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केंद्र सरकार और किसानों के बीच पांचवें दौर की वार्ता भी बेनतीजा, 9 को फिर बातचीत

New Delhi: नये कृषि कानूनों का विरोध कर रहे किसान संगठनों और केंद्र सरकार के बीच शनिवार को हुई पांचवें दौर की बातचीत भी बेनतीजा रही. अब 9 दिसंबर को फिर बातचीत होगी.

शनिवार की बातचीत में किसानों ने केंद्र सरकार से स्पष्ट लहजे में कह दिया कि उनके पास राशन-पानी को कोई कमी नहीं है, इसलिए वो अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर डटे रहेंगे. उन्होंने यह भी कहा कि मांगें माने जाने तक संघर्ष जारी रहेगा लेकिन वे प्रदर्शन के दौरान हिंसा का रास्ता अख्तियार नहीं करेंगे.

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राज्यों से लिया जायेगा परामर्श

सरकार ने कहा है कि वो राज्यों से परामर्श कर एक प्रस्ताव किसानों के पास भेजेगी. भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत ने बताया कि मीटिंग के दौरान केंद्र सरकार ने कहा कि वो इस मसले पर राज्यों से भी संपर्क करना चाहती है.

टिकैत ने कहा, “एमएसपी पर भी चर्चा हुई, लेकिन हमने कहा कि हमें कानूनों पर भी चर्चा करनी है और उन्हें वापस लेना है.” मीटिंग में शामिल रहे एक और किसान नेता ने मीडिया को बताया कि सरकार 9 दिसंबर को किसानों के विचार के लिए एक प्रपोजल भेजेगी.

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किसानों ने नये कानून से ये हैं शंकाएं

1. किसानों का मानना है कि कृषि बाजार और कंट्रैक्ट फार्मिंग पर कानून से बड़ी कंपनियों को बढ़ावा मिलेगा. कृषि खरीद पर कंपनियों का नियंत्रण होगा. कृषि उत्पादों की सप्लाइ और मूल्यों पर भी उनका कब्जा हो जायेगा. भंडारण, कोल्ड स्टोरेज, फूड प्रोसेसिंग और फसलों के ट्रांसपोटेशन पर भी एकाधिकार की आशंका. नये कानून से मंडी सिस्टम के खत्म हो जायेगा.

2. आवश्यक वस्तु कानून में संशोधन से जमाखोरी और ब्लैक मार्केटिंग को बढ़ावा मिलेगा. सभी शहरी और ग्राणीण गरीबों को बड़े किसानों और निजी फूड कॉरपोरेशन के हाथों में छोड़ देना होगा.

3. कृषि व्यापार फर्म्स, प्रोसेसर्स, होलसेलर्स, ऐक्सपोर्टर्स और बड़े रिटेलर अपने हिसाब से बाजार को चलाने की कोशिश करेंगे. इससे किसानों को नुकसान होगा.

4. कांट्रैक्ट फार्मिंग वाले कानून से जमीन के मालिकाना हक खतरे में पड़ जायेगा. इससे कांट्रैक्ट और कंपनियों के बीच कर्ज का मकड़जाल फैलेगा. कर्ज वसूलने के लिए कंपनियों का अपना मैकनिजम होता है.

5. किसान अपने हितों की रक्षा नहीं कर पायेंगे. ‘फ्रीडम ऑफ च्वाइस’ के नाम पर बड़े कारोबारी इसका लाभ उठायेंगे.

6. इस कानून में विवादों के निपटारा के लिए SDM कोर्ट को फाइनल अथॉरिटी बनाया जा रहा है. किसानों की मांग है कि उन्हें उच्च अदालतों में अपील का अधिकार मिलना चाहिए.

7. कृषि अवशेषों के जलाने पर किसानों को सजा देने को लेकर भी किसानों में रोष है. किसानों का कहना है कि नए कानून में किसानों को बिना आर्थिक तौर पर मजबूत किए नियम बना दिए गये हैं.

8. प्रस्तावित इलेक्ट्रिसिटी (संशोधन) कानून के कारण किसानों को निजी बिजली कंपनियों के निर्धारित दर पर बिजली बिल देने को मजबूर होना पड़ेगा.

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