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कोरोना की तबाही और आदिवासियत : एक विचार सह जीवन पद्धति

Ghansheyam

आज जब अपने देश सहित दुनिया के अनेक देशों कोरोना महामारी ने भयंकर तबाही मचा रखी है, ऐसी स्थिति में आदिवासियत पर बातें करना अपना एक विशेष महत्व रखता है. यह इस अर्थ में महत्वपूर्ण और उपयुक्त है कि इसे जानने, समझने और बरतने से शायद थोड़ा सुकून मिल सकता है. इस संकट की घड़ी में कोई राह दिख सकती है. इस घनघोर अंधेरे की अवस्था /व्यवस्था में आगे बढ़ने की रोशनी मिल सकती है.

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आइए अब शुरू करते हैं कुछ सवालों से

आदिवासियत है क्या

इसका जवाब बहुत संक्षेप में दिया जा सकता है कि यह एक जीवन पद्धति है. और इस जीवन पद्धति को विचारों और आचारों में पिरोया है आदिवासी पुरखों ने. लेकिन महज इतना कहने से काम नहीं चलने वाला. इसलिए इसे कुछ विस्तार से समझाने की कोशिश करूंगा.

आदिवासियत के विचारों को सिलसिलेवार ढंग से समझने के लिए यह समझना होगा कि प्रकृति के समायोजन और समृद्धि में संघर्ष और सहजीविता का संतुलन और समन्वय है.

जैसे यह बीज, माटी और पानी समायोजन और संघर्ष के उदाहरण से समझा जा सकता है. बीज जब माटी में मिल जाता है और जरूरत भर पानी उसे मिल जाता है तब वह प्रस्फुटित होता है. इस प्रस्फुटन में बीज अपने अंदर भी संघर्ष करता है और मिट्टी से संघर्ष कर माटी से बाहर निकलता है. जिसे वायुमंडल सहेजता है.

यानी बीज वायुमंडल में विराजमान जल और प्राणवायु के साथ सहजीविता निभाता है. और धीरे-धीरे पुष्पित होता चला जाता है. इस प्रक्रिया में मिट्टी और पानी के अंदर विराजमान हजारों सूक्ष्म प्राणी इसे पल्वित होने में मददगार होते हैं. यह सब प्रकृति के अंदर छिपी सहजीविता है.

आदिवासी समाज/समुदाय इस सहजीविता से न सिर्फ परिचित रहता था/है बल्कि इसकी समझ के आधार पर अपनी “जीवन श्रृंखला” और “जीवन वृत” तैयार करता था/ है. यानी यह कह सकते हैं कि इनका जीवन प्रकृति के समुच्चय (यानी जल, जंगल, जमीन, पशुधन और कुक्कुट, जड़ी बूटियां) पर निर्भर है, संपोषित है.

वैसे एक जमाने में यही बात अन्य समुदायों के साथ थी. लेकिन प्रकृति पर विजय पाने और उसे गुलाम बनाने की अवधारणा ने इंसान के एक बहुत बड़े भाग को इस ओर धकेल दिया.

परिणामस्वरूप आज इस समुच्चय और संपोषण पर चौतरफा हमला हो रहा है. इसलिए अब शहरों के भीतर और उसकी परिधि में रहने वाले आदिवासियों का जीवन भी बहुत हद तक कृत्रिमता से भरता जा रहा है.

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