Opinion

श्रमिकों को दोषी करार देकर केंद्र सरकार अपनी नाकामियों को छिपाने की कोशिश कर रही है  

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Faisal Anurag

जी हां, श्रमिकों ने अधीर हो गांवों की वापसी करना शुरू कर दिया. केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर का यही मानना है. तोमर के अनुसार सरकारों ने तो सारी सुविधाएं दीं. बावजूद इसके अधीरता के कारण मजदूरों ने सड़क मार्ग से चलने का निर्णय लिया. श्रमिकों को ही दोषी ठहरा कर अपनी नाकामी छुपाने में लगी केंद्र सरकार के मंत्री इसी तरह का बयान दे रहे हैं.

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बीबीसी के साथ बातचीत में उन्होंने कहा है कि लॉकडाउन के दौरान पैदल ही या साइकिलों पर अपने घरों की ओर निकलने वाले श्रमिक भाई थोड़े अधीर हो गए थे. इस बातचीत में जब उनसे पूछा गया कि क्या सरकार को इस बात का अंदाजा था कि श्रमिक लॉकडाउन को किस तरह लेंगे, तो मंत्री ने दिलचस्प जवाब दिया : सरकार को हमेशा से पता था.

और सरकार को पूरी जानकारी है कि बेहतर आर्थिक परिस्थितियों के लिए लोग एक इलाक़े से दूसरे इलाक़े मे जाते हैं. ये स्वभाविक है कि जब लॉकडाउन की स्थिति होगी तो लोग असुरक्षित महसूस करेंगे. और अपने घर जाना चाहेंगे. और ऐसा ही हुआ. मुश्किल वक़्त में सभी दिक्कतों का सामना करते हैं. लेकिन इसके बावजूद लोगों ने पूरा सहयोग किया.

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स्वास्थ्य से जुड़े और लॉकडाउन से जुड़े दिशानिर्देशों का पालन किया गया. दुर्भाग्यवश पैदल चलने या रेलवे ट्रैक पर चलने के दौरान लोगों की मौत हुई. लेकिन हमें ये भी देखना होगा कि हर व्यक्ति जल्द से जल्द घर पहुंचना चाहता था. एक ही गंतव्य स्थान के लिए ट्रेन उपलब्ध थी. लेकिन दस स्थानों को जाने वाले लोग इकट्ठा हो गए!

ऐसे में जब तक अगली ट्रेन नहीं आएगी, लोगों को इंतेज़ार करना होगा. ऐसे में कहीं न कहीं हमारे श्रमिक भाई थोड़े अधीर हो गए थे. और इसी वजह से बिना किसी का इंतेज़ार किए कुछ साइकिलों पर और कुछ पैदल ही निकल पड़े. मुश्किलें सबने उठाई हैं, उन लोगों ने भी जो अपने घरों में ही थे.

 यदि सरकार को अनुमान था कि वे घर जाने के लिए बेताब होंगे तो फिर इसका इंतजाम क्यों नहीं किया गया. सड़क और रेल की पटरियों पर 225 मजदूरों को मरने के लिए फिर क्यों छोड़ दिया गया? क्या इन मौतों की जवाबदेही केंद्र सरकार लेने को तैयार है. देखा तो यह जा रहा है कि जवाबदेही से बचने के हर उपक्रम सरकार कर रही है.

वास्तविकता तो यह है कि सरकार की गलत नीतियों के कारण ही श्रमिकों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा है. और रास्ते में मौत का शिकार होना पड़ा है. जब देश में 24 मार्च को लॉकडाउन की घोषणा हुई थी तब कोविड 19 के संक्रमण के शिकार हुए लोगों की संख्या हजार भी नहीं पहुंची थी. और मौत दो इकाई में ही थी.

बावजूद चार घंटे की नोटिस पर लॉकडाउन की घोषणा की दी गयी. असंगठित क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकों के सवालों पर विचार ही नहीं किया गया. परिणाम सामने है. केंद्र ने श्रमिक स्पेशल चलाने का फैसला भी दबाव के बाद ही लिया. उसमें भी कोई ठोस योजना नहीं दिखी.

