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फैज अहमद फैज की वो मशहूर नज्म जिस पर विवाद छिड़ा हुआ है- हम देखेंगे

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पाकिस्तानी शायर फ़ैज़ अहमद फैज की नज़्म ‘हम देखेंगे’ को पिछले दिनों आइआइटी कानपुर में छात्रों ने कैंपस में गाया था. इसके बाद इस नज्म पर विवाद छिड़ गया. आइआइटी कानपुर के डिप्टी डायरेक्टर मनिंद्र अग्रवाल को कुछ छात्रों ने शिकायत की. शिकायत में कहा गया ये नज्म एक खास समुदाय की पैरवी करता है. साथ ही कहा गया कि कॉलेज कैंपस में इसे नहीं गाया जाना चाहिये. इससे हिंदुओं की धार्मिक भावना को ठेस पहुंच सकती है.  शिकायत मिलने के बाद जब आइआइटी ने मामले की जांच करने के आदेश दिये. और अब इसके लिए बकायदा एक कमिटी बना दी गयी है. लेकिन तब तक मामला राष्ट्रीय स्तर पर छा गया. सोशल मीडिया पर इस मुद्दे पर लोग अलग-अलग राय रख रहे हैं. इनमें कुछ लोग फ़ैज़ की नज़्म को एंटी-इंडिया और हिंदू विरोधी बता रहे हैं और कुछ लोग अपने तर्कों से इस आरोप को खारिज कर रहे हैं. बहरहाल यहां पेश है फैज की ये मशहूर नज्म :

हम देखेंगे

लाज़िम है कि हम भी देखेंगे

वो दिन कि जिसका वादा है

जो लोह-ए-अज़ल[1] में लिखा है

जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गरां [2]

रुई की तरह उड़ जायेंगे

हम महकूमों [3] के पांव तले

ये धरती धड़-धड़ धड़केगी

और अहल-ए-हकम [4] के सर ऊपर

जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी

जब अर्ज-ए-ख़ुदा के काबे से [5]

सब बुत [6] उठवाए जायेंगे

हम अहल-ए-सफ़ा [7], मरदूद-ए-हरम [8]

मसनद पे बिठाए जायेंगे

सब ताज उछाले जायेंगे

सब तख़्त गिराए जायेंगे

 

बस नाम रहेगा अल्लाह [9] का

जो ग़ायब भी है हाज़िर भी

जो मंज़र [10] भी है नाज़िर [11] भी

उट्ठेगा अन-अल-हक़ [12] का नारा

जो मैं भी हूं और तुम भी हो

और राज़ करेगी खुल्क-ए-ख़ुदा [13]

जो मैं भी हूं और तुम भी हो

 

शब्दार्थ

  1. लोह-ए-अज़ल — विधि के विधान
  2. कोह-ए-गरां — घने पहाड़
  3. महकूमों — रियाया या शासित लोगों
  4. अहल-ए-हकम — सताधीश
  5. अर्ज-ए-ख़ुदा के काबे से — इस पृथ्वी पर से
  6. बुत — सत्ताधारियों के प्रतीक पुतले
  7. अहल-ए-सफ़ा — साफ़ सुथरे लोग
  8. मरदूद-ए-हरम — धर्मस्थल में प्रवेश से वंचित लोग
  9. अल्लाह — ईश्वर
  10. मंज़र — दृश्य
  11. नाज़िर — देखने वाला
  12. अन-अल-हक़ — मैं ही सत्य हूं या अहम् ब्रह्मास्मि
  13. खुल्क-ए-ख़ुदा — आम जनता

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