Opinion

प्रकृति, इंसान और विज्ञान का आदिवासी सहकार ही दुनिया का भविष्य

  • आदिवासी दिवस (9 अगस्त) पर विशेष

Faisal Anurag

अस्मिता और सांस्कृतिक विशिष्टता की रक्षा के लिए संघर्षरत आदिवासियों के लिए आदिवासी दिवस इतिहास के मंथन का अवसर प्रदान करता है. आदिवासियों ने अपने तमाम प्रतिरोधों के माध्यम से इतिहासबोध का नायाब उदाहरण प्रस्तुत किया है. पर्यावारण संकट के इस वैश्विक दौर में आदिवासी सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना का खास महत्व है. प्रकृति से आदिवासी सहकार वैश्विक चुनौतियों के बीच एक बडी संभावना बना हुआ है. हालांकि अनेक देशों में आदिवासियों की इस चेतना के महत्व को गंभीरता से नहीं लिया जाता है और उन्हें मुख्यधारा का हिस्स बनाकर उनकी पहचान को नष्ट करने का प्रयास किया जाता हे. इसमें भारत भी अपवाद नहीं है. भारत के आदिवासियों ने अपनी ऐतिहासिक समझ से अपनी पहचान के सवाल को गंभीरता से लिया है. दुनिया भर के आदिवासियों के संघर्षों का ही परिणाम है कि 9 अगस्त को आदिवासी दिवस के रूप में संयुकत राष्ट्र संघ ने मान्यता दी है. संयुक्त राष्ट्र संघ तो इंडिजिनस और आदिवासियों की सांस्कृतिक पहचान के आत्मनिर्णय के अधिकार को मान्यता दे चुका है.

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आदिवासी दिवस केवल एक रस्मी मामला भर नहीं है. इस अवसर पर आदिवासी समूहों को अपने समाजों की ताकत के साथ कमजोरियों की भी पहचान करने की जरूरत है. अनेक कारणों से आदिवासी दिवस के अवसर पर पहचान का प्रदर्शन ही हावी दिखता है. इसमें कई जरूरी सवालों पर गौर किये जाने के अवसर का उपयोग नहीं हो पाता है. शक्ति प्रदर्शन से ज्यादा जरूरी है उन कारणों की तलाश जो आदिवासी समाजों के भीतर अनेक तरह के अंतरविरोध को जन्म देता है . इन अंतरविरोधों का ही परिणाम है कि आदिवासी अनेक समूहों में बंटे हुए हैं. इस बंटवारे के कारण वे एक बडी राजनैतिक ताकत नहीं बन पाते हैं. जिन इलाकों में आदिवासियों के संघर्ष का इतिहास है वहां तो आदिवासी तमाम बाधाओं के बावजूद राजनतिक विमर्श को प्रभावित करते हैं. इनमें झारखंड अग्रणी है. पिछली दो शताब्दियों से झारखंड की संघर्ष परंपरा की निरंतरता बनी हुई है. दरअसल एक स्वतंत्रचेता समाज के बतौर झारखंडियों के संघर्षों ने कई नयी मान्यताओं को जन्म दिया है.

आदिवासी दिवस को भी झारखंड के अदिवासियों ने ही नया आयाम दिया है. डॉ राम दयाल मुंडा ने आदिवासी दिवस के राजनीतिक अर्थ को पहचान कर एक बडा फलक प्रदान किया था. इसका असर आदिवासी दिवस पर साफ-साफ देखा जा सकता हे. आदिवासी समाजों के भीतर न केवल कॉरपोरेट लूट के खिलाफ माहौल है बल्कि सामाजिक तौर पर वे एक नयी अर्थ संरचना के भी पैरोकार हैं. आदिवासी आंदोलनों ने बारबार स्पष्ट किया है कि वे एक राजनीतिक दर्शन के तौर पर उस लोकतंत्र के हिमायती हैं जिसमें सामाजिक सत्ता की अहमियत ज्यादा होती है. व्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक सत्ता के बीच कोई अंतरविरोध नहीं होता, इसे भी आदिवासी सघर्षो की देन के रूप में ही देखा जाना चाहिए. आदिवासी समाज की संरचना लोकतांत्रिक रही है. यह तो बाह्य प्रभाव का असर है कि उसमें  कुछ बिखराव दिखा हे. खास कर सामंतवाद के दौर में जब  जमींदारी प्रणाली को आदिवासी इलाकों पर थोपा गया था. लेकिन आदिवासी प्रतिरोधों की चेतना ने इसे स्वीकार नहीं किया और जल्द ही यह बात समझ में आ गयी थी कि आदिवासी किसी भी तरह की बाह्य विचारधारा को स्वीकार नहीं कर सकते जिसकी बुनियाद ही शोषणा पर आधारित हो. आदिवासी समाज की संरचना चूकि समानता के मूल्य पर आधारित है तो आज भी वह प्रभावी हे. हालांकि उसमें बिखराव भी दिखता है.

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सवाल यह है कि आदिवासी मूल्यों ने जिस चेतना का निार्माण किया है उसे आज के संदर्भ में किस तरह का  स्वरूप दिया जा सकता है. दरअसल एक ऐसे वैचारिक मंथन की अनिवार्यता को अस्वीकार नहीं किया जा सकता जिसमें आदिवासी समाज के मूल्यों और परंपराओं को आधुनिक अवधारणा के अनुरूप ढाला जा सके. इतिहास ने बार बार प्रमाणित किया है कि अनेक हमलों और सांस्कृतिक रूप से समाहित करने की प्रवृतियों के खिलाफ आदिवासी समाज सचेत रहा है और उसने अपनी सामाजिकता को बचाने में कामयाबी भी हासिल की है. दुनिया भर में देखा जा रहा है कि इन्हीं कारणों ने आदिवासी समाज और उसकी संरचना को लेकर चेतना बढ़ी है.

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पिछले पांच दशकों में आदिवासियों ने दुनिया भर की वैश्विक आर्थिक व्यवस्था के खिलाफ जिस तरह के प्रतिरोध का प्रदर्शन किया है उससे कई नयी अवधारणाओं ने आकार ग्रहण किया है. खास कर क्लाइमेट चेंज के संदर्भ में. अब यह धारणा बलवती हो चुकी है कि प्रकृति, इंसान और विज्ञान के बीच जो सहकार आदिवासियों ने स्थापित किया है वही दुनिया का भविष्य है.

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