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ऑनलाइन मार्केटिंग के पीछे का खेल

Rajiv Thepra

सस्ता खरीदने के चक्कर में कहीं हम अपने देश को ही ना बेच डालें ! जब से वर्चुअल खरीदारी का सिस्टम शुरू हुआ है, तब से बहुत तेजी से भारत में भी ऑनलाइन खरीदारी का प्रचलन बहुत जोर पकड़ने लगा है, इसके द्वारा हमें चीजें सस्ती मिल जाती हैं,(हालांकि धोखाधड़ी के भी बहुत सारे किस्से सामने आते हैं) लेकिन क्योंकि हम सब को सस्ती चीजें चाहिए होती हैं, इसलिए हम धोखाधड़ी के उन तमाम की घटनाओं को नजरअंदाज करके इस खरीदारी में मशगूल रहते हैं. लेकिन हमारी यह यह खरीदारी हमारे पास-पड़ोस पर और अंततः हम पर क्या प्रभाव डाल रही है, इसके बारे में ना तो हमें पता है और ना हम सोचना ही चाहते हैं !!

अभी-अभी आई एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले दो सालों में अमेजन ने लीगल फीस के रूप में लगभग ₹8,546 करोड़ रुपए चुकाए हैं और यह बहुत आश्चर्यजनक बात है !! जबकि अमेजन कंपनी खुद को एक भयंकर घाटे वाली कंपनी बताती है और जिसकी पिछले 2 सालों की कुल आय लगभग 42000 करोड रुपए हैं.

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वैसे में अगर यह कंपनी 8546 करोड़ रुपए का किसी भी प्रकार की कानूनी फीस चुकाती है, तो इसके पीछे बहुत सारे “राज” हो सकते हैं !! यह टैक्स की धोखाधड़ी भी के लिए भी किया गया हो सकता है. यह लॉबिंग के लिए भी किया गया हो सकता है या किसी अन्य रूप में भी.

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खैर जो भी हो, लेकिन इतना तो तय है कि इतनी बड़ी रकम अगर कोई कंपनी लीगल फीस के रूप में चुका रही है, तो ऐसा जान पड़ता है कि निश्चित तौर पर उसका उद्देश्य इसमें उसका उद्देश्य भी कहीं न कहीं , किसी न किसी रूप में “काले” ही होंगे! लेकिन सवाल यह उठता है कि ये जो 42000 करोड रुपए की आय अमेज़न को पिछले 2 सालों में हुई है, इसमें उसके शहर भागी कौन हैं?और दुर्भाग्यवश इसका जवाब हम स्वयं हैं!!

42000 करोड रुपए की आय का मतलब है लगभग दो से चार लाख करोड़ का टर्नओवर !! जिसके जिम्मेवार हम भारतीय नागरिक ही हैं, जिन्होंने सस्ता खरीदने के लालच में अपने देश का ही बंटाधार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है!!

विभिन्न तरह के चाइनीज उत्पादों के मामले में भी हमारा यही रवैया है! एक्चुअली किसी चीज का फ्री या सस्ता होना हमारे लिए एक ऐसा लॉलीपॉप है, जिसके लिए हम किसी भी सरकार को देश चलाने का जनादेश दे सकते हैं!!

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नकल करने में छूट हो. तरह-तरह की चीजें फ्री हों. तरह-तरह के ढपोरशंखी वादे हों! तरह-तरह के आरक्षण हो! इस प्रकार के वादों से सम्मोहित हम लोग किसी “चोर” को भी इस देश की बागडोर देने में संकोच नहीं करते और अब तक हमने किया भी यही है!! और महंगाई-महंगाई का रोना रोते हम कभी यह नहीं देख पाए कि महंगाई आख़िर किन कारणों से आई है?

सब को बढ़ा हुआ वेतन! चाहिए हर साल वेतन की बढ़ोतरी चाहिए! लेकिन चीजों का महंगा होना नहीं चाहिए! हम मूर्ख प्राणी इतना भी नहीं जानते हैं कि जब हम में से हर एक नौकरीपेशा व्यक्ति हर साल अपने वेतन की बढ़ोतरी की मांग करता है, तो स्पष्टतया उसके माध्यम से निर्मित होने वाली तमाम चीजों की लागत भी बढ़ जाती है.

