Opinion

प्रवासी मजदूरों का मामला :  जस्टिस मदन लोकुर और जस्टिस एपी शाह के बयान पर काटजू को क्यों है इतना कड़ा एतराज

लॉकडाउन के बाद से ही देश में मजदूरों और खास कर प्रवासी मजदूरों की जो हालत हुई है, वो रोज ही मीडिया की सुर्खियां बन रही है. इसे इस रूप में भी देखा जा रहा है कि भारत मजदूरों के संदर्भ में गुलामी और गिरमिटिया जैसी स्थिति की ओर बढ़ रहा है. लॉकडाउन समाप्त होने के बाद भी कारखानों में जिस तरह से मजदूरों के हितों पर हमला होने वाला है, जिसकी पृष्ठभूमि तैयार कर ली गयी है, उसकी सभी ओर आलोचना हो रही है. काम के घंटे को 8 से बढ़ाकर 12 घंटे किया जाना और मजदूरों की सुरक्षा और उनके भविष्य़ को लेकर कारखाना प्रबंधन को उनकी जिम्मेदारी से जिस तरह से क्रमशः मुक्त किया जा रहा है, वह मजदूरों की परेशानियों में अकल्पनीय वृद्धि करने वाला है. इसी संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस मदन लोकुर और जस्टिस एपी शाह का बयान आया है. इन दोनों के बयान पर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मार्कंडेय काटजू ने बड़ी ही सख्त और कर्कश आवाज उठायी है. जिसकी इन दिनों चर्चा हो रही है. आइये जानते हैं, उन्होंने क्या कहा है.

मार्कंडेय काटजू

मार्कंडेय काटजू ने ब्लाग लिखकर अपने उद्गार व्यक्त किये हैं. वे लिखते हैं, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मजदूरों के जीवन के मौलिक अधिकार को जोखिम में डाल दिया गया है. लेकिन जब जस्टिस लोकुर कहते हैं कि “सुप्रीम कोर्ट अपनी संवैधानिक भूमिका को पूरा नहीं कर रहा है” और “उसने प्रवासी मजदूरों और कामगारों को निराश के गर्त में ढकेल दिया है है”, तो मैं (मार्कंडेय काटजू) यह पूछना चाहूंगा कि सुप्रीम कोर्ट इस हालत में क्या कर सकता है?

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मार्कंडेय काटजू ने लिखा है कि- मैंने प्रवासी मजदूरों से संबंधित जनहित याचिका में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बारे में जस्टिस मदन लोकुर, पूर्व न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट और जस्टिस एपी शाह, पूर्व चीफ जस्टिस, दिल्ली और मद्रास उच्च न्यायालय के करण थापर के साथ इंटरव्यू देखा है. इन दोनों जजों के विचारों से पूरे सम्मान के साथ असहमत होते हुए मैं यह कहना चाहता हूं कि वे मजदूरों के बारे में बेकार और बेतुकी बातें कर रहे हैं. इसलिए मैं इस मामले में यहां अपना नजरिया या दृष्टिकोण दे रहा हूं.  सबसे पहली बात, मैं आपको यह बता दूं कि मैं भी उन लाखों प्रवासियों और मजदूरों की दुर्दशा से बुरी तरह व्यथित हूं, जिन्होंने देशव्यापी लॉकडाउन के कारण अपनी आजीविका से हाथ धो दिया है. और जो अपने परिवारों के साथ आज भुखमरी की कगार पर आकर खड़े हो गये हैं.

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दूसरा, तथ्य यह है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मजदूरों के जीवन के मौलिक अधिकार को खतरे में डाल दिया गया है. लेकिन इसे भूलकर जब जस्टिस लोकुर कहते हैं कि “सुप्रीम कोर्ट अपनी संवैधानिक भूमिका को पूरा नहीं कर रहा है” और “उसने प्रवासी मजदूरों और कामगारों को निराश कर दिया है”, तो मैं उनसे यह पूछना चाहूंगा कि सुप्रीम कोर्ट इस हालत में क्या कर सकता है?

इस बात को हमेशा ध्यान में रखा जाना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट लोगों की सभी परेशानियों का समाधान नहीं कर सकता है. इसमें कोई शक नहीं है, संविधान के भाग तीन में जनता के मौलिक अधिकारों का जिक्र है, लेकिन निर्धनता सभी अधिकारों का विनाश करने वाली होती है, और हमारी जनसंख्या का एक बड़ा प्रतिशत बेहद निर्धन है. इसलिए इस लॉकडाउन से पहले भी, हमारी जनता का एक बड़ा भाग मौलिक अधिकारों से वंचित था. देशव्यापी लॉकडाउन ने केवल और केवल इस स्थिति को और अधिक बिगाड़ दिया है.

