JharkhandRanchi

टीएसपी की राशि को गलत ढंग से खर्च किया जाना ही आदिवासी समुदाय के समग्र विकास में सबसे बड़ी बाधा

  • आदिवासी अधिकारों के लिए मौजूद संवैधानिक प्रवधानों का दुरुपयोग बनी बदहाली का कारण

Ranchi: देश एवं राज्य में भी विभिन्न सामाजिक संगठनों, राजनीतिक दलों एवं राज्य सरकार के द्वारा विश्व आदिवासी दिवस मनाया जा रहा है. सभी आदिवासी समुदाय के पिछड़े होने की बात भी कहते हैं. बुनियादी सुविधाओं के अभाव के साथ-साथ रोजगार के लिए पलायन, मानव व्यापार, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल जैसे सरोकारों का भी अभाव आदिवासी इलाकों में आम है.

इन सवालों पर आदिवासी समुदाय सरकार की नीतियों पर भी सवाल खड़े करते हैं. वे आदिवासी समुदाय के समग्र विकास में सबसे बड़ी बाधा टीएसपी की राशि गलत ढंग से खर्च किये जाने को मानते हैं. वहीं संवैधानिक प्रवाधानों का दुरुपयोग भी बदहाली का कारण माना जाता है.

जबकि 1976 से ही आदिवासी समुदाय के समग्र विकास कि लिए जनजातीय उप योजना लागू की गयी है. योजना आयोग के भंग होने और नीति आयोग के बनने के बाद अब यह शेड्यूल्ड ट्राइब कम्पोनेंट के नाम से जाना जाता है.

advt

इसे भी पढ़ें – अलग सरना धर्म कोड के लिए सदन से प्रस्ताव पारित कर केंद्र को भेजा जायेगा : डॉ रामेश्वर उरांव

आदिवासी समुदाय के विकास को लेकर क्या कहते हैं जानकार

आदिवासी बुद्धिजीवी मंच के प्रेमचंद मुर्मू कहते हैं, “राज्य में ट्राइबल सब प्लान के पैसे का गलत ढंग से उपयोग किया जा रहा है. संवैधानिक प्रावधान के तहत टीएसपी में राशि का प्रावधान किया गया है लेकिन इस राशि से क्षेत्र विशेष का विकास किया जा रहा है जबकि इस राशि को पूरी तरह आदिवासी समुदाय पर फोकस किया जाना चाहिए. उनका समग्र विकास किया जाना चाहिए. इस पर सरकार को कानून बनाने चाहिए, तब जा कर राज्य के आदिवासियों के विकास के नये आयाम देखने को मिलेंगे.”

सामाजिक कार्यकर्ता सुनील मिंज कहते हैं, “योजना आयोग ने यह स्पष्ट रूप से बताया है कि ट्राइबल सब प्लान के तहत आवंटित पैसे का इस्तेमाल आदिवासियों (अनुसूचित जनजाति) के समग्र विकास के लिए करना है. इस पैसे से ऐसी योजनाएं बनायी जानी चाहिए जिनसे आदिवासी समुदाय को सीधे तौर पर फायदा हो. तब ही सूबे के आदिवासी इलाकों में समग्र विकास किया जा सकता है. इसके लिए राज्य सरकार को कानून बनाना चाहिए.”

सामाजिक कार्यकर्ता जेम्स हेरेंज कहते हैं, “झारखण्ड राज्य पर गौर करें तो अविभाजित बिहार में 1931 ई में आदिवासी जनसंख्या 38.06 प्रतिशत थी. झारखण्ड अलग राज्य बनने के बाद 2001 में यह घटकर 26.30 प्रतिशत हुई और 2011 में हुई जनगणना के अनुसार यह संख्या और भी कम होकर 26.02 प्रतिशत रह गयी है. जबकि इसी समय और काल के दौरान भारत में आदिवासी समुदाय की जनसंख्या 1961 में 6.90 प्रतिशत से बढ़कर 2011 में 8.60 प्रतिशत हुई है.

adv

झारखण्ड राज्य के लिए यह एक बड़ा सवाल है.  आखिर यह नकारात्मक प्रभाव क्यों पड़ रहा है? स्थानीय आदिवासियों को विकास के नाम पर विस्थापन और पलायन का शिकार होना पड़ रहा है. पांचवी अनुसूची में निहित प्रावधानों का जमकर दुरुपयोग किया गया. सीएनटी कानून, एसपीटी कानून, विल्किंसन रूल, पेसा कानून तथा भूमि अधिग्रहण जैसे महत्वपूर्ण कानूनों में असंवैधानिक तरीके से संशोधन कर कॉरपोरेट व पूंजीपति घरानों को सरकारें बाहें फैला कर स्वागत करती रहीं. साथ ही टीएसपी को लेकर कोई कानून नही होने की वजह से  आदिवासी समुदाय का विकास भी दूसरे समुदाय के मुकाबले कम है.

