Opinion

स्वतंत्रता की पहली लड़ाई हूल दरअसल आदिवासियों की राजनीतिक चेतना का विस्फोट था

हूल दिवस, 30 जून पर खास  

Faisal Anurag

हूल को याद करने का बेहतर तरीका यह है कि स्वतंत्रता के पहले आदिवासी क्रांति को आज के संदर्भ में भी समझा जाये. आदिवासी समाज ने हर तरह के जोर जुल्म और औपनिवेशिक गुलामी के खिलाफ एक ऐसा संघर्ष किया जिसकी मिसाल इतिहास में कम ही है. हूल ने उलगुलान की पृष्ठभूमि तैयार की. हूल का असर पूरे भारत के आदिवासियों पर पड़ा. क्योंकि यह आदिवासी राजनीतिक चेतना और नैतिकता का विस्फोट था.

इतिहासकारों ने इस हूल के साथ इंसाफ नहीं किया है. लेकिन आजादी के बाद कुछ इतिहासकारों ने इसके महत्व को रेखांकित करते हुए 1857 के स्वतंत्रता संघर्ष की आधारभूमि बताया है. भारत के इतिहास का जन नजरिया अभी विकसित होना बाकी है. अफ्रीकी लेखक ओचोबे और न्गुगी वा थ्योंगे ने ठीक ही कहा है कि शिकार जब तक शिकार का इतिहास लिखते रहेंगे वे खुद को गौरवान्ति महसूस करते रहेंगे. दुनिया में जन इतिहास लेखन ने उन तमाम विभ्रमों पर प्रहार किया है जिसे साम्राज्यवादी ताकतों ने अपने गौरवगान के लिए किया था.

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नस्ल और रंग के खिलाफ उभरा जनाक्रोश जन इतिहास की ही परंपरा का हिस्सा है. जिसे स्थापित इतिहासकार नजरअंदाज नहीं कर पा रहे हैं. भारत में दलितों के लेखन ने अनेक मिथकों पर प्रहार कर स्थापित मान्यताओं को चुनौती दी. और आदिवासी इतिहास लेखन ने भी अब तमाम औपनिवेशिक मान्यताओं के बरखिलाफ आदिवासी इतिहास बोध का परचम लहरा दिया है.

हूल और आगे चल कर उलगुलान ने ही वह ताकत दी है जिसने आदिवासी समाज की चेतना को मुख्यधारा के बीच विमर्श का केंद्र बनाना शुरू किया. सांस्कृतिक और पर्यावरणीय अर्थ समाज के रूप में आदिवासी समाज की अपनी वैज्ञानिक समझ है. हूल के जमाने में ही इसकी गूंज जंगलों व पहाडों से बाहर निकल उस समाज की जानकारी में आयी जो अपने वर्चस्व के अहम में डूबा रहता है.

अब जबकि दुनिया जबरदस्त जलवायु परिवर्तन के संकट में है, आदिवासी समाज की संस्कृति और जीवन शैली को याद किया जा रहा हे. विमर्श का दायरा विश्वविद्यलयों के कैंम्पस से बार निकल रहा है. हूल ने यह स्थापित किया कि आदिवासी समाज एक ऐसा सहचर समाज है जो गूलामी और तानाशाही की हर प्रवृति के खिलाफ है.

आदिवासियों का अपना लोकतांत्रिक सामाजिक जीवन है. वह प्रकृति के साथ सहचर्य के महान उद्देश्य के साथ जीता है. हुल के नायकों की शहादत ने बताया कि स्वतंत्र समाज के लिए जीने की सामूहिक इच्छा का क्या मतलब है. और वह पीढ़ियों तक अपनी विरासत और संस्कार को किस तरह अग्रसारित करता है. हूल के नायकों की वैज्ञानिक युद्ध कौशल को भी 1857 के सेनानियों ने अपने संग्राम का हिस्सा बनाया.

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एक दो इतिहासकारों ने इस पर विस्तार से लिखा है. 1857 की राज्यक्रांति पुस्तक में संताल हूल से सीखने की बात का विस्तार से उल्लेख है. इस हूल ने यह भी दिखाया कि सामाजिक सहकार क्या होता है. यही कारण है कि हूल के शहीदों में आदिवासियों के साथ मूलवासियों के नाम भी उल्लेखित हैं. इतिहासकार जेसी झा ने उन तमाम शहीदों की सूची तैयार कर प्रकाशित की है.