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काटजू आगे कहते हैं, न्यायमूर्ति लोकुर का कहना है कि “अगर किसी व्यक्ति का कोई मौलिक अधिकार है, तो उसे जरूर लागू किया जाना चाहिए”. यह कहने में बहुत अच्छा लगता है, लेकिन वास्तव में, शायद ही प्रैक्टिकल या यथार्थवादी हैं. भारत की सामाजिक-आर्थिक समस्याएं इतनी विशाल हैं कि इस व्यवस्था के भीतर उनका समाधान नहीं किया जा सकता है. उदाहरण के लिए, संविधान के अनुच्छेद 21 में जीवन के अधिकार में ही परोक्षरूप से रोजगार का अधिकार भी निहित है (बिना रोजगार के कैसे किसी को भोजन खरीदने के लिए पैसा मिल सकता है), लेकिन आज देखिये, पूरे देश में रिकॉर्ड बेरोजगारी है. (एक अध्ययन है कि 1.2 करोड़ युवा भारत में हर वर्ष नौकरी के बाजार में दाखिल हो रहे हैं, लेकिन नौकरियां कम होती जा रही हैं).

काटजू जीवन जीने के अधिकार की व्याख्या इस प्रकार करते हैं, संविधान में मौलिक अधिकारों में से कई केवल कागज पर, और सैद्धांतिक रूप में उपस्थित हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट उन्हें व्यवहारिक तौर पर लागू नहीं कर सकता. ऐसा करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के पास कोई अलादीन का चिराग नहीं है. क्या सुप्रीम कोर्ट देश के सभी नागरिकों को रोजगार दे सकता है? सुप्रीम कोर्ट सरकार को ऐसा करने के लिए निर्देश दे सकती है, लेकिन यह निर्देश लागू नहीं किया जा सकता है.

इस विषय में न्यायमूर्ति एपी शाह ने कहा कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट से निराशा हुई है, क्योंकि “सुप्रीम कोर्ट ने प्रासंगिक प्रश्न नहीं पूछे है, और मौलिक अधिकारों के मुद्दे को छोड़ दिया है. हमारी सर्वोच्च अदालत इस मुद्दे को हल करने में सक्षम थी.” उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को सरकार को दैनिक वेतनभोगियों और प्रवासी मजदूरों को लॉकडाउन की अवधि के लिए न्यूनतम मजदूरी का भुगतान करने और उनके और उनके परिवारों के स्वास्थ्य और कल्याण के लिए आदेश लागू करना चाहिये था. यह एक पूरी तरह से यथार्थ से परे का विचार है.

सबसे पहले, हम नहीं जानते कि इस तरह के आदेश के पालन के लिए कितनी राशि चाहिये. दूसरे, इस योजना के लिए आवंटित अधिकांश राशि जरूरतमंदों तक नहीं पहुंचेगी. इसे काफी हद तक भ्रष्ट नौकरशाही द्वारा निगल लिया जाएगा. जिसे भारत की वास्तविकताओं का थोड़ा भी ज्ञान है वो यह बात जानता है. (पूर्व प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि सरकार की योजना में आवंटित एक रुपये में से केवल 10 पैसा ही गरीबों तक पहुंच पाता है).

इसलिए मेरी राय में सुप्रीम कोर्ट की ओर से पारित किया जा सकने वाला एकमात्र सही आदेश यह था कि सरकार इस मामले में मजदूरों और जरूरतमंदों की मदद करे. और सुप्रीम कोर्ट ने ये किया भी है.

इस विष्य में मैंने कुछ दिन पहले पत्रकार करण थापर से फोन पर बात की थी. वह मेरे दृष्टिकोण से असहमत थे.  लेकन उनका हृदय गरीबों और पीड़ितों के लिए खूब धड़क रहा था. मुझे नहीं लगता कि मेरे पास एक पत्थर दिल है, लेकिन मुझे यह जरूर लगता है कि जस्टिस लोकुर, जस्टिस शाह और साथ में करण थापर भी मजदूरों के विषय में  निरर्थक बातें कर रहे हैं.

(लेखक मार्कंडेय काटजू सूप्रीम कोर्ट के पूर्व जज रह चुके हैं और यहां व्यक्त विचार उनके निजी हैं, जिसे ब्लाग से लिया गया है) 

 

 

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