Opinion

लोकतांत्रिक अधिकारों पर चोट पहुंचा कर तानाशाही की ओर बढ़ रहा है देश

Faisal Anurag

दंगों में पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाना सांप्रदायिक भेदभाव फैलाना है. और आदिवासी, दलित और अल्पसंख्यकों के हितों की बात करना  लोगों को भड़काना है. दिल्ली और कनार्टक पुलिस का तो यही नजरिया है. इन सवालों को पर भी एफआईआर दर्ज हो सकता है. दिल्ली पुलिस अमित शाह के अधीन है. और कर्नाटक पुलिस भाजपा की यदुरप्पा सरकार के अधीन है. दोनों के एफआईआर दो ऐसे व्यक्तियों के खिलाफ दर्ज हुए हैं जिनकी अंतरराष्ट्रीय छवि है.

एक पत्रकारिता के बड़े नाम हैं तो दूसरे बड़े लेखक हैं. देश में अपनी बेबाक टिप्पण्यिों के लिए प्रसिद्ध विनोद दुआ के खिलाफ दिल्ली पुलिस ने एक भाजपा नेता की शिकायत पर एफआईआर दर्ज किया है. कर्नाटक पुलिस ने जानेमाने टिप्पणीकार, लेखक और एमनेस्टी इंटरनेनल के इंडिया प्रमुख रह चुके आकार पटेल पर एफआईआर दर्ज किया है.

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विनोद दुआ,  जिनका विनोद दुआ शो और विनोद दुआ लाइव प्रोग्राम खासा लोकप्रिय है, ने दिल्ली पुलिस की भूमिका को ले कर अपने कार्यक्रम में कुछ सवाल उठाए थे. भाजपा में बरास्ते पत्रकारिता पहुंचे नवीन कुमार को ये सवाल अखर गए. नवीन कुमार जी न्यूज में काम कर चुके हैं. और मोदी समर्थक पत्रकार की पहचान बना कर भाजपा में गए हैं, ने दिल्ली पुलिस से शिकायत की. और एफआईआर दर्ज हो गया.

विनोद दुआ ने ट्वीट कर एफआईआर दर्ज करने की सूचना दी है. यूट्यूब पर आने वाले विनोद दुआ शो के एपीसोड 245 को एफआईआर का आधार बनाया गया है. जिसमें दिल्ली दंगों में पुलिस और सरकार की भूमिका पर तीखे सवाल उठाये गये थे. विनोद दुआ के अनुसार उनसे क्राइम ब्रांच ने इस सिलसिले में अब तक संपर्क नहीं किया है. लेकिन नवीन कुमार इसका काफी प्रचार कर रहे हैं. इस मसले पर उन्होंने फेसबुक लाइव भी किया. दिल्ली के पत्रकारों में इसपर काफी आक्रोश है.

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दूसरी ओर आकार पटेल ने जार्ज फलॉयड की बर्बर हत्या के बाद उभरे विरोध प्रदर्शन को ले कर 31 मई को ट्वीट किया था. इस ट्वीट में उन्होंने देश में दलितों, आदिवासियों और मुस्लिमों पर हो रहे रहे अत्याचार के खिलाफ अमेरिका जैसे विरोध प्रदर्शनों की जरूरत पर जोर दिया था. लेकिन इसे लोगों को भड़काने वाला ट्वीट बता कर शिकायत की गयी. और बेंगुलरू के जेसीनगर थाने में एफआईआर दर्ज किया गया है.

एक तीसरी घटना असम की है. जहां किसान नेता अखिल गगोई के साथी बिट्टू सोनेवाल के खिलाफ एनआईए ने एक विचित्र आरोप चस्पा कर उनके खिलाफ यूएपीए के तहत मामला दर्ज किया है. रूसी क्रांति के महान नायक लेनिन की तस्वीर सोशल मीडिया पर पोस्ट करने और कामरेड तथा लाल सलाम लिखने को गंभीर बताया गया है.

एनआईए इसे देशद्रह बता रहा है. सभी जानते हैं कि दुनिया भर में लेनिन श्रमिकों के मुक्तिदाता के रूप में याद किए जाते हैं. और राजनीति विज्ञान व दर्शन शास्त्र में उनकी स्थापनाओं को ले कर न केवल गंभीर विमर्श होता है बल्कि दुनिया भर की अनेक भाषाओं में उन पर लेख लिखे गये हैं. कामरेड और लाल सलाम करने वाले राजनीतिक दल तो संसद में भी मौजूद हैं. और केरल में उनकी सरकार चलती है.

यह भारत में ही संभव हो पा रहा है कि ऐसे बेतुके आरोप लगाये जा रहे हैं. और नागरिकों के प्रतिरोध के अधिकारों के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है. तय है कि इस तरह की बेतुकी कार्रवाइयों की प्रतिक्रिया देश और दुनिया भर में होगी. एमनेस्टी ने तो आकार पटेल का पक्ष लेते हुए  आलोचना की है. आकार पटेल हों या विनोद दुआ उनकी अपनी साख है. और वे अपने विचारों को खुल कर रखते आए हैं. विनोद दुआ ने यह छवि कोई एक दिन या पिछले छह सालों में नहीं बनायी है.

पत्रकारिता में उनका कैरियर चार दशक से भी ज्यादा का है. और वे अपनी बेबाकी के लिए ही जाने जाते हैं. जो वस्तुपरकता और तथ्यों के साथ खिलवाड़ नहीं करता है. आकार पटेल के लेखन की भी अपनी एक अलग पहचान है. उससे सहमत या असहमत हुआ जा सकता है. लेकिन न तो उसे नजरअंदाज किया जा सकता है और न ही उनकी साख पर सवाल होता है. लेकिन पिछले छह सालों में देखा गया है कि जिन लेखकों या पत्रकारों ने सच का साथ दिया है और अपनी आवाज बुलंद की है, या तो उन्हें बदनाम किेया गया है या फिर उन पर कार्रवाई की गयी है.

हाल ही में एक प्रसिद्ध संस्था ने लोकतंत्र पर 92 देशों को ले कर रिपोर्ट  प्रकाशित की है. उसने भारत के लोकतंत्र को ले कर चिंता प्रकट करते हुए कहा है कि जिस तरह अभिव्यक्तिदी की आजादी और लोकतांत्रिक प्रतिरोध करने वालों के साथ निपटा जा रहा है, उससे भारत में लोकतंत्र कमजोर हो रहा है. और तेजी से तानाशाही वाले देशों की तरह बदल रहा है.

भारत की यह छवि जिन घटनाओं से बन रही है, उनमें इस तरह की घटनाओं से इजाफा ही हो रहा है. राजीव बजाज को राहुल गांधी से सार्वजनिक बात करने के लिए उनके मित्र आगाह करते हैं तो समझा जा सकता है कि देश में किस तरह के भय का माहौल है.

दिल्ली में जिस तरह सीएए के खिलाफ आंदोलन करने वाले छात्रों के खिलाफ कोरोना आतंक के बीच दिल्ली पुलिस ने कार्रवाई की है, उसे भी ले कर दुनिया भर में लिखा जा रहा है. और सोशल मीडिया पर पोस्ट वायरल हो रहे हैं. सरकार से पूछा जा रहा है कि भारत का संविधान यदि लोगों के अधिकारों की गारंटी देता है तो फिर उसकी अनदेखी क्यों की जा रही है?

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