इसी तरह से हर तरह के इक्विपमेंट की लागत, हर तरह की मशीन की लागत, हर तरह की सेवा की लागतें क्रमशः बढ़ती चली जाती हैं और इसका प्रभाव चीजों पर ही पड़कर रहता है. अंततः जिसका मूल्य हम स्वयं चुकाते हैं!

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तो एक तरफ तो खुद के लिए अधिक से अधिक वेतन और दूसरी तरफ सस्ती से सस्ती चीजें !! यानी हम बिल्कुल व्याघ्यातक चीजें सोचते हैं और इसी का फायदा हमारे बीच के तरह-तरह के राजनीतिक दल उठाते हैं और उल्टे-पुल्टे वादे करते हैं.

इस संबंध में हमें दो बातें मुख्यतः सोच लेनी चाहिए कि यदि महंगाई से आने वाली प्रॉफिट का लाभ देश के इंफ्रास्ट्रक्चर को मिल रहा है, देश की सरकार द्वारा नागरिकों को दी जाने वाली सुविधाओं के रूप में बढ़ रहा है, तो वह महंगाई अच्छी है और दूसरी बात यह है कि सस्ता खरीदने के लालच में अगर हमारा कोई पड़ोसी देश या कोई भी देश हमसे अकूत लाभ कमा कर हमीं को आंखें दिखा रहा है या हमारी ही बाहें मरोड़ने की कोशिश कर रहा है, तो वह सस्ता होना बहुत बुरा है.

जिसके बारे में हमें ना केवल सोचना चाहिए, बल्कि अपनी ऐसी तमाम खरीदारियों को स्वत: प्रेरणा से बंद कर देना चाहिए, जिससे ऐसे किसी भी अन्य देश को लाभ पहुंचे, जो हमें नुकसान पहुंचाने की कोशिश करता है.

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और तीसरी और अंतिम बात यह है कि ऑनलाइन खरीदारी के चक्कर में हमारे आस पड़ोस के व्यापार बहुत तेजी से चौपट होते जा रहे हैं, बहुत तेजी बंद होते जा रहे हैं.

इसका एक मतलब यह भी है कि हम अपने आस-पड़ोस के भाई-बहनों की आय को चौपट करके वैश्विक कंपनियों की आय बढ़ा रहे हैं! तो हम ये जान लें कि यह भी अंततः हमारे पतन का ही रास्ता है.

हमें हर हालत में यह सोचना चाहिए कि यदि हम अपने आसपास से खरीदारी करते हैं, तो उससे होने वाली प्रॉफिट हमारे आस-पास ही, हमारे बीच के बाजार में ही खर्च की जाती है, जिससे हमारे आसपास के लोग ही फलते-फूलते हैं और इस प्रकार हम एक दूसरे को लाभान्वित करते है.

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लेकिन जब हम ऑनलाइन या वैश्विक खरीदारी करते हैं, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर या राष्ट्रीय मंच पर खरीदारी करते हैं, तो उसका मजा अंगुलियों पर गिनी जा सकने लायक कंपनियों को ही मिलता है. इस प्रकार हम अपने ही पड़ोस को वीरान करके अपने से किसी दूर वाले कतिपय लोगों को अकूत मुनाफा पहुंचा रहे हैं.

इसका अंतिम परिणाम कोई दूरअंदेशी व्यक्ति ही समझ सकता है. लेकिन यहां कही जा रही बात इतनी भी जटिल नहीं है कि कोई सामान्य आदमी इसे समझ ना सके और यह बहुत सीधी-सादी बात है, इस पर हमें बिना देर किए सोचना चाहिए और अपनी ऐसी तमाम आदतों पर बिना देर किए अंकुश लगाना चाहिए, जिससे हमारे आस-पड़ोस के लोग वीरान होते हों, जिससे हमारे देश को नुकसान होता हो और जिससे हमारे पड़ोस के देश हमारी ही दी गई प्रॉफिट के बल पर हमें नीचा दिखाने का प्रयास करते हों.

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