Opinion

राजद व कांग्रेस के गठबंधन में तीन वामपंथी दलों के साथ आने से बदल सकती है बिहार में चुनाव की तस्वीर

Faisal Anurag

Jharkhand Rai

बिहार चुनाव के पहले राजद व कांग्रेस गठबंधन में तीन वामपंथी दलों के साथ आने की संभावना मजबूत हो गयी है. राजद के प्रदेश अध्यक्ष के साथ सीपीआई, सीपीएम और सीपीआईएमएल के नेताओं के बीच सहमति बन गयी है. बिहार की राजनीति में पिछले तीन दशकों से वामपंथी दलों ने चुनावों में बड़ी कामयाबी हासिल नहीं की है. लेकिन गरीब गुरबों की लड़ाई में उनकी भूमिका प्रभावी है. पिछले पांच सालों में बिहार में वामपंथी दलों ने अनेक सवाल पर संघर्ष किया है.

और मेहनतकश वर्ग में उनकी पकड़ को नकारा नहीं जा जा सकता है. राजद कांग्रेस गठबंधन से जीतनराम मांझी अलग हो चुके हैं. उनका एनडीए से हाथ मिलाना लगभग तय है. चर्चा है कि वे जदयू में भी शामिल हो सकते हैं. वोट प्रभाव के नजरिए से जीतनराम मांझी की तुलना में वामपंथी दल ज्यादा महत्वपूर्ण हैं. राजद के साथ मिल कर वे लंबे समय के बाद चुनाव लड़ेंगे.

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Samford

2015 के विधानसभा चुनाव में तीन वाम दलों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था. सीपीआईएमएल (माले) ने तीन सीटों पर जीत हासिल की थी. और अन्य पांच सीटों पर प्रभावी रहे थे. लोकसभा चुनाव में राजद ने माले के लिए आरा सीट छोड़ी थी. बदले में राजद के लिए माले ने पाटलिपुत्र सीट छोड़ दिया था. माले और राजद का एक साथ आना कई मायनों में  अहम है. दोनों न केवल एक दूसरे के विरोधी रहे हैं बल्कि माले के युवा नेता चंद्रशेखर की हत्या के बाद दोनों के बीच भारी तनाव रहा है. सीपीआई और सीपीएम भी लंबे समय बाद राजद के साथ आने को तैयार हुए हैं.

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वामपंथी दलों ने गठबंधन में 50 सीटों की मांग की है. देखना होगा कि अंतिम तौर पर गठबंधन की क्या तस्वीर बनती है. राजद तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री का दावेदार पेश कर चुका है. खबरों के अनुसार वामपंथी दल इसके लिए सहमत हो चके हैं. इस कारण एक बड़ी बाधा साफ हो गयी है. तेजस्वी यादव के साथ कन्हैया कुमार के प्रचार अभियान शामिल होने पर भी दोनों दलों के बीच बातचीत हुई है. कन्हैया कुमार ने बिहार में सीएए आंदोलन के दौरान राज्य के सभी जिलों की यात्रा की थी. और बिहार में 100 से अधिक जनसभाओं में भाषण दिया था. उनकी सभाओं में भारी भीड़ उमडी थी.

युवाओं की इसमें बड़ी भागीदारी थी. कन्हैया को सुनने सभी तबकों के लोग आए. बिहार में इन सभाओं ने राजनीतिक ध्यन आकर्षित किया था. गठबंधन के लिए वे भीड़ जुटाने वाले बड़े स्टार प्रचारक साबित हो सकते हैं. पिछले लोकसभा चुनाव में बेगुसराय से वे चुनाव हार गए थे. लेकिन उनके चुनाव प्रचार ने देश भर का ध्यान आकर्षित किया था. नीतीश कुमार ने उन्हें हराने के लिए सात से अधिक बार बेगुसराय लोकसभा क्षेत्र का दौरा किया था. बिहार यात्रा के बाद उनकी खूब राजनीतिक चर्चा हुई थी. और मीडिया ने भी उसे महत्व दिया था.

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जहानाबाद, बेगुसराय, मिथिला, सिवान और चंपारण के इलाके में वामदलों प्रभावी माने जाते हैं. वामदलों का प्रभाव दलितों और अति पिछड़ों पर भी है. अनेक जनांदालनों के माध्यम से इन तबकों का विश्वास उन्हें हासिल हुआ है. यही नहीं सीएए आंदोलन के बाद तो बिहार में अल्पसंख्यक वोटों के बिखरने की संभावना कम हो गयी है. हालांकि कुछ अल्पसंख्यक नेता चुनाव के पहले जदयू में गए हैं. लेकिन इसके बावजूद जदयू इस वर्ग में कितनी साख बचा पायेगा, कहना मुश्किल है.

वामदलों के गठबंधन में आने के बाद समाज के कमजोर तबकों के वोटों के ध्रुवीकरण की संभावना मजबूत होती दिख रही है. कोविड, श्रमिक मामलों और बाढ़ के प्रबंधन में  एनडीए सरकार आम आलोचना का शिकार बनती रही है. बिहार वापस आए श्रमिकों की वापसी भी तेजी से हो रही है. इसका एक बड़ा कारण तो यही है कि बिहार सरकार उन्हें बिहार में ही रोजगार देने का विश्वास नहीं पैदा कर सकी.

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