Corona_UpdatesCrime NewsHEALTHJharkhandOFFBEATRanchi

डॉ नवीन की आंखों की वो चमक और कोरोना का बहाना

Kumar Saurav

27 मार्च का दिन. मैं बनारस में था. मुझे 26 की रात में ही खबर मिली कि 27 को एक बार फिर ऑपरेशन होगा. 27 की सुबह मैं बनारस से चला और दोपहर तक रांची में सीधे पल्स हॉस्पिटल पहुंचा. अब हमें कुछ आशंका होने लगी थी, लेकिन हमारे पास कोई चारा नहीं था. उस हालत में उन्हें कहीं दूसरी जगह ले भी नहीं जा सकता था. डॉ नवीन कुमार ने 27 मार्च को एक बार फिर ऑपरेशन किया. जब मैं पहुंचा तो ऑपरेशन हो रहा था. फिर शाम को करीब 5 बजे खबर मिली कि ऑपरेशन हो गया है.

advt

जीजाजी (रंजन वर्मा) तब पूरी तरह से होश में नहीं थे. हम उन्हें देखने पहुंचे तो देखा कि एक हट्टा-कट्टा इंसान अस्पताल के बेड पर बिल्कुल बेजान पड़ा हुआ है. डॉक्टरों ने कहा कि अब सब कुछ ठीक हो जायेगा. ऑपरेशन की पूरी प्रक्रिया बतायी. यह भी कहा कि उन्हें जो आशंका थी वह नहीं हुआ था, बल्कि दूसरी जगह जहां स्टेपल किया था, वह खुल गया है. अब उसे पूरी तरह से सील कर दिया है. अब कोई परेशानी नहीं होगी.

डॉ नवीन कुमार.

लेकिन डॉक्टर नवीन कुमार ने जो कहा और जो हुआ उसमें काफी अंतर था. कुछ दिनों तक उन्हें खाने-पीने के लिए कुछ नहीं दिया गया, सिर्फ स्लाइन के जरिये जरूरी तत्व पहुंचाये जा रहे थे. इस बीच हमने पल्स के ही एक चिकित्सक डॉ आरएस दास से देखने को कहा. वह आये और रिपोर्ट वगैरह देखी. उन्होंने कहा कि ठीक हो जायेगा. लेकिन उसके बाद भी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ.

इस बीच भी डॉ नवीन कुमार द्वारा दीदी पर यह दबाव बनाया जाता रहा कि अब सब कुछ ठीक है, आप उन्हें घर ले जायें. दीदी घबराकर मुझे फोन करती. फिर जब जब हमलोग यह कहते कि ऐसी हालत में हम घर कैसे ले जा सकते हैं, तो फिर कोई जवाब नहीं मिलता.

इस बीच पल्स पॉस्पिटल में कोरोना के मरीज आने लगे. पहले सबसे ऊपरी तल में उन्हें रखा जाता. फिर जैसे-जैसे मरीज बढ़ने लगे, उन्हें अन्य तल्लों पर भी रखा जाने लगा. एक ही लिफ्ट थी. उसी में कोरोना के मरीज, उनके परिजन, हॉस्पिटल स्टाफ ऊपर-नीचे होते थे. यहां तक कि मेडिकल वेस्ट के लिए भी उसी लिफ्ट का इस्तेमाल होता है.

हम लोगों की चिंता बढ़ने लगी थी. हमें यह आशंका घर करने लगी थी कि कहीं दीदी कोरोना संक्रमण के चक्कर में न पड़ जाये. हमारी आशंका सही साबित हुई. 10 अप्रैल को दीदी को फीवर आ गया. उसने फौरन सदर अस्पताल में सैंपल दे दिया. पर रात होते-होते उसका फीवर काफी बढ़ गया. दूसरे दिन रविवार को तो हालत और बिगड़ गयी. उसका ऑक्सीजन लेवल तेजी से गिरने लगा. मेरे मामा ने एक ऑक्सीजन कॉन्सन्ट्रेटर लाकर लगाया, तब हालत में थोड़ा सुधार हुआ. फिर भी हमें आशंका थी कि यदि तबीयत और बिगड़ी तो क्या होगा. रात 8 बजे तक दीदी को भी पल्स में एडमिट कराया. पहले दिन उसे वार्ड में रखा, ऑक्सीजन सपोर्ट पर. दो दिन तक तो वो ऑक्सीजन सपोर्ट पर रही.

