाया कि उनके परिवार के सदस्यों पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है, वे एक-एक रूपये के लिए मोहताज हो गए हैं. उनकी पत्नियां और छोटे छोटे बच्चे अपनी पढ़ाई छोड़कर घर चलाने के लिए जॉब ढूंढ रहे हैं, उन्हें कहीं काम नही मिला रहा है.

 

केस -1

आर्थिक तंगी के कारण डॉक्टर की गई जान, 5 दिनों तक सड़ती रहा लाश

गोड्डा के जेल में मरीजों की सेवा करते डॉ विजय कृष्ण श्रीवास्तव की मौत पिछले साल 2 अक्टूबर को आर्थिक तंगी के कारण हो गई थी. 5 दिनों तक उनकी लाश घर पर सड़ती रही, जब उनकी बॉडी घर से निकाला गया तो उनकी बॉडी में कीड़े लग गए थे. पत्नी सुजाता विजय श्रीवास्तव ने बताया कि जब से कोरोना राज्य में प्रवेश किया तब से उनके पति मरीजों की सेवा में लगे रहे, लेकिन 6 महीनों से उन्हे वेतन नहीं मिला था. ऐसे में उनका परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहा था. 3 साल की बच्ची को दूध पिलाने के लिए घर में पैसे नहीं थे, ऐसे में उनके बीच रोज झगड़े हुआ करते थे.एक दिन परेशान होकर वो अपने तीनों बच्चों को लेकर गोड्डा से 12 किलोमीटर दूर बिहार के पंचवारा गांव चली गई, जहां पर उन्हें एक नर्सिंग होम में नर्स का काम मिल गया था. उसके 7 दिन के बाद उनकी मौत की खबर आई.

सरकार ने 6 महीने तक मेरे पति की सैलरी रोक कर नहीं रखती तो मेरे पति आज जिंदा होते – सुजाता

उन्होंने बताया कि उनकी मौत के 10 महीने होने को आएं हैं. वे और उनके तीनो बच्चे आर्थिक स्थिति से जूझ रहे है,पैसे नहीं है कि वे अपने तीनो बच्चों की परवरिश ठीक से कर सके. ऐसे में उन्होंने अपने दो बेटों को अपने रिश्तेदार के यहां छोड़ रखा है और अपनी 4 साल की बेटी को लेकर चेन्नई में रह रही हैं, जहां पर 12 हजार रूपए की नौकरी कर अपना और अपनी बेटी का पेट भर रही है. अपने दुख को बयां करती हुई उन्होंने बताया कि उनके पति ने अपने फर्ज को निभाते हुए अपनी जान दे दी, बदले में झारखंड सरकार पूछने भी नहीं आई की हम लोग कैसे है? किसी प्रकार का कोई सहयोग नहीं किया, यहां तक कि राज्य और केंद्र सरकार ने चिकित्सकों के मरने के बाद जो मेडिकल इंश्योरेंस देने की घोषणा की थी,वो भी नहीं दिया. मैं अंदर से बहुत टूट चुकी हूं. झारखंड सरकार ने मुझसे मेरा सबकुछ छीन लिया है. अब मैं झारखंड कभी भी नहीं जाऊंगी. सरकार ने 6 महीने तक मेरे पति की सैलरी रोक कर नही रखी रहती तो मेरे पति की मौत नही हुई रहती. आज वो जिंदा रहते और हमारे साथ रहते.

 

केस-2

मुआवजे को लेकर सरकार कर रही भेदभाव, घर चलाने के मैं और मम्मी दोनो जॉब ढूंढ रहे हैं, लेकिन नहीं मिल रहा काम – स्वीकृति

रांची के 54 वर्षीय रेडियोलॉजिस्ट डॉ बिनोद कुमार सिंह की मौत 7 जून की सुबह 12:30 बजे कोरोना से हो गई थी. परिवार के सदस्यों ने उनके इलाज में करीब 1.10 करोड़ रुपए खर्च कर दिए, लेकिन उनकी जान नहीं बच सकी.

डॉ बिनोद की बेटी स्वीकृति सिंह ने बताया कि कोरोना के पहले फेज से दूसरे फेज तक पापा ने कभी भी अपने फर्ज से मुंह नहीं मोड़ा, वे दिन रात मरीजों की सेवा में लगे रहे. नतीजन, 21मई को वे खुद संक्रमित हो गए और 7 जून को कोरोना से जंग हार गए. इलाज में 1.10 रूपये खर्च हुए, जो उनके कुछ जमा पूंजी थी और कुछ रुपए कर्ज लेने पड़े. उनके जाने के बाद हमारे परिवार पर करीब 50 लाख रूपये का कर्ज हो गया है. हमारा परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहा है. मैं लॉ के फाइनल ईयर में हूं, मेरा छोटा भाई अगले साल 10 वीं बोर्ड की परीक्षा देगा, लेकिन घर में अभी खाने को लाले पड़े हुए है. कहीं से कोई मदद नहीं मिल रहा है. पापा की मौत को लेकर मेडिकल क्लेम भी फाइल नहीं हो रहा है, सरकारी अधिकारी कहते है कि वे प्राइवेट डॉक्टर थे, इसके कारण उन्हें मुआवजे की कोई राशि नहीं मिल सकती. पढ़ाई छोड़कर मैं और मेरी मम्मी घर चलाने के लिए जॉब ढूंढ रहें है, लेकिन हमें कहीं कोई काम भी नही मिल रहा है. ऐसे स्थिति में कहां जाएं और क्या करें कुछ नहीं समझ में नही आता. बस, मैं और मेरी मम्मी और मेरा छोटा भाई अपने गम को छुपाएं दिन रात घुटते रहते हैं.

 

केस-3

सरकारी डॉक्टर होने के बावजूद मौत के बाद नहीं मिला मुआवजा, दो बेटियों के भरण पोषण के लिए पत्नी जॉब ढूंढने के लिए मजबूर, नहीं मिल रहा जॉब

धनबाद के ईएसआई हॉस्पिटल में मरीजों की सेवा करते हुए डॉ एसडी झा कोरोना संक्रमित हुए और उनकी मौत हो गई. उनके जाने के बाद उनकी पत्नी और उनकी दो छोटी-छोटी बेटियां बेसहारों की जिदंगी जीने को मजबूर है. पत्नी दीक्षा झा ने मुआवजे की राशि के लिए कई सरकारी विभागों के चक्कर लगाएं, लेकिन झारखंड सरकार की ओर से कोई सहयोग नहीं मिला. आज उनकी पत्नी अपनी दो बेटियों को पालने के लिए नौकरी ढूंढ रही है, लेकिन वो भी अभी तक नही मिली.

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