21वीं सदी में आदिवासी इलाकों की चुनौतयां लगातार गंभीर होती जा रही हैं. नए किस्म का औद्योगिक विस्तार आदिवासी जीवन शैली से टकरा रहा है. यह केवल भारत के ही आदिवासी इलाकों की हकीकत नहीं है. बल्कि पूरी दुनिया में ऐसा देखा जा रहा है. इन चुनौतियों के खिलाफ आदिवासी समाज अपने तरीकों से संघर्ष कर रहा है.

औद्योगिक विस्तारवाद के खिलाफ आदिवासी प्रतिरोध सारी दुनिया में दस्तक दे रहा है. नस्लवाद के शिकार आदिवासी समूह तो विकसित देशों में भी प्रतिरोध की चिंगारी को सुलगा चुके हैं, जिसकी लपट दुनिया महसूस कर रही है. ब्लैक लाइव्स मैटर के आंदोलन को भी इसी नजरिए से देखने की जरूरत है. साम्राज्यवाद का वह दौर तो दूसरे महायुद्ध के बाद से अंतिम सांसें लेने लगा था जिसने सारी दुनिया में भारी तबाही मचायी थी.

लेकिन जल्द ही उसने अपना कलेवर और तेवर बदल दिया. इसकी नयी शब्दावली में विकास शब्द भी शामिल है. विकास को मुख्यधारा का हिस्सा बनाने की प्रक्रिया ने आदिवासी समाजों को अंदर से हिला दिया. क्योंकि उनके जल, जंगल और जमीन पर उसका तीखा प्रहार हुआ. आदिवासी तो अनंत काल से इसकी रक्षा करने का युद्ध लड़ रहे हैं. और पूंजीवादी क्रांति के बाद के लोकतंत्र के विस्तार के बावजूद उनका संघर्ष खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है.

21वीं सदी की दुनिया में विश्व की महाशक्ति बनने की प्रतिस्पर्धा ने कई इलाकों को युद्ध या युद्ध जैसे हालात में धकेल दिया है. अफ्रीका हो या लातिनी अमरीका या फिर एशिया. हर जगह के आदिवासी भारी बेचैनी के बीच अपनी अस्मिता और संस्कृति की रक्षा के लिए सजग हैं. आदिवासी संस्कृति के आयाम में वह आर्थिक जीवन शैली भी शामिल है जो औद्योगिक समाज से बहुत अलग है. आदिवासी समाज की इस हकीकत को पहली बार आदिवासी इलाकों के पंचशील में समझने की कोशिश जवाहरलाल नेहरू के समय में हुआ था. जब आदिवासी इलाकों के लिए विशेष नीति और हस्तक्षेप नहीं करने की बात कही गयी थी.

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संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूची भी इसी प्रक्रिया में उभरी. जिसे हूल के नायकों के समय से आदिवासी किसी न किसी प्रतिरोध के जरिए व्यक्त करते रहे हैं. लेकिन 21वीं सदी की प्रतिस्पर्धा आदिवासी इलाकों के प्राकृतिक संसाधनों की लूट पर ही केंद्रित है. कोविड 19 के दौर में जब संकट गहराया है, तब भारत में निजीकरण की बयार तेज हो गयी है. सुधारों के नाम पर उठाए गए कदमों की आहट आदिवासी इलाकों में सुनी जा सकती है. 1950 से ले कर अब तक आदिवासी इलाकों के लिए अनेक संवैधानिक प्रावधान कर सरंक्षण देने का प्रयास किया गया.

नई प्रतिस्पर्धा में तमाम संरक्षणात्म कानूनों के असित्व पर ही संकट मंडराने लगा है. कोयला खदानों की नीलामी के संदर्भ ने तो हालात को पेचीदा ही बना दिया है. क्योंकि आदिवासी इलाकों को विश्वास में लेने का ही प्रयास ही नहीं किया गया. प्रकृति और आदिवासी संस्कृति की किसी भी संरचना से छेड़छाड़ घातक ही है. यहां उलगुलान के उस नायक की इस उक्ति को याद करने की जरूरत है जिसने हूल की परंपरा को वैचारिक तौर पर जीया. उस नायक का नाम है बिरसा मुंडा. जिन्होंने कहा था उलगूलान का अंत नहीं.

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