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गीता का संतुलित मार्ग : ध्यान और सम्यक् कर्म

योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ इण्डिया के संन्यासी द्वारा आध्यात्मिक व्याख्यान

Ranchi: 24 सितंबर, 2022: “ईश्वर की ओर वापसी के पथ पर व्यक्ति जहाँ कहीं भी हो, गीता यात्रा के उस खण्ड पर अपना प्रकाश डालेगी,” योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया (वाईएसएस) के वरिष्ठ संन्यासी स्वामी ईश्वरानंद गिरि ने 24 सितंबर, 2022 को वाईएसएस के राँची आश्रम में भगवद्गीता पर सत्संग में 500 से अधिक लोगों को संबोधित करते हुए कहा।

योगदा के ऑनलाइन ध्यान केंद्र के माध्यम से लाइवस्ट्रीम किए गये इस सत्संग में करीब 3000 अन्य लोगों ने भाग लिया। स्वामी ईश्वरानन्द गिरि ने भगवद्गीता पर श्री श्री परमहंस योगानन्द द्वारा की गई एक विशिष्ट व्याख्या “ईश्वर-अर्जुन संवाद” (God Talks With Arjuna) की पुस्तक का परिचय दिया। योगानन्दजी विश्व में सुप्रसिद्ध आध्यात्मिक गौरवग्रंथ “योगी कथामृत” (Autobiography of a Yogi) के लेखक तथा वाईएसएस के संस्थापक एवं गुरु हैं।

इस अवसर पर स्वामीजी ने योगानन्दजी की पुस्तक “ईश्वर-अर्जुन संवाद” (God Talks With Arjuna) के ईबुक प्रारूप का भी विमोचन किया। स्वामी ईश्वरानंदजी ने कहा, “भगवद्गीता पूर्व और पश्चिम दोनों ही के सत्यानवेशियों द्वारा पूजित है, फिर भी इसका गहन अर्थ, उपमाओं से आच्छादित, अस्पष्ट बना हुआ है,” उन्होंने आगे बताया, “ईश्वर-अर्जुन संवाद में योगानन्दजी ने इसका जो अनुवाद और व्याख्या प्रस्तुत की है, वह अद्वितीय रूप से विस्तृत एवं कल्पनातीत है।”

“ब्रह्माण्ड का सम्पूर्ण ज्ञान गीता में समाया है। अत्यंत गूढ़ तथा सान्त्वनादायक भाषा में व्यक्त…. गीता को मानवीय प्रयास और आध्यात्मिक संघर्ष के सभी स्तरों पर समझा एवं प्रयुक्त किया गया है…”

भिन्न स्वभावों और आवश्यकताओं वाले मनुष्यों की एक विस्तृत श्रेणी को आश्रय देती है,” योगानन्दजी के वचन साझा करते हुए समझाया कि भगवद्गीता आध्यात्मिक युद्ध और दैनिक जीवन में विजय प्राप्त करने में हमारा मार्गदर्शन किस प्रकार करती है।

अपने व्याख्यान में, स्वामी ईश्वरानन्दजी ने परमहंसजी की टिप्पणी के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने उपाख्यानों के माध्यम से समझाया कि कैसे हमारे अन्दर कौरवों (बुरी प्रवृत्तियों) की उपस्थिति हमारी आध्यात्मिक प्रगति में बाधा डालती है, और हमारे अन्दर पांडवों (अच्छी प्रवृत्तियों) का पोषण करने से अंततः कुरुक्षेत्र की आंतरिक लड़ाई में उन कौरवों की हार कैसे होगी, और इस प्रकार यह आत्म-साक्षात्कार के अंतिम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हमें अग्रसर करेगा।

अंत में, स्वामीजी ने योगानन्दजी द्वारा अपनी व्याख्या /टिप्पणी में एक सच्चे भक्त के लिए दिये आश्वासन को दोहराया: ” ध्यान योग के दृढ़ अभ्यास द्वारा, अपने सभी कार्यों को ईश्वर को प्रेमपूर्ण समर्पण द्वारा, इच्छाओं और आसक्तियों का त्याग करके प्रायश्चित और उचित संकल्प द्वारा, न केवल सदाचारी/धार्मिक व्यक्ति ही मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं, अपितु अति दुष्ट व्यक्ति भी पापों को शीघ्र दूर कर पुण्यवान बन सकते हैं, अज्ञानता को दूर कर ज्ञान का कल्याणकारी प्रकाश प्राप्त कर सकते हैं।

‘ईश्वर-अर्जुन संवाद’ की शास्त्रीय व्याख्या के बारे में :
आध्यात्मिक गौरव ग्रंथ ‘योगी कथामृत ’ के लेखक परमहंस योगानन्दजी ने भगवद्गीता की व्याख्या दिव्य अंतर्दृष्टि से की है। अपनी टीका में इसकी मनोवैज्ञानिक, आध्यात्मिक और अधिभौतिक गहनता की मीमांसा करते हुए — जिसमें दैनिक आचार-विचार के सूक्ष्म कारणों से लेकर ब्रह्मांडीय व्यवस्था के विराट स्वरूप तक के विषय सम्मिलित हैं — योगानन्दजी आत्मा की सम्पूर्ण ज्ञानोदय तक की यात्रा का विशद वृत्तान्त प्रस्तुत करते हैं।

गीता में वर्णित ध्यान और उचित कर्म के संतुलित पथ को स्पष्ट रूप से समझाते हुए परमहंसजी दर्शाते हैं कि हम अपने लिए आध्यात्मिक संपूर्णता, शांति, सादगी तथा आनंद से भरा जीवन कैसे निर्मित कर सकते हैं। अपनी जागृत अंतरात्मा के माध्यम से हम जीवन पथ के दोराहों पर, सही मार्ग चुनना जान जाते हैं; अपनी पीछे खींचने वाली कमियों और आगे बढ़ाने वाले सकारात्मक गुणों की पहचान कर पाते हैं; और रास्ते में आने वाले संकटों को पहचानना व उनसे बचना सीख जाते हैं।

 

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