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लोकतंत्र को खोखला कर रहा है दल बदल का मौजूदा ट्रेंड

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FAISAL ANURAG

लोकतंत्र राजनीतिक नैतिकता के बगैर ढांचा भर होता है. भारत की राजनीति और संस्थाओं का होता क्षरण लोकतंत्र की जीवंतता के नजरिए से बेहद घातक प्रवृति है. खास कर संसद और विधायिका की पारदर्शिता पर जब सवाल गहराने लगे तो स्वस्थ लोकतंत्र के भविष्य को ले कर चिंता बढ़ जाती है. दलबदल का मामला इस नैतिकता को तारतार करता है और दलबदल पर फैसले को लटकाए और चुनाव के ठीक पहले फैसला स्पीकर न्यायधिकरण को सवालों के घेरे में ला खडा करता है. राजीव गांधी के जमाने में दलबदल कानून अस्तित्व में आया था तब माना गया था कि विधायिका में दलबदल की प्रक्रिया प्रभावित होगी. अटल बिहारी बाजपेयी के जमाने में इस कानून में संशोधन लाया गया और दबबदल को पार्टी विलय के नाम पर जायज ठहराने की प्रक्रिया तेज हुई. हालांकि पार्टी विलय में विधायिका सदस्यों की भूमिका को न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता है. पार्टी अपने संगठनातमक ढोचे के निर्णय से ही किसी अन्य पार्टी में विलय कर सकती है. लेकिन झारखंड विधानसभा के स्पीकर का छह विधायकों के दलबदल को उचित मान लेने से यह सवाल उठ खडा हुआ है कि क्या स्पीकर दलविशेष के हितों के अनुकूल ही न्यायिक अधिकार का इस्तेमाल करेगा.

आमतौर पर केवल सत्तालोलुपता ही दलबदल के पीछे मुख्य भूमिका निभाती है. इसमें वैचारिक प्रतिबद्धता कहीं भी मायने नहीं रखती है. भारत में लोकतंत्र की संस्थानों की पारदर्शिता के सवाल को ले कर विमर्श होता रहा है और नलागरिक समाज यह मांग करती रही है. नागरिक समाज के विमर्श को राजनीतिक दलों की ओर से जानबूझकर नजरअंदाज किया जा सकता है. नागरिक समाज दलबदल के किसी भी मामले में दल बदलने वालों को कमसे कम छह साल बाद ही पद देने की मांग करते रहे हैं. इसमें चुनाव में नहीं उम्मीदवार बनाए जाने की मांग भी शामिल रही है.

दलबदल कानून जिस तरह इस देश में मजाक हुआ है. वह बेहद संजीदा मामला है. दलबदल की यह प्रक्रिया भी देखी जाती है कि दल बदलने वाले विधायकों और सांसदों से इस्तीफा भी ले लिया जाता है और फिर उपचुनाव में टिकट दे कर सत्तारूढ दल उन्हें चुनाव में विजयी बनाने का हर जायज नाजायज उपक्रम करता है. इससे कानून ने एक तरह से दम तोड दिया है. दलबदल कानून लाने के पीछे मंशा आया राम गया राम की हरियाणवी दल बदल की बदनाम घटना से लोकतंत्र को बचाने की रही है. भजन लाल ने तो अपने पूरे विधायकों के साथ पाला बदल लिया था. इस कानून के बाद हरियाणा में ही जनहित कांग्रेस का मामला चर्चा में आया था तब उसे आठ में से छह विधायकों को भूपेद्र हुड्डा ने तोड़ लिया था. हरियाण के तत्कालीन प्रकरण में बिल्कुल दिनेश उरांव की तरह की फैसला दे कर दल बदल को जायज ठहरा दिया. मामला उच्च अदालत में गया और अदालत ने विधायकों की सदस्यता रद्द कर दिया. इस घटना के बाद भी झारखंड विधानसभा स्पीकर ने ठीक उस घटना को ही दुहरा दिया था. उत्तरप्रदेश विधान सभा के एक अध्यक्ष केसरीनाथ त्रिपाठी तो दलबदल काराने में जिस तरह की सक्रियता दिखायी थी उसे लोकतंत्र का काला अध्याय ही माना जाता है. बसपा के विधायकों के दलबदल के मामले में केसरी नाथ त्रिपाठी के रुख की पूरे देश में आलोचना की गयी थी.  बिहार में 2015 के चुनाव के बाद नितीश कुमार ने जिस तरह से मैनडेंट के विरोध में जा कर पाला बदला वह भी देश में आलोचना का विषय बना हुआ है. अभी हाल के वर्षो में गोवा में भी इसी तरह के दलबदल की घटना समाने आयी है.

भारत में यह आम बात हो गयी है कि चुनाव के ठीक पहले कई नेता उस दल के साथ जुड जाते हैं जहां उन्हें जीत की गारंटी लगती है. इसमें विचार और जनता के विश्वास के साथ खिलवाड किया जाता हे. बावजूद इसके इस तरह की घटना आम प्रचलन में है. लोकतंत्र. में अलग-अलग दलों का अस्तित्व विचारों की भिन्नता और भिन्न किस्म के सामाजिक आर्थिक रूझान के लिए होता है. लेकिन भारत में पिछले तीस सालों में देखा जा रहा है कि यह विभाजन की दरार चौड़ी होती जा रही है. राजनीतिक दलों के लिए भी इससे चुनावी वायदे न निभाने और समाज में टकराव के सवालों को उठा कर वोट हासिल करने की प्रवृति बरती जाती है. कुछ ही दल इसके अपवाद है.

भारत दुनिया का सबसे बडा लोकतंत्र हैं लेकिन लोकतांत्रिक मूल्यों की जीवंतता की दृष्टि से बेहद खोखला होता जा रहा है. मतदाताओं की लगातार बढती हिस्सेदारी के बावजूद उन्हें तब निराशा होती है जब वे देखते हैं कि उनके विश्वास और वोट का नेता किस तरह दलबदल कर अपमान करते हैं. लेकिन जाति और धर्म के आधार पर बंटे मतदाओं की बहुसंख्या इसे नजरअंदाज भी कर देती है. इससे दलबदल करने वालों का उत्साह अपने समर्थकों के कारण ही बढ जाता है. इससे लोकतंत्र का संकट ही गहराता है.

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