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पलामू: आदिवासियों का महाकुंभ कहे जानेवाले दुबियाखांड़ मेला की शुरुआत

 Palamu: पलामू के प्रतापी चेरो आदिवासी राजा मेदिनी राय की स्मृति में करीब तीन दशक से लग रहे ऐतिहासिक दुबियाखांड़ मेला की शुरूआत सोमवार को हो गयी. दो दिवसीय मेला 12 फरवरी तक चलेगा. राज्य के ग्रामीण विकास मंत्री नीलकंड सिंह मुंडा ने राजा मेदिनी राय की प्रतिमा पर माल्यापर्ण कर और दीप जलाकर मेला का उद्घाटन किया. मौके पर परिसंपतियों का वितरण किया गया और 51 जोड़ों की शादी करायी गयी.

आदिवासियों की पहचान मेला-संस्कृति, बचाने की जरूरत: नीलकंठ

आदिवासियों की पहचान के साथ-साथ उनकी संस्कृति को भी जिन्दा रखने की जरूरत है. मौके पर ग्रामीण विकास मंत्री ने कहा कि झारखंड आदिवासियों की संघर्ष की भूमि रही है. राजा मेदिनीराय के संघर्ष को आज याद किया जाता है. राजा मेदिनी राय प्रतापी राजा हुआ करते थे. इनके राज्य में दूध-दही की नदी बहती थी. आज हम सब को उनके बताये रास्ते पर चलकर उनके सपने को साकार करने की जरूरत है. वे वेश बदलकर अपनी प्रजा का हाल जानने के लिए नगरों का भ्रमण किया करते थे. कमी देखकर उसमें सुधार लाते थे. यही कारण है कि उनके जीवन पर एक कहावत आज पूरे पलामू जिले में प्रचलित है-‘धन्य-धन्य राजा मेदनिया, घर-घर बाजे मथनिया’. आज मेदिनी राय हमारे बीच नहीं है, बावजूद उनकी प्रसांगिकता बढ़ गयी है.

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मेला आदिवासियों की संस्कृति को दर्शाता है ः प्रभा देवी 

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जिला परिषद अध्यक्ष प्रभा देवी ने कहा कि आदिवासी महाकुंभ सह विकास मेला का आयोजन पिछले कई वर्षों से होते आ रहा है. यह मेला आदिवासियों की संस्कृति को दर्शाता है. उन्होंने कहा कि इस मेला में सरकार द्वारा कई विभाग के स्टॉल लगाये गये हैं. वहां लोगों को कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, आजीविका मिशन, स्वस्थ भारत मिशन, बैंक सहित कई विभागों के स्टॉल लगाये गये हैं. जहां कई महत्वपूर्ण जानकारियां उपलब्ध करायी जा रही हैं. मौके पर क्षेत्रीय विधायक आलोक चैरसिया ने भी मेला के इतिहास और सरकार की उपलब्धियों से लोगों को अवगत कराया.

राजा मेदिनीराय के बताये रास्ते पर चलकर ही पलामू का विकास संभव

मौके पर जिप उपाध्यक्ष संजय सिंह ने कहा कि राजा मेदिनीराय के बताये रास्ते पर चलकर ही पलामू का विकास संभव है. उन्होंने कहा कि यह मेला आदिवासी, संस्कृति को बचाये रखने में कारगर साबित होगा.

मौके पर ये लोग थे उपस्थित

मौके पर पलामू जिला परिषद की अध्यक्ष प्रभा देवी, क्षेत्रीय विधायक आलोक चैरसिया, उपायुक्त डा. शांतनु कुमार अग्रहरि, जिला परिषद उपाध्यक्ष संजय सिंह, पूर्व जिला परिषद उपाध्यक्ष विनोद सिंह, जिला पार्षद सदस्य लवली गुप्ता, पुलिस उपाधीक्षक प्रेमनाथ, नगर निगम के उपमहापौर मंगल सिंह, उपविकास आयुक्त बिन्दुमाधव सिंह, सदर एसडीओ नंदकिशोर गुप्ता, विजय ओझा, भाजपा जिलाध्यक्ष नरेन्द्र पांडेय उपस्थित थे.

औपचारिकता मात्र रह गया है अब मेला   

राज्य सरकार प्रदेश की कला-संस्कृति और परंपराओं का अक्षुण्ण बनाये रखने का दंभ तो भरती है, लेकिन बड़ा सवाल यह कि क्या इसपर अमल भी होता है? दुबियाखांड़ मेले के सिमटते दायरे को देखकर तो ऐसा बिल्कुल नहीं लगता कि ऐतिहासिक विरासतों को संजोये रखने में शासन-प्रशासन की कोई दिलचस्पी है. जिन लोगों ने इस मेले का आरंभिक दौर देखा है, उन्हें तो अब यह मेला औपचारिकता मात्र ही प्रतीत होने लगा है. एक समय था जब इस मेले की भव्यता के चर्चे न केवल अपने राज्य में बल्कि दूसरे राज्यों में भी सुनाई पड़ते थे.  लेकिन अब मेले का वह शोर स्मृति-शेष बनकर रह गया है.

कब शुरू हुआ था दुबियाखाड़ मेला

अगर मेले के इतिहास में जायें तो अविभाजित बिहार में राजस्व मंत्री रहे इंदर सिंह नामधारी ने कुंभ मेले की तर्ज पर पलामू जिला मुख्यालय डालटनगंज से करीब 10 किलोमीटर दूर दुबियाखांड़ में आदिवासी कुंभ मेले की अपनी परिकल्पना को साकार किया था. इस कड़ी में सबसे पहले 1994 में श्री नामधारी ने पलामू के बेहद लोकप्रिय राजा मेदिनीराय (इन्हीं के नाम पर डालटनगंज का नाम मेदिनीनगर पड़ा) की प्रतिमा दुबियाखांड़ में स्थापित करायी और इस स्थल पर हर वर्ष आदिवासी कुंभ मेले (राजस्व मेला) के आयोजन की घोषणा की. उसके बाद हर वर्ष राजा मेदिनीराय की स्मृति में 11-12 फरवरी को वृहद मेले का आयोजन होने लगा.

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