Opinion

वर्तमान दलबदल परिपाटी की वजह से लोकतांत्रिक मूल्यबोध को खतरा पहुंचा है

Faisal Anurag

जिस तेजी से दलबदल कानून ने प्रासंगिकता खोयी है, किसी अन्य कानून ने नहीं. भारत में जिस तरह खुले तौर पर दलबदल होता है और उसे संरक्षण दिया जाता है, दुनिया के किसी भी परिपक्व लोकतंत्र में ऐसा कम ही होता है. दलबदल की परिघटनाओं ने न केवल जनादेश बल्कि संवैधानिक संरक्षण के सवाल को भी कठघरे  में खड़ा कर दिया है. मजबूत लोकतंत्र को ले कर भी सवाल खड़े हुए हैं. ऐसे हालात में संविधान के प्रावधानों और मूल अधिकारों के संरक्षण का दायित्व भी पूरी ताकत से नहीं निभाया गया है. यह एक बेहद जटिल दौर है. जिसमें लोकतंत्र की बुनियाद ही कमजोर होती प्रतीत हो रही है.

लोकतंत्र मात्र चुनावी प्रक्रिया भर नहीं होता. बल्कि वह मूल्यबोध से भी लैस होता है. भारत के संविधान ने जिन लोकतांत्रिक मूल्यों को स्थापित करने का संकल्प दिखाया है, व्यवहार में उसके साथ खुलेआम खिलवाड़ होता देखा जा रहा है.

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दलबदल को रोकने का दायित्व आखिर किसका है? वे कौन से हालात हैं जिसमें बहुमत के बावजूद किसी भी राज्य सरकार के टिकाउ होने की गारंटी नहीं दिख रही है? इन सवालों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. उस हालत में तो और भी जब पानी खतरे के निशान को पार कर गया है. भारत में आजादी के बाद से ही देखा गया है कि दलबदल की प्रवृति आम रही है. लेकिन उस जामाने में इसे शर्मनाक समझने की प्रवृति थी.

इसके बाद, 1967 से यह आम प्रवृति हावी हो गयी. एक कानून के जानकार के अनुसार दलबदल विरोधी कानून निश्चित तौर पर काफी हद तक दलबदल पर अंकुश लगाने में सक्षम है. लेकिन, हालिया माहौल को देखें तो निजी लाभ के लिए निर्वाचित सदस्यों के समूहों में दूसरे दल का शामिल हो जाना लोकतंत्र के लिए खतरनाक है. राज्य विधानसभाओं और यहां तक कि राज्यसभा में दलबदल के हालिया उदाहरणों में यह बात सामने आई है.

ऐसे मामले बताते हैं कि कानून की खामियों को दूर करने के लिए इस पर एक बार फिर विचार करने की जरूरत है. हालांकि यह तय है कि समाज हित में ये कानून काफी कारगर रहा है. निर्वाचित सदस्यों की दलगत आस्था डगमगाने से राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति पैदा होती है. गोवा, तेलंगाना और कर्नाटक इसके ताजा उदाहरण हैं. लेकिन यह भी तथ्य है कि सदस्यों की दलगत आस्था तभी कमजोर पड़ती है जब उन्हें किसी तरह का प्रलोभन हासिल है. इसके कम ही उदाहरण हैं कि पार्टियों की नीतियों या कार्यशैली से असंतोष के कारण दलबदल होता हो. हालिया घटनाओं में तो इसके कम ही उदाहरण हैं.

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1955 में संविधान की 10वीं अनुसूची में शामिल किए गए दलबदल कानून में कई बदलाव किए गए हैं. 2003 में इस तर्क के साथ संशोधन किया गया कि 1985 के कानून के कारण सामूहिक दलबदल की प्रवृति को बढ़ावा मिला है. 1985 के कानून में पार्टी के विभाजन के लिए एक तिहाई सदस्यों के अलग होने के प्रावधान को तय माना गया था.  फिर कानूनविदों ने माना था कि इसका बेजा इस्तेमाल होता है. और दलबदल की प्रवृति को रोकना संभव नहीं हो पा रहा है.

