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मुख्यमंत्री का विपक्ष पर मर्यादाहीन प्रहार उनकी और भाजपा की बौखलाहट ही जाहिर कर रहा है

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Faisal Anurag

जैसे-जैसे झारखंड विधानसभा के चुनाव का वक्त करीब आ रहा है, भारतीय जनता पार्टी की बेचैनी भी बढ़ती जा रही है. भाजपा की रणनीतिक कदमों और प्रचार के लिए जिन जुमलों का संकेत दिया जा रहा है, उसके संकेत तो यही हैं.

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यहां तक कि विधानसभा के नये भवन के उद्घाटन के अवसर पर भी यही बता सुनायी पड़ी. सरकार ने इस अवसर पर जो विज्ञापन जारी किया है, वह बताता है कि उसकी परेशानी किन समूहों को ले कर है. विपक्ष की उपेक्षा भी यही बता रही है. हालांकि लोकसभा में भारी बहुमत और वोट शेयर हासिल होने के बाद भी भाजपा आश्वसत नहीं दिख रही है.

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विज्ञापन में जल,जंगज व जमीन की आवाज विधानसभा में गूंजने की बात कही गयी है. इस मंतव्य के राजनीतिक निहितार्थ बताते हैं कि रघुवर दास सरकार खास तौर पर झारखंडी अस्मिता से जुड़े सवालों को ही फोकस करने के लिए प्रतिबिंबित दिखना चाहती है. हालांकि इस सरकार के संदर्भ में आम धारणा बिल्कुल विपरीत है. परोक्ष तरीके से भाजपा और उसकी सरकार आदिवासी सवालों की प्रवक्ता बनता हुआ दिखना चाहती है.

ताकि आदिवासी विरासत की राजनीतिक धाराओं से खुद को ज्यादा झारखंडी दिखा सके. भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक ओर सैद्धांतिक समझ के विपरीत इस तरह का कदम उठाया जाना सामान्य बात तो नहीं है. भाजपा को इस बात का अहसास है कि उसने झारखंड में एक गैर आदिवासी को मुख्यमंत्री बनाया है.

छत्तीसगढ में भाजपा ने गैर आदिवासी नेतृत्व का प्रयोग लंबे समय तक किया. बावजूद उसे आदिवासियों का स्वाभाविक सहयोगी नहीं माना गया. हालांकि छत्तीगढ में आदिवासियों की विरासत की कोई राजनीतिक पार्टी मुख्यधारा में नहीं रही है. पिछले विधानसभा चुनाव में आदिवासियों और दलितों ने जिस तरह भाजपा के खिलाफ वोट किये उससे पार्टी का आत्मविश्वास डगमागा गया है. झारखंड के राजनीतिक घटनाक्रम में भाजपा इसे ले कर कोई कोर-कसर नहीं रखना चाहती है.

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मुख्यमंत्री रघुवर दास जिस तरह संताल परगना में सक्रिय दिखते हैं, उससे भी जाहिर होता है कि भाजपा आदिवासी वोटों को लेकर चिंतित है. रघुवर दास भी प्रधानमंत्री के तर्ज पर झारखंड के विरोधी दलों पर जिस तरह का हमला कर रहे हैं, उसके भी संकेत बता रहे हैं कि वे इन दलों के उभार को ले कर चिंतित हैं. विधानसभा चुनाव ओर लोकसभा चुनाव में वोटर एक ही तरह का आचरण करेंगे या नहीं, यह तो समय बतायेगा.

लेकिन 2014 का अनुभव बताता है कि 14 में 12 सीटों पर जीत हासिल करने के बाद भी भाजपा उसी साल बाद में हूए विधानसभा चुनाव में अकेले बहुमत नहीं जुटा सकी. तब भी विपक्ष लोकसभा चुनाव में बुरी हार से उबर नहीं पाया था. पिछले पांच सालों के राज्य सरकार के दावों के बावजूद उनकी उपलब्धियों को ले कर झारखंड के विभिन्न तबकों के वोटरों में भिन्न धारणा बनी हुई है.

विरोधियों पर जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल मुख्यमंत्री कर रहे हैं वह बेहद आपत्तिजनक है. विपक्ष के संभावित गठबंधन को चोरों के एकजुट होने का प्रयास करार देते हुए वे भूल जाते हैं कि इन्हीं दलों के नेताओं को अपने पाले में लोने के लिए वे और उनकी पार्टी क्या क्या कर रहे हैं. विपक्ष के तमाम विधायकों को संदेह के दायरे में लोने का भाजपा का प्रयास बताता है कि उनकी शिकायत भ्रष्ट नेताओं से नहीं उनके विपक्ष में हाने से है. झामुमो और कांग्रेस को तोड़ने के लिए भाजपा हाड़तोड़ मेहनत कर रही है.

वह इस प्रोपगेंडे का इस्तेमाल कर रही है कि कि लोकसभा चुनाव के बाद विपक्ष के लिए चुनाव में जीत हासिल करने के अवसर कम हो गये हैं. इसके अलावे विरोधी दलों के नेताओ को पाले में लाने के लिए हर तरह का लालच दिया जा रहा है. भाजपा ने झारखंड विकास मोर्चा के छह विधायकों को तोड़कर बहुमत जुटाया था. बाबूलाल मरांडी का आरोप है कि इन विधायकों का दलबदल विभिन्न प्रलोभनों से भरा है.

रघुवर दास को बताना चाहिए कि यदि विपक्ष के सारे ही नेता चोर हैं तो उनके शासनकाल के पांच साल के बाद भी वे जेल से बाहर क्यों है. एक को छोड़ कर किसी भी नेता के खिलाफ भाजपा की सरकार ठोस कानूनी कदम भी नहीं उठा सकी है. और इन पांच सालों में तो वह एक के खिलाफ भी भ्रष्टाचार के आरोप को प्रमाणित नहीं कर सकी है.

अपने सिवा सभी को चोर और लुटेरा बताने के अभियन में मुख्यमंत्री लगे हुए हैं. उन्हें यह भी जबाव देना चाहिए कि उनकी सरकार के ही मंत्री सरयू राय की नाराजगी किन के भ्रष्टाचार को ले कर है. जाहिर है सरकार के भीतर सबकुछ पाकसाफ नहीं होने की बात कोई और नहीं उनके भीतर से ही लगा है. इसके अलावे मीडिया की अनेक रिपोर्ट बताती है कि पिछले पांच सालों में अनेक ऐसे मामले भी उभरे हैं जिन्हें घेटाला कहा गया है.

लोकतंत्र में विपक्ष की गरिमा का मानमर्दन करने की जिस रणनीति पर भाजपा चल रही है, देर-सबेर यह उसके लिए भी घातक ही साबित होगा. विधानसभा के नये भवन के उद्घाटन कार्यक्रम को एक पार्टी का कार्यक्रम बना देने का प्रयास कम से कम लोकतांत्रिक तो नहीं ही है.

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