इसे भी पढ़ें –सच्चा-झूठा, कच्चा-पक्का हिंदू कुछ नहीं होता, फर्क है सिर्फ “दिखावा करना या ना करना”

आदिवासी समुदाय के समग्र विकास और टीएसपी के सवाल पर क्या कहते हैं रणेंद्र कुमार

डॉ रामदयाल मुंडा जनजातीय कल्याण शोध संस्थान के निदेशक रणेंद्र कुमार आदिवासी समुदाय के समग्र विकास और टीएसपी के सवाल पर कहते हैं, “हमारे राज्य में आदिवासी उप योजनाओं से विकास के कार्य के लिए एरिया बेस कर योजना चल रही है. यह एक नीति निर्धारण का सवाल है. टीएसपी को लेकर संस्थान की ओर से 2019 में दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया था जिसमें दूसरे राज्यों में टीएसपी को लेकर बनी नीतियों पर विमर्श किया गया. उस आधार पर सस्थान की ओर से एक एक्ट का प्रारूप तैयार किया जा रहा है. जबकि राज्य की कई योजनाएं ऐसी भी हैं जो सिर्फ आदिवासी समुदाय के विकास के लिए चल रही हैं. जिस पर 14 सौ करोड़ खर्च किये जा रहे हैं.

आदिवासी इलाकों के विकास के लिए योजना आयोग ने शुरू किया था ट्राइबल सब प्लान

ट्राइबल सब प्लान योजना आयोग द्वारा सुझायी और भारत सरकार द्वारा अपनायी गयी एक योजना है. यह यह एक ऐसा फंड है, जिसका इस्तेमाल आदिवासी क्षेत्रों और आदिवासी समुदायों के लिए किया जाना था. 1972 में सरकार द्वारा गठित एक विशेषज्ञ समिति द्वारा अनुसूचित जनजातियों के विकास के लिए एक व्यापक नीति का निर्माण किया गया था. इस नीति के तहत 1976 में (5वीं पंचवर्षीय योजना), जनजातीय उप-योजना (Tribal Sub Plan – TSP) का सुझाव दिया गया था. ट्राइबल सब प्लान यानी टीएसपी को अब (योजना आयोग के भंग होने और नीति आयोग के बनने के बाद) शेड्यूल्ड ट्राइब कम्पोनेंट के नाम से जाना जाता है.

ट्राइबल सब प्लान के उद्देश्य

  • जनजातीय समुदाय की शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच में वृद्धि करके मानव संसाधन विकास करना.
  • जनजातीय क्षेत्रों में आवास सहित आधारभूत सुविधाएं प्रदान कर जीवन की गुणवत्ता में वृद्धि करना.
  • गरीबी और बेरोजगारी में पर्याप्त रूप से कमी लाना, उत्पादक परिसम्पत्तियों का सृजन और आय अर्जित करने के लिए अवसर प्रदान करना.
  • अवसरों का लाभ उठाने की क्षमता में, अधिकारों एवं सरकार समर्थित अनुदानों की प्राप्ति तथा अन्य क्षेत्रों के समान बेहतर सुविधाओं में वृद्धि के साथ-साथ शोषण और उत्पीड़न के विरुद्ध संरक्षण प्रदान करना.

2011-12 से 2019-20 के दौरान आदिवासी उप-योजना (एससीए से टीएसएस) के लिए विशेष केंद्रीय सहायता के तहत राज्यों को जारी किये गये फंड

वर्ष जारी किये गये फंड (लाख में)
2011-12 10704.00
2012-13 11413.25
2013-14 12187.00
2014-15 9571.11
2015-16 10000.00
2016-17 9820.75
2017-18 11372.49
2018-19 8564.52
2019-20 2674.22

राज्य सरकार द्वारा टीएसपी आवंटन और व्यय का विवरण

{ट्राइबल सब प्लान (2017-18) से (2019-20) तक की योजना}

वर्ष राज्य की योजना ट्राइबल सब प्लान
2017-18 43620.63 करोड़ 17398.07 करोड़
2018-19 44776.72 करोड़ 19502.54 करोड़
2019-20 44192.14 करोड़ 19176.82 करोड़

इसे भी पढ़ें –स्वैच्छिक प्लाज्मा डोनेशन के लिए नहीं मिले डोनर, अब डोनेशन के लिए 2500 रुपये तक देगा रिम्स

advt
Advertisement

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Related Articles

Back to top button