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वल्लभ भाई पटेल के घर पर उनकी सहमति से तैयार किया गया था आर्टिकल 370 का ड्राफ्ट

आर्टिकल 370 के खिलाफ नहीं थे पटेल, मोदी सरकार के दावे पर देश के इतिहासकारों ने जतायी आपत्ति

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New Delhi: विवादों के बीच जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले आर्टिकल 370 की सुविधाओं को को समाप्त करके नरेंद्र मोदी की सरकार इन दिनों सुर्खियों में छायी है. इस बड़े फैसले के बाद भाजपा की ओर से ये दावा भी किया जा रहा है कि कश्मीर को भारत से मिलाने के जो काम दशकों पहले पूरा नहीं हो पाया था, उसे अमित शाह और नरेंद्र मोदी ने पूरा कर दिखाया है.

साथ ही 552 रियासतों का भारत में विलय कराने वाले पटेल और जवाहर लाल नेहरू कश्मीर के मुद्दे पर एकमत नहीं थे. भाजपा की ओर से ये दावा लगातार किया जा रहा है. ताकि उसे देश के बुद्धिजिवियों का भी समर्थन मिल सके. दूसरी तरफ इतिहासकार भाजपा के इस दावे को नकार रहे हैं.

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गलत तथ्य पेश कर रही है भाजपा

संसद में आर्टिकल 370 पर हुई बहस के दौरान केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने जवाहरलाल नेहरू पर हमला बोला था. उन्होंने जम्मू कश्मीर की समस्या के लिए प्रथम प्रधानमंत्री को जिम्मेदार ठहरा दिया था. सिंह ने कहा था कि अगर नेहरू ने तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल को जम्मू कश्मीर समस्या को हल करने की आजादी दी होती तो ‘‘न 370 का बखेड़ा होता और न पीओके होता.’’

इसी दौरान जम्मू से भाजपा सांसद जुगल किशोर शर्मा ने आरोप लगाया कि नेहरू ने शेख अब्दुल्ला के दबाव में आर्टिकल 370 और आर्टिकल 35 ए लागू किया था. उनके मुताबिक, पटेल के अलावा बीआर अंबेडकर और श्यामा प्रसाद मुखर्जी इससे सहमत नहीं थे.

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पटेल के विचारों पर आधारित है आर्टिकल 370

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इन विवादों के बीच अशोका यूनिवर्सिटी हरियाणा में इंटरनेशलन रिलेशंस और इतिहास के प्रोफेसर श्रीनाथ राघवन का अलग ही मानना है. वे कहते हैं कि इस बात के सबूत हैं कि पटेल ने जम्मू कश्मीर में आर्टिकल 370 का पूरी तरह समर्थन किया था. एक अंग्रेजी अखबार से बातचीत में राघवन ने कहा है कि आर्टिकल 370 पूरी तरह सरदार पटेल की विचार पर आधारित था. और यही नहीं इस विषय पर उनके विचारों को नेहरू ने दूसरे नेताओं के मुकाबले कहीं ज्यादा अहमियत दी थी.

अकेले नेहरू ने नहीं, देश की संविधान सभा ने पास किया आर्टिकल को

राघवन आगे कहते हैं, ‘यह कहना मूर्खता है कि सिर्फ नेहरू ने इसे लागू किया. क्योंकि यह सरकार की ओर से लिया गया अकेला नीतिगत फैसला नहीं था. इसे देश की संविधान सभा ने पास किया था.’ इतिहासकार राघवन के अनुसार आर्टिकल का ड्राफ्ट तैयार करने के लिए पहली बैठक 15 और 16 मई 1949 को पटेल के घर पर हुई थी. और इस समय वहां जवाहर नेहरू भी मौजूद थे.

…और हुआ कुछ यूं था

इस ड्राफ्ट के बारे में राघवन ने कहा कि जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला से बात करने वाले मंत्री एनजी आयंगर ने नेहरू की ओर से अब्दुल्ला को भेजे जाने वाले पत्र का ड्राफ्ट लिखा तो उन्होंने इसे पटेल के पास इसे देखने के लिए भेजा था. इसमें नेहरू ने एक नोट भी लिखा था. आयंगर ने पटेल को लिखा था, ‘क्या आप जवाहरलालजी को सीधे बतायेंगे कि इस पर आपकी रजामंदी है या नहीं?

इस चिट्ठी पर आपकी सहमति के बाद ही नेहरू इसे शेख अब्दुल्ला को भेजेंगे.’ उन्हीं दिनों, जब नेहरू विदेश में थे, पटेल ने आयंगर से कहा था कि वह अब्दुल्ला से बातचीत जारी रखें. अब्दुल्ला ने कहा था कि कश्मीर में आधारभूत अधिकार व नीति निर्देशक सिद्धांतों के लिए भारतीय संविधान को स्वीकार करने का निर्णय देश की संविधान सभा पर छोड़ दिया जाना चाहिये.

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