Opinion

कोरोना से निजात को लेकर केंद्र के दावे लचर साबित हो रहे हैं

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Faisal Anurag

सिर्फ पांच दिनों में भारत में कोरोना वायरस संक्रमितों मरीजों की संख्या एक लाख बढ़ कर छह लाख पार गयी है. इस तेज गति ने अनेक दावों को झुठला दिया है. हो सकता है कि आंकड़ों के उलटफेर से यह बता दिया जाए कि भारत में मरीजों के बढने की संख्या अब भी अन्य देशों की तुलना में धीमी है. लेकिन इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि भारत में राज्य और केंद्र सरकार के प्रबंधन के दावे बेहद लचर साबित हो रहे हैं. मई के अंत में सरकार के विशेषज्ञों का दावा था कि भारत में संक्रमितों की संख्या साढ़े पांच लाख तक सीमित रहेगी. जो विश्व की अनेक एजेंसियों के अनुमानों के विपरीत थी.

दुनिया के अनेक जानकारों ने अनुमान लगाया था कि भारत के लिए जून और जुलाई का महीना बेहद तकलीफदेह आंकड़ों का गवाह बन सकता है. लेकिन दबी जुबान से कहा जा रहा है कि भारत के लिए यह चुनौती आने वाले महीनों में कहीं ज्यादा गंभीर होने जा रही है. तेजी से अनलॉक हो रहे भारत के लिए यह एक बड़ी चुनौती है कि वह अपने नागरिकों के बचाव की रोकथाम के उपायों पर किस तरह जोर देगा. प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम दिए गए संबोधन में संकेत दिया था कि चुनौती बड़ी है.

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जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी ने बताया है कि अमेरिका में 26 लाख 58 हजार से अधिक लोग संक्रमित हुए हैं. और 1 लाख 27 हजार से अधिक लोगों की मौत हुई है. वहीं, ब्राज़ील के आंकड़ों के मुताबिक, देश में अब तक कोरोना के 14 लाख से अधिक मामले सामने आए हैं. और 60 हजार लोगों मृत्यु के शिकार हो चुके हैं. रूस संक्रमण के लिहाज से तीसरा सबसे अधिक प्रभावित देश है. रूस में संक्रमण के कुल 6 लाख 53 हजार से अधिक मामले हैं और मरने वालों की संख्या नौ हजार से अधिक है. मृतको के आंकडों के हिसाब से रूस में संक्रमितों की संख्या भारत की तुलना में कम है. भारत में छह लाख पांच हजार मामलों में 17800 लोगों की जान जा चुकी है. एक अनुमान के अनुसार इसी सप्ताह भारत में संक्रमितों की संख्या रूस से ज्यादा हो जा सकती है.

इस सवाल को दबी जुबान से ही उठाया जा रहा है कि अनलॉक के प्रबंधन की कमजोरी संक्रमण का एक बड़ा  कारण बनती जा रहा है. बारबार कहा जा रहा है कि कोविड 19 और लोगों के राजमर्रे के जीवन को साथ-साथ संचालित करना है. अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक ठप नहीं रखा जा सकता. वैसे भी दुनिया के विकास की गति के तमाम अनुमान भयावह तस्वीर दिखा रहे हैं. भारत इसमें अपवाद नहीं है. ऐसे हालात में कोविड स्वास्थ्य प्रबंधन की सरकारी कुशलता ही लोगों का भरोसा बनाए रख सकती है.

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दिल्ली, मुंबई और चेन्न्ई वे बड़े भारतीय केंद्र हैं जो भारत की अर्थव्यवस्था और राजनीति की दिशा तय करते हैं. कोविड 19 की सबसे तेज गिरफ्त भी इन तीनों ही महत्वपूर्ण महानगरों की गति को प्रभावित कर रही है. बाजार तो खोल दिए गए हैं. लेकिन उनमें ग्राहकों की वह भीड़ नहीं है जो कोरोना प्रभाव के पहले रहती थी. इसके संदेश को समझने की जरूरत है. लोगों के क्रयशक्ति से इसका रिश्ता जुड़ा है. और मार्च के बाद से इस में भारी कमी आयी है.

श्रमिकों और किसानों के बाद अब मध्यवर्ग भी तेजी से क्रयशक्ति की क्षमता खो रहा है. कोविड 19 प्रबंधन का इससे सीधा संबंध भी है. ऐसा महसूस हो रहा है कि कोरोना वायरस के खतरों की भयावहता को ले कर ढिलाई बरती जा रही है. स्वास्थ्यकर्मियों की शिकायतों में इसे समझा जा सकता है. जो वे व्यक्तिगत बातचीत में ही बता रहे हैं. जिन स्वास्थ्यकर्मियों ने सवाल उठाए उनके साथ हुए दमनात्मक कार्रवाई से अलग तरह का ही मनोविज्ञान बन गया है.

कई जानकार महसूस कर रहे हैं कि सरकार की प्राथमिकता बदल रही है. और इसका खराब असर स्वास्थ्य सेवाओं पर पड रहा है. वे कहानियां तो मीडिया से गायब ही हैं जो एक संक्रमित और उसके परिवार को झेलनी पड़ रही है. तीन माहसे ज्यादा गुजर जाने के बाद भी भारत की स्वास्थ्य सेवाओं का स्तर नहीं बढ़ाया जा सका है. सरकार की हर सप्ताह नई हिदायतों के बाद तो भ्रम का माहौल भी है. नोटबंदी के बाद भी हर दो चार दिन पर सरकारी नया गाइडलाइन जारी कर ऊहापोह की हालात पैदा किए गये थे. एक जानकार के अनुसार कोविड 19 के संदर्भ में भी इस तरह के हालात बन रहे हैं.

इसका एक बड़ा कारण तो यह बताया जा रहा है कि  सरकार ने विशेषज्ञों की जगह ब्यूरोक्रेटों को ही निर्णय लेने की जिम्मेदारी दे रखी है. यह भी आरोप है कि कुछ ऐसे जानकार भी इसमें शामिल हैं जिनकी योग्यता को ले कर ही संदेह है. इस संदर्भ में तमाम भ्रम का  निवारण सरकार ही कर सकती है. ताकि उन लोगों की तकलीफो को कम किया जा सके जो संक्रमण के शिकार हो गए हैं. और उन्हें अस्पतालों में दाखिल होने के लिए भी संघर्ष करना पड़ा है. इसे दरकिनार नहीं किया जाना चाहिए. क्योंकि आने वाले समय में स्थिति और भी गंभीर होने का अंदेशा है.

अमेरिका के अखबार न्यूयार्क टाइम्स ने अमेरिका के संदर्भ में कड़ी टिप्पणी करते हुए लिखा है ‘अमेरिका ने आधुनिक दुनिया की सर्वाधिक महंगी, सबसे नकारा स्वास्थ्य व्यवस्था बनाई है. इस नकामी की सर्वाधिक कीमत  असहाय अमेरिकी अपनी जानें देकर चुका रहे हैं. इसका यहां उल्लेख करने का मतलब है कि इसे भारत के संदर्भ में भी समझा जाना चाहिए. जहां के निजी अस्पतालों में महंगा इलाज हो रहा है. और कोरोना मरीज भी इसमें अपवाद नहीं है. सरकार अस्पतालों के तंत्र को लेकर तो कई बार बातें की जा चुकी है.

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