2003 में संसद को 91वां संविधान संशोधन करना पड़ा. जिसमें व्यक्तिगत ही नहीं बल्कि सामूहिक दल-बदल को भी असंवैधानिक करार दिया गया. एकमात्र प्रावधान है, जिसके जरिए अयोग्यता से बचा जा सकता है, वह है दल के विलय से संबंधित प्रावधान. इसे 10वीं अनुसूची के अनुच्छेद 4 में शामिल किया गया है.

हाल के घटनाक्रम ने साबित किया है कि यह भी अपनी प्रासंगिकता को खो चुका है. गुजरात, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, हरियाणा, मणिपुर, नागालैंड, झारखंड सहित अनेक राज्य गवाह हैं कि विधायिका इस प्रावधान की रक्षा नहीं कर पायी है. अदलातों की भूमिका भी सवालों में रही है.

भारत ने काफी हद तक ब्रिटिश संसदीय जनतांत्रिक प्रणाली को अपनाया है. इसलिए संसदीय राजनीतिक क्रियाकलापों को लेकर हमारे यहां अक्सर ब्रिटिश संसद के उदाहरण पेश किए जाते हैं. लेकिन ब्रिटेन की परंपराओं और भारत में अब तक के विकसित लोकतांत्रिक रिवायत में बहुत अंतर पैदा हो चुका है. इसकी नजीरें पेश की जाती हैं.

ब्रिटेन की संसद में कोई भी निर्वाचित सदस्य सदन में पार्टी के रुख से अपनी स्पष्ट असहमति व्यक्त कर सकता है. वह पार्टी के आधिकारिक रुख के खिलाफ वोट भी दे सकता है. लेकिन दो मौकों पर उसे पार्टी व्हिप का पालन अनिवार्य रूप से करना होता है. पहले अविश्वास प्रस्ताव के समय और दूसरा- वित्तीय विधेयक (मनी बिल) के दौरान. इसमें अगर सदस्य अपनी पार्टी के अनुशासन का पालन नहीं करता है तो उसकी सदस्यता खारिज हो जाती है.

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लेकिन भारत में अपनी पार्टी से असहमत होने का संसदीय अधिकार नहीं है. ऐसे सदस्यों को अपनी सदस्यता गंवानी पड़ती है. हाल ही में बिहार में सत्ता हाइजेक करने के बाद जदयू के दो सांसदों शरद यादव और अली अनवर ने अपनी पार्टी की नीतियों की आलोचना की. और राज्यसभा से उनकी सदस्यता रद्द करने की मांग जदयू ने की. राज्यसभा सभापति ने इस पर तुरंत सुनवाई कर सदस्यता को रद्द कर दिया. अदालत भी दोनों को सरंरक्षण नहीं दे पायी.

एक विरोधाभाष ही इसे कहा जा सकता है कि सचिन पायलट के बगावत और हरियााणा में उेरा डालने के बाद राजस्थान में व्ळप उल्लंघन करने के मामले में स्पकर की नोटिस पर कोर्ट  कोइ्र फौरी फेसला नपहीं कर पा रहा है. कहा गया कि सचिन पायलट और उनके समर्थकों को सदन के बाहर की गतिविधियों के कारण नोटिस दिया गया है. शरद यादव और अली अनवर के मामले में भी यही मामला है लेकिन वहां सभापति के फैसले को माना लिया गया जब कि राजस्थान में सदस्यों का निष्कासन नहीं हुआ है केवल नोटिस दी गयी है.  जबकि शरद यादव और अली अनवर को भी सदन के बाहर की गतिविधियों के कारण ही अपनी सदस्या खोनी पडी.

इस तरह के कइ्र उदाहरण मौजूद हैं. सवाल स्पीकर और अदलतों के अकराव का भी बना है जो पिछले 40 सालों में कइ्र बार देखने को मिला हे. लेकिन बुनियादी सवाल यह हे कि क्या जनाता के आदेश के साथ कानूनी कमजोरियों का सहारा ले कर या प्रत्यक्ष तौर पर दबबदल को इस्तीफे के नाम पर स्वीकृृति मिलती रहेगी.

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