Opinion

अवमानना बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बहस को निर्णायक शेप देने की जरूरत है

Faisal Anurag

सुप्रीम कोर्ट में जारी प्रशांत भूषण अवमानना मामले ने अवमानना बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बहस को एक बार फिर मुखर कर दिया है. अरुण मिश्र की बेंच ने 2009 के इस मामले की सुनवाई पूरी कर ली है. और उसे अब यह फैसला सुनाना है कि वह सुनवाई जारी रखेगी या नहीं. सुप्रीम कोर्ट में हुई वर्चुअल सुनवाई के दौरान जस्टिस मिश्र ने वरिष्ठ वकील राजीव धवन से पूछा था कि बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और फिर अवमानना, हम इस प्रणाली की गरिमा को कैसे बचा सकते हैं? मैं आपसे एक सलाहकार के रूप में जानना चाहता हूं ताकि हम इस संघर्ष से बच सकें. राजीव धवन प्रशांत भूषण के वकील के तौर पर बहस कर रहे थे. राजीव धवन के अलावे तरूण तेजपाल के वकील के तौर पर कपिल सिब्ब्ल ने बहस की. 11 साल बाद प्रशांत भूषण व तरूण तेजपाल के खिलाफ दर्ज अवमानना मामले की सुनवाई हो रही है.

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पिछले दिनों जस्टिस अरुण मिश्र ने प्रशांत भूषण के एक ट्वीट को स्वत: संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट की अवमानना किए जाने का मामला संज्ञान लिया था. यह ट्वीट वर्तमान मुख्य न्यायधीश की अदालत के बाहर के एक कार्यक्रम को ले कर है. इस मामले की सुनवाई न्यायाधीश अरुण मिश्र की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ कर रही है. पीठ में न्यायाधीश बीआर गवई और न्यायाधीश कृष्णा मुरारी भी शामिल हैं. 2009 में वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पर टिप्पणी करने को लेकर केस दर्ज़ हुआ था. एक अन्य मामला प्रशांत भूषण के द्वारा किये गए ट्वीट (tweet) से संबंधित है.  जिसमें उन्होंने सोशल मीडिया साईट्स ट्विटर पर पोस्ट किये गये कथित अवमाननाकारक ट्वीट में सर्वोच्च न्यायालय की आलोचना की थी.

प्रशांत भूषण लगातार न्यायपालिका से जुड़े मुद्दों को उठाते रहे हैं. कुछ समय पूर्व उन्होंने वैश्विक महामारी के दौरान दूसरे राज्यों से पलायन कर रहे कामगारों के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के रवैये की तीखी आलोचना की थी. प्रशांत भूषण ने भीमा-कोरेगांव मामले में आरोपी बनाए गए वरवरा राव और सुधा भारद्वाज जैसे कार्यकर्ताओं के साथ हो रहे दुर्व्यवहार के बारे में भी बयान दिये थे.

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प्रशांत भूषण ने 123 पृष्ठों में देते हुए कहा था कि मुख्य न्यायधीश की आलोचना सुप्रीम कोर्ट की अवमानना नहीं है. इस विवाद के बाद भारत के न्याय जगत में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं आयी हैं. कुछ पूर्व न्यायधीशों ने प्रशांत भूषण के ट्वीट को अवममाना नहीं माना है. इस विवाद के बाद ही यह बहस तेज हो गयी है कि आखिर अवमानना है क्या? इसे परिभाषित किए जाने की जरूरत है. सुप्रीम कोर्ट के कई जज पहले कह चुके हैं कि किसी फैसले से असहमित जताना कंटेंप्ट नहीं माना जा सकता है. कोर्ट के बाहर जज की गतिविधियों पर टिप्प्णी अवमनना है या नहीं, यह तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ही तय होगा. लेकिन इस बीच यह विवाद भारत की सीमा से बाहर भी ध्यान आकर्षण कर चुका है.

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विश्व की तीस जानी मानी हस्तियों ने संयुक्त बयान जारी कहा है कि न्याय और न्यायिक मूल्यों के लिए, न्यायपालिका और सुप्रीम कोर्ट की गरिमा बनाये रखने के लिए, हम माननीय न्यायधीशों के साथ माननीय मुख्य न्यायधीश से अनुरोध करते हैं कि वे प्रशांत भूषण के खिलाफ अवमानना की यह कार्यवाही शुरू करने के फैसले को फिर से परखें और वापस लें. जिन लोगों ने इस बयान पर हस्ताक्षर किया है, उनमें  यूनिवर्सिटी आफ कैलिफोर्निया के प्रो. जॉन  पेटेरेस, प्रो. सत्यजीत सिंह जैसे विद्वान शामिल हैं. रूल आफ लॉ को पूरी तत्परता से बनाए रखने की अपील भी इस पत्र में की गयी है.

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एक अन्य नोटिस में अदालत ने  प्रशांत भूषण से पूछा था कि न्यायपालिका के ख़िलाफ़ गंभीर आरोप लगाने वाले ट्वीट के लिए क्यों न उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाए. इस नोटिस का जवाब एफिडेविट कर 123 पेज में दिया गया है. प्रशांत भूषण ने संविधान, सुप्रीम कोर्ट के पहले के फैसलों और टिप्पण्यिों के साथ विश्व स्तर पर उभरी लोकतांत्रिक परंपराओं और मान्यताओं का हवाला भी दिया है. सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह पत्र एक बड़ी

बहस को जन्म दे सकता है. कि वास्तव में अवमानना और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच के अंतरसंबंध और अंतरविरोध क्या है. सुप्रीम कोर्ट यह तय करे कि अदालत के संदर्भ में एक नागरिक की प्रतिक्रिया की सीमाएं क्या हैं?  इसकी खास जरूरत है. क्योंकि नीचे की अदालतों में अक्सर अवमानना के सवाल को एक चाबुक की तरह इस्तेमाल किये जाने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं. संविधान और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व के फैंसलों को ले कर भी अलग अलग मान्यताएं हैं. और अभिव्यक्ति के अधिकार की हिफाजत का सवाल लोकतंत्र के बुनियाद में है. हाल में ही राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष के एक आवेदन पर सुप्रीम कोर्ट असहमित को लोकतंत्र का बुनियादी तत्व बता चुका है.

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