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देश की सुरक्षा के नाम पर असहमित के स्वर को दबाने की घिनौनी चाल हमें विध्वंस के रास्ते ढकेल रही है

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Faisal  Anurag

जब इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगा कर जयप्रकाश नारायण सहित सभी बड़े विपक्षी नेताओं को आधी रात में गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया था, तब भारत में लोकतंत्र के भविष्य को ले कर सारी दुनिया की लोकतांत्रिक ताकतों ने गंभीर सवाल उठाये थे. ऐसा जान पड़ा था कि भारत एक ऐसे तानाशाही के दौर में गिरफ्त हो चुका है, जिससे मुक्ति संभव ही नहीं है. इंदिरा गांधी ने भी देश की सुरक्षा का सवाल उठाया था और गिरफ्तारियों को न्यायसंगत करार दिया था.

तब के भारत के नागरिकों ने इसे स्वीकार नहीं किया और जब 18 महीनों बाद उसे वोट देने का मौका मिला, तो उसने इंदिरा गांघी को न केवल सत्ता से बेदखल कर दिया बल्कि भारत की राजनीति का पूरा मुहावरा ही बदल दिया. तब से लंबा अरसा गुजर चुका है. लेकिन नागरिकों के लोकतंत्र की चेतना को लेकर इस तरह की अशंका पहली बार उठ रही है.

लोक स्वीकृति से सख्त शासन का नया निजाम अपनी जड़ें मजबूत कर चुका है. इसका नतीजा तमाम स्वतंत्र व निष्पक्ष भूमिका की अपेक्षा वाले संस्थानों पर भी देखा जा सकता है.

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लोकतंत्र के भविष्य को जिस तरह फार राइट समूहों के उभार से चुनौती मिल रही है, उससे दुनिया भर के लोकतंत्रवादी चिंतित हैं. आधुनिक लोकतंत्र की विचारधारा को जन्म देने वाले देशों में अतिदक्षिणपंथी समूहों के उभार को साफ दिख रहा है. इन सभी दक्षिणपंथियों की कुछ सामान्य खाससियतें हैं. इसमें धार्मिक और  नस्लीय विषमता के तत्व प्रमुख हैं. दुनिया भर में माइग्रेट समूहों के प्रति नफरत बरती जा रही है.  इसी का लाभ उठा कर नवनात्सी प्रवृतियां यूरोप में दस्तक दे रही हैं.

अमरीका में भी नस्लीय उन्माद का उभार है. और भारत जैसे लोकतंत्र में भी माइग्रेंटों की सांप्रदायिक राजनीति आज परवान पर है. लोकतंत्र में विचारों की असहति के प्रति सहिष्णुता का तत्व भी कमजोर दिख रहा है. भारत के आसपास के देशों में तो लोकतंत्र की जड़ें बेहद कमजोर हैं. दक्षिणपंथ एक दुश्मन का निर्माण करता है और फिर उसके खिलाफ नफरत का माहौल बनाता है. सत्ता में आने का यह सरल रास्ता माना जा रहा है.

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आर्थिक नीतियों की लगातार नाकामयाबियों के बीच लोगों में भ्रम पैदा करने का दक्षिणपंथी तरीका उसे वोट तो दिला देता है, लेकिन समस्याओं में देशों को उलझा भी देता है. इससे अनेक वैश्विक सवाल पैदा हुए हैं,  जिनका कोई हल नहीं दिखता है. और दुनिया को युद्ध के खतरों से घेरने की साजिश भी बढ़ रही है. यदि एशियाई भूभाग युद्ध की आशंका से ग्रस्त हैं, तो इसके कारणों को समझने के लिए दक्षिणपंथी अभियानों को भी गंभीरता से देखना चाहिए. अमरीका की अनेक नीतियों कर असर यह है कि एशिया के अनेक देश आर्थिक ठहराव के शिकार हैं. लेकिन हथियारों की होड़ में अग्रणी हैं.

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डालर के इलाकों में तो अधिकांश देश आंतरिक हिंसक उन्माद में फंसे हुए हैं. तालिबान अमरीका के बीच जारी बातचीत को अमरीका ने एकतरफा रोक कर युद्ध के माहौल को और गहरा होने का संकेत दिया है. अफगानिस्तान की त्रासदी यह है कि वह देश के भीतर कोई फेसला नहीं ले सकता. क्योंकि आर्थिक प्रभुत्व वाले देशों की नजर उस पर है. सामरिक महत्व के नजरिये से उसकी खासी अहमियत है.

अमरीका वहां से अपने सैनिकों की वापसी तो चाहता है लेकिन उस पर अपना नियंत्रण नहीं खोना चाहता है. उसे डर चीन से है कि उसके होते हुए ही चीन अपने प्रभाव में अफगानों को ले सकता है.

इस वैश्विक माहौल में भारत के लोकतंत्र के समक्ष भी चुनौती है. यह चुनौती आंतरिक राजनीतिक फैसलों के कारण गंभीर होने का संकेत है. डॉ फारूक अब्दुल्ला को जिस तरह गिरफ्तार किया गया है उसे लेकर विपक्षी दलों ने गंभीर सवाल उठाये हैं. डॉ फारूक अब्दुल्ला उन नेताओं में हैं जो भारत में कश्मीर के विलय को अंतिम मानते हैं और मुख्यधारा की राजनीति के केंद्रीय नेता हैं. बाजपेयी सरकार के समय वे केंद्र में मंत्री भी रहे. यहां तक कि अपने प्रभाव से एनडीए के लिए दूसरे दलों का समर्थन जुटाने में भी भूमिका निभा चुके हैं. उन्हें राष्ट्रविरोधी या राष्ट्र के लिए खतरा बताया गया है.

पहले तो उन्हें नजरबंद किया गया और जब तमिल नेता वाइको नेता ने सुप्रीम कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की तो इन्हें एक बदनाम कानून के तहत गिरफ्तार कर लिया गया. इस कानून के तहत गिरफ्तार होने वाले मुख्यधारा की राजनीति के वे पहले नेता हैं. इस कानून का निर्माण उन तत्वों की गतिविधियों को रोकने के लिए किया गया था जो हिंसक गतिविधियों को अंजाम देते हैं या अन्य देशविरोधी कार्य करते हैं. दरअसल यह बेहद चैंकाने वाला मामला है. एक तरफ केंद्र सरकार कश्मीर में हालात को सामान्य बता रही है, लेकिन वहां जाने से नेताओं को रोक भी रही है.

भाजपा के कद्दावर नेता रहे यशवंत सिन्हा को भी श्रीनगर एयरपोर्ट पर रोक दिया गया. सोशल मीडिया पर तो यह जुमला वायरल है कि यदि कश्मीर जाना है तो सुप्रीम कोर्ट से बीजा लो. यह बिजा भी अनेक प्रतिबंधों के साथ ही मिलेगा. भारत का संविधान नागरिकों को देश में कही भी आने-जाने ओर राजनीतिक गतिविधयों में शामिल होने का अधिकार देता है. लेकिन पिछले 44 दिनों से लोकतंत्र में कश्मीरी अब भी घरों में बंद हैं.

यह भारत के लोकतंत्र की एक बड़ी चुनौती है कि किसी भी तरह से इमरजेंसी के दोहराव को अंजाम में आने से रोका जाये.  एनआरसी एक और बड़ा मामला है जिसमें बड़ी संख्या में नागरिकों का भविष्य अंधकार में है.

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