Opinion

कोरोना के इलाज में इस तरह दिखायी दे रही है अमीर और गरीब के बीच की खाई

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Faisal Anurag

मंदिर और राफेल के शोर में कोरोना कहीं पीछे छूट-सा गया है. जबकि हालात यह हैं कि देश में साढ़े आठारह लाख से अधिक मामले दर्ज हो चुके हैं. और मृतकों की संख्या 38 हजार से अधिक हो चुकी है. बेहतर अस्पतालों और सुविधाओं के लिए लोग परेशान हैं. पिछले दो दिनों से नए मामलों में भारत अमेरिका को पीछे छोड़ चुका है. और जिस गति से संक्रमण का प्रसार हो रहा है उससे भविष्य के संकेत बेहद भयावह बन रहे हैं. इसका असर न केवल आमलोगों की जिंदगियों पर है बल्कि आर्थिक क्षेत्र पर भी. जून की तुलना में जुलाई में एक बार फिर उत्पादन में सुस्ती की खबर से बेचैनी बढ़ी है. श्रमिकों सहित लघु और मध्यम उद्योग का संकट गहराया है.

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इस बीच जिस तरह बड़े-बड़े नेता संक्रमण के शिकार हुए हैं और उनके इलाज का जिस तरह से प्रबंध हुआ है, उसने स्वास्थ्य क्षेत्र की बढ़ती गैरबराबरी को उजागर कर दिया है. गृहमंत्री अमित शाह के संक्रमित होने के बाद देश के सबसे महंगे मेदांता अस्पताल में इलाजरत होने के बाद सार्वजनिक तौर पर बहस तेज हो गयी है. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री और कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने भी निजी अस्पतालों में ही इलाज कराना बेहतर समझा है. इससे दो सवाल उठ खडे हुए हैं. पहला सवाल यह कि इन नेताओं ने सरकारी अस्पतालों पर भरोसा क्यों नहीं किया. और दूसरा क्या सरकारी अस्पताल में सुविधाओं की कमी के लिए इससे माहौल नहीं बनता है. मुंबई में तो अमीर लोगों के इलाज के लिए वहां के दो अस्पताल समर्पित किए गए हैं.

महामारी के दौर में इस तरह की असमानता बताती है कि सामाजिक तौर पर क्रूरता किस तरह बढ़ रही है. और सरकरी क्षेत्र को किस तरह बेचारा बनाया जा रहा है. सच्चाई तो यह है कि अब तक कोरोना संक्रमण से निपटने में सरकारी अस्पतालों ने कम सुविधाओं और तकलीफों के बावजूद जो भूमिका निभायी है उसकी तुलना नहीं की जा सकती है. निजी अस्पतालों ने तो अपने सामाजिक दायित्व का निर्वाह करने के बजाय इस महामारी को भी मुनाफा का ही स्रोत भर माना है.

भारत के सरकारी क्षेत्र की स्वास्थ्य सेवा को 1990 के बाद सुनियोजित तरीके से उपेक्षित किया गया है. अभी बजट का मात्र डेढ़ प्रतिशत से भी कम खर्च इस क्षेत्र पर किया जाता है. जब कि विशेषज्ञ लंबे समय से बजट का कम से कम छह प्रतिशत खर्च करने की मांग करते रहे हैं. चिकित्सा क्षेत्र में शोध के लिए भारत दुनिया में सबसे कम खर्च करने वाले देशों में है. बावजूद भारतीय सरकारी क्षेत्र के चिकित्सकों ने जिस कौशल का परिचय दिया है, उसे दुनिया में सम्मान से देखा जाता है.

क्यूबा जैसे छोटे देश ने अमेरिका के भारी प्रतिबंध के बावजूद जिस तरह अपने देश में चिकित्सा सेवा का संजाल बनाया है, उसकी मिसाल कहीं नहीं मिलती. ऐसा संभव हो सका क्योंकि वहां के नेतृत्व ने प्राथमिकता के तौर पर इसे स्वीकार किया. भारत के राजनीतिक नेतृत्व के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य का मामला केवल दिखावा का ही रहा है. आर्थिक सुधारों की आंधी के बीच सार्वजनिक स्वास्थ्य का सवाल और पीछे चला गया है. कोरोना माहामरी ने दिखाया है कि इस उपेक्षा की कितनी बड़ी कीमत आमलोगों को चुकानी पड़ रही है.

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होना तो यह चाहिए कि भारत में जिस तेजी से कोरोना वायरस का संक्रमण बढ़ रहा है, उसे गंभीरता से लिया जाता. नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों कहा था कि भारत ने कोरोना से लड़ने में जो क्षमता दिखायी है, उसकी सरहाना हो रही है. लेकिन जानकार मान रहे हैं कि केवल कागजी आंकड़ों से ही महामारी का मुकाबला नहीं किया जा सकता. और उसके बुरे असर को कम नहीं किया जा सकता. अब तो विश्व स्वास्थ्य संगठन कह रहा है कि निकट भविष्य में इससे मुक्त होने की कोई संभावना नहीं दिख रही है. यह भी संदेह जताया जा रहा है कि जिस तरह वैक्सीन के लिए होड़ मची है, उससे मुनाफा कमाने की प्रतिस्पर्धा ज्यादा दिखती है.

जर्मनी में दो दिनों पहले एक लाख से अधिक लोगों ने प्रदर्शन कर महामारी के बीच मुनाफा कमाने के लिए कंपनियों के खिलाफ नारे लगाए. इसमें बिल गेट के खिलाफ भी नारे लगे. जिनपर वैक्सीन कंट्रोल का आरोप लग रहा है. इस तरह के प्रदर्शन दुनिया भर में होने को हैं. क्योंकि लोगों को लग रहा है कि बीमारी से निपटने के बजाय उससे कमाने के तरीके कंपनियां अपना रही हैं. इस पर अलग से चर्चा की जा सकती है.

भारत के छोटे शहरों की स्वास्थ्य सेवाओं को ले कर जिस तरह के हालात उभरे हैं. उससे जाहिर होता है कि पिछले पांच महीनों में भी राजनीतिक नेतृत्व ने सुधरने का प्रयास कम किया है, दिखावा ज्यादा किया है. जानकारों के अनुसार आने वाले दो महीने अभी बहुत महत्वपूर्ण हैं. जब पिक समय आएगा. वैसे हालात में लोगों के लिए बेड मुहैया कराने की क्षमता के विकास में करने की नाकामयाबी की बड़ी कीमत चुकानी पड़  सकती है.

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6 Comments

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