NEWS

दिल्ली दंगों की चार्ज शीट असहमति की आवाजों को दबाने की एक और घृणित कोशिश है

  Faisal Anurag

सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जस्टिस मदन बी लोकुर ने साफ लहजों में कहा है कि लोकतांत्रिक आवाजों को दबाने के लिए देशद्रोह कानून का इस्तेमाल हो रहा है. यूएपीए के इस्तेमाल को ले कर भी इसी तरह की आवाज उठने लगी है. फरवरी की दिल्ली हिंसा को ले कर होने वाली जांच पर भी न्यायिक सेवा से जुड़े अनेक रिटायर जजों और वकीलों ने सवाल उठाये हैं.

प्रशांत भूषण ने कहा है कि उमर खालिद को एक बड़ी साजिश का शिकार बनाया गया है. यह देश की बुलंद और तार्किक आवाजों को कुचलने का प्रयास है. इस तरह की प्रतिक्रिया अनेक जानेमाने लोग दे रहे हैं. कानूनविद फैजान मुस्तफा ने कहा है कि यह साफ दिख रहा है कि नागरिकता आंदोलन का विरोध करने वालों को जेलों में बंद करने का खेल किया जा रहा है.

advt

इसे भी पढ़ें – रांची: मोरहाबादी में कोरोना पॉजिटिव के घर पर पत्थरबाजी, दी जान से मारने की धमकी

उन्होंने चार्ज शीट के हवाले से भी पुलिस की भूमिका को ले कर सवाल उठाये हैं. पुलिस की जांच प्रक्रिया और उसके इरादों पर सवाल उठने के बाद दिल्ली पुलिस ने सफाई दी है. उसने कहा है कि जांच का अधिकार पुलिस को है. वह किसी भी सवाल का जवाब देने के लिए बाध्य नहीं है. अदालत ही चार्ज शीट पर संज्ञान ले सकती है.

इस सफाई के बावजूद अनेक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए हैं. ये फरवरी माह के हैं. गिरफ्तार किये गये उमर खालिद और अन्य के भाषणों से संबंधित इन वीडियो में सुना जा सकता है कि वे किस तरह हिंसा के खिलाफ शांति के लिए बोल रहे हैं. उमर खालिद का 18 मिनट का अमरावाती का वह वीडियो भी सोशल मीडिया के अनेक प्लेटफार्म पर वाररल है, जिसके एक हिस्से के आधार पर दिल्ली पुलिस ने उमर खालिद को साजिशकर्ता बताया है.

सार्वजनिक क्षेत्र में सक्रिय अनेक व्यक्तियों ने यह भी कहा है कि केंद्र सरकार 2016 के जेएनयू विवाद के समय से ही उमर खालिद के पीछे लगी हुई है. इन सवालों से बचा नहीं जा सकता है. क्योंकि फैजान मुस्तफा के अनुसार पुलिस की जांच को निष्पक्ष दिखना चाहिए और वह नहीं दिख रही है. डॉ कफिल खान को सीसीए के तहत यूपी सराकर ने छह माह से ज्यादा बंद रखा.

adv

इसे भी पढ़ेंः  हेलो पुलिस को मिल रहा है अच्छा रेस्पॉन्स, हजारीबाग पुलिस ने निपटाये 1740 मामले

लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक कड़े फैसले में यूपी सरकार के सीसीए को अवैध बता दिया. असम में किसान नेता अखिल गोगई पर लगे यूएपीए के खिलाफ भी अदालत का रूख कड़ा है. जस्टिस लोकुर ने मुखरता के साथ सवाल उठाया है. उन्होंने कहा है कि अचानक बहुत से लोगों के खिलाफ देशद्रोह के आरोप में केस दर्ज किये गये.

एक आम नागरिक कुछ भी कहने की कोशिश करता है,  तो उस पर देशद्रोह का आरोप लगा दिया जाता है. इस साल 70 केस दर्ज हो चुके हैं. उन्होंने कहा कि यहां ऐसे लोग भी हैं जो हिंसा के बारे में बात करते हैं. लेकिन उन लोगों को कुछ नहीं होता. दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि जिन लोगों को निरोधात्मक हिरासत में रखा गया है, वे इसे चुनौती नहीं दे रहे हैं. भय से ऐसा हो सकता है. जस्टिस लोकुर ने कहा कि सरकार अभिव्यक्ति की आजादी पर रोक लगाने के लिए देशद्रोह कानून का इस्तेमाल कर रही है. लोगों की आवाज पर अंकुश लगाने का एक और तरीका है, फर्जी खबर फैलाने का आरोप लगाकर महत्वपूर्ण मुद्दे को छिपाना.

इसे भी पढ़ेंः गलत नीयत से कार्य करनेवाले राजस्व अधिकारियों के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए राज्य सरकार स्वतंत्रः केके सोन

देशद्रोह की प्रसंगिकता और उपयोग को ले कर सुप्रीम कोर्ट के ही एक अन्य जज दीपक मिश्र ने भी सवाल उठाया है. उनके विचार भी जस्टिस लोकुर से मिलते जुलते हैं. लोकतंत्र असहमति के प्रदर्शन का अधिकार है. लेकिन देश में ऐसा माहौल बना है कि असहमति प्रकट करने वाले लोगों को परेशान करने का हर मुमकिन प्रयास हो रहा है. इसमें फर्जी मामलों में फंसाने का खेल भी शामिल है. अनेक जनसंगठनों ने, जिसमें नफरत के खिलाफ बने फोरम भी शामिल है, ने दिल्ली दंगों की जांच  पर संदेह जताया है.

ट्वीटर पर मेधा पाटकर सहित अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस तरह की गिरफ्तारियों के खिलाफ बयान दिया है. नागरिकता कानून के खिलाफ हुए आंदोलन में शामिल लोगों और उनके समर्थन में उतरे बुद्धिजीवियों के खिलाफ जिस तरह की कार्रवाई की जा रही है, वह इमरजेंसी के दौर से भी ज्यादा घातक है. भारत के लोकतंत्र की बड़ी खासियतों में एक वे असहमत स्वर भी हैं जो संविधान के मूल्यों के तहत लोकतांत्रिक विरोध करते हैं. दुनिया के हर लोकतंत्र में इस तरह के स्वर सुनायी देते हैं. अमरीका, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देशों में भी सरकारों की नीतियों के खिलाफ आवाज उठे हैं.

इसे भी पढ़ें –  जानें वो चर्चित मामले जिसकी CID जांच से कई पुलिसकर्मियों की बढ़ सकती है परेशानी

advt
Advertisement

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Related Articles

Back to top button