श्रमिकों की परेशानियों के दिन अभी खत्म नहीं हुए हैं. क्योंकि उनके रोजगार का सवाल अब भी बना हुआ है. केंद्र ने इसकी पूरी जिम्मेदारी राज्यो को दे दी है. यह जानते हुए भी कि राज्यो की अपनी आर्थिक परेशानियां हैं. और वापस लौटे सभी मजदूरों का नियोजन मनरेगा में संभव नहीं हो सकेगा.

मोदी काल में नरेगा तो न्यूनतम मजूदरी गांरटी योजना भर है. वह रोजगार का विश्वास नहीं दे पाया है. जबकि मनरेगा का मूल विचार रोजगार सृजन के अवसर बनाने का था. इस दौर में यह बड़ी चुनौती है कि जो कुशल श्रमिक हैं और भारी तकलीफ उठा कर गांव आए हैं उनके लिए विशेष योजना की जरूरत है.

श्रमिकों के पुन:नियोजन के सवाल पर जिस तरह की गंभीरता और ठोस योजना की जरूरत है, उसका अभाव ही दिख रहा है. इतने बडे वर्क फोर्स के मनोविज्ञान से खिलवाड़ उचित नहीं है. जानकारों का मानना है श्रमिकों के नियोजन का कार्य आसान नहीं है. जिन मुसीबतों और तकलीफो ने इन मजदूरों के हौसले को प्रभावित किया है, उसे समझ कर ही मजदूरों के हित में कदम उठाए जाने की जरूरत है. इस समय तो यह बहस बेमानी ही है कि श्रमिक फिर काम की तलाश में जाएंगे.

तातत्कालिक जरूरत तो इस बात की है कि उन्हें बेरोजगारी के भंवर से निकाला जाये. इस समय देश 45 साल के सबसे भारी बेरोजगारी संकट से गुजर रहा है. भूख बौर गरीबी पर अध्ययन करने वाले सचिन कुमार जैन के अनुसार सीएमआईई के मुताबिक फरवरी 2020 में जो बेरोजगारी दर 7.76 थी, अप्रैल 20 में 23.52 प्रतिशत हो गई. शहरी बेरोजगारी 8.05 से बढ़कर 24.95 प्रतिशत और ग्रामीण बेरोजगारी 7.34 से बढ़कर 22.89 प्रतिशत हो गई. मई में भी इसका बढ़ना जारी है.

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के हवाले से दर्ज जानकारी के मुताबिक वर्ष 2019 में भारत में 49.43 करोड़ श्रमशील या कामकाजी लोग थे. इसका मतलब यह है कि मई 2020 की स्थिति में भारत में 11.62 करोड़ लोग बेरोजगार हैं. बेरोजगारी परिवार में खाद्य असुरक्षा की स्थिति लाती है. अतः समग्र पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करना जनकल्याणकारी राज्य की जिम्मेदारी है.

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जैन ने अपने ताजा अध्ययन में बेरोजगारी के इस दौर में बच्चों पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन किया है. उनका मानना है कि सरकार ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत दर्ज लोगों को तीन माह का अतिरिक्त अनाज दिए जाने और फिर निशुल्क अनाज दिए जाने की घोषणा की.

लेकिन 5 किलो गेहूं और चावल से कुपोषण को बढ़ने से नहीं रोका जा सकेगा. यह बात भी नजरअंदाज की गई. इन 60 दिनों में भारत में लगभग 39 लाख बच्चों का जन्म हुआ है. यानी कुल 78 लाख नागरिक जरूरतमंद रहे हैं. इस विशाल आर्थिक पैकेज में न तो 2.5 करोड़ गर्भवती-धात्री महिलाओं के लिए एक रुपये का आवंटन हुआ  न ही आंगनवाड़ी जा रहे 10 करोड़ बच्चों के लिए पोषण आहार का.

 इसलिए श्रमिकों का सवाल एकांगी नहीं है. उसमें उन पर निर्भर बच्चे,आश्रित मां बाप ओर पत्नी की भूख को खत्म करने की भी जरूरत है. केंद्र सरकार की अब तक की घोषणाओं में इस सवाल का जवाब नहीं है.

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