इसी बीच जीजाजी को सीसीयू में शिफ्ट कर दिया गया. हमें यह बताया गया कि उनका बीपी लो हो गया है, इस वजह से शिफ्ट किया गया. हम मिलने पहुंचे तो डॉ नवीन कुमार से बात हुई. उन्होंने कहा कि घबराने की बात नहीं है, अभी स्टेबल हैं. उस वक्त तक उनका कोरोना टेस्ट निगेटिव था.

इसी बीच अस्पताल से मुझे फोन आया कि दीदी को आइसीयू में शिफ्ट करना पड़ रहा है. ऑक्सीजन लेवल काफी कम हो गया था. मैं अस्पताल पहुंचा तो डॉक्टरों ने बताया कि हालत ठीक नहीं है, वेंटिलेटर पर भी डालना पड़ सकता है. अब हमारे पास कोई चारा नहीं था. यह बात 14 अप्रैल की है.

उसके अगले ही दिन दीदी की हालत काफी बिगड़ गयी. बस अब भगवान ही सहारा था. फिर अचानक डॉ नवीन कुमार ने बताया कि जीजाजी की भी जांच रिपोर्ट कोरोना पॉजिटिव आयी है. हम उनसे मिलने पहुंचे. उनकी हालत के बारे में जाना. डॉक्टर की आंखों की चमक बता रही थी कि अब उसे अपनी करनी को ढंकने का एक बहाना मिल गया है. उन्होंने हमसे कहा कि अभी तक तो सब कुछ ठीक है, पर अब तो कोविड हो गया है, और हम यह नहीं बता सकते कि यह कैसे बिहेव करेगा. देखिये आगे क्या होता है.

हमारी आशंका और बलवती हो गयी. एक-एक पल भारी हो चला था. किसी भी अनजान नंबर से आया कॉल रिसीव करने में रूह कांप जाती. पता नहीं क्या खबर सुना दे. ऐसा ही हुआ. 19 अप्रैल की सुबह एक कॉल आया. पल्स से बोल रहे हैं. आप रंजन वर्मा के अटेंडेंट हैं. मैंने कहा- हां. उधर से कहा- उनका आज सुबह 3 बजे डेथ हो गया. काडिर्येक अरेस्ट हुआ है. हम भागे-भागे अस्पताल पहुंचे. बताया गया कि कोरोना है, इसलिए बॉडी नहीं सौंप सकते. आप बिल वगैरह क्लियर करिये, उसके बाद प्रोसिजर बता दिया जायेगा.

20 अप्रैल को घाघरा घाट पर अंतिम संस्कार किया. घर लौटे ही थे कि शाम 5 बजे पल्स आइसीयू से फोन आया. आपके पेशेंट को कार्डियेक अरेस्ट हुआ है. जल्दी आइये. हम आनन-फानन में अस्पताल पहुंचे. जब आइसीयू पहुंचे, तब तक दीदी जा चुकी थीं. अब हमारे पास कुछ भी नहीं था. उसके बेटे से जाकर क्या कहते कि तुम्हारी मां भी चली गयी. वह तो अभी-अभी अपने पिता को मुखाग्नि देकर आया था. एक डॉक्टर की लापरवाही ने दो जानें ले लीं और दो छोटे बच्चों (एक 15 साल का और एक 5 साल का) को अनाथ कर दिया.

इसे भी पढ़ें – हर डॉक्टर भगवान नहीं होता, कुछ नवीन कुमार भी होते हैं

Advertisement

Related Articles

Back to top button
%d bloggers like this: