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नागरिक एकजुटता से ही आतंकवाद का मुकाबला किया जा सकता है

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Faisal Anurag

अमेरिका में विश्व व्यापार केंद्र पर हमले के बाद पूरे देश ने अपने तमाम नागरिकों की एकजुटता के माध्यम से आतंकवाद के खिलाफ आवाज बुलंद किया था. अमेरिकी जीवन को एक दिन में ही सामान्य बना लिया गया था. यह दुनिया के उन तमाम देशों के लिए एक उदाहरण है, किस तरह आतंकवाद का मुकाबला किया जाना चाहिए. अमरीका ने अपने नागरिकों के मानवाधिकार और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति पर कोई रोक नहीं लगाया और उसके नागरिकों ने यह अहसास नहीं होने दिया कि मजहब या रंग के कारण कोई भेदभाव है. अमेरिका ने आतंकवादियों की खोज की और उन्हें दंडित भी किया. लेकिन अमरीकी सरकार ने नागरिक समाज पर कोई दखल नहीं दिया. तमाम राजनीतिक दलों ने भी यही संदेश दिया.

पुलवामा की आतंकवादी घटना के बाद भारत के तमाम विपक्षी दलों ने भी संयम और परिपक्वता का परिचय दिया और अपने तमाम राजनीतिक कार्यक्रमों पर भी विराम लगा दिया. इससे यह संदेश उभरकर सामने आया कि आतंकवाद और इसकी हिंसा के खिलाफ भारत में आम सहमति है. लेकिन इस आम सहमति के बीच देश में कुछ ऐसी घटनायें हुयी हैं, जो भारतीय नागरिकों के बीच अनेक संशय पैदा करता है.

एक खास तरह की आक्रमकता के कारण यह भी दिख रहा है कि उसको एक खास राजनीतिक दिशा देने में कुछ संगठन परहेज नहीं कर रहे हैं. इसके साथ ही सरकारों के कार्यक्रम तो हुए हैं और हो भी रहे हैं. लेकिन इससे जुदा होने वाले कार्यक्रमों में न केवल बाधा डाली गयी, बल्कि आक्रमकता  दिखाकर राजनीतिक मंशा का इजहार भी किया गया. झारखंड में सरकार के स्तर पर उद्घाटन और शिलान्यास का कोई कार्यक्रम रूका नहीं. हजारीबाग और रांची के आयोजन में तो प्रधानमंत्री ने भी हिस्सा लिया. भारतीय जनता पार्टी ने इस समय दूसरे दलों से आए नेताओं को भी बड़े तामझाम के  साथ अपनी पार्टी में शामिल करवाया. बीटोत्सव कार्यक्रम भी आराम से हुआ और सरकार का इटखोरी महोत्सव भी पूरे तामझाम से जारी है. लेकिन भाजपा और उससे जुडे अनुप्राशंगिक इकाइयों ने जेवियर कालेज में हो रहे आयोजन को जबरन रूकवा दिया. इसे रूकवाने में भाजपा के प्रवक्ता ने भी खासी दिलचस्पी ली और अवकाश के दिन रांची विश्वविद्यालय के कुलपति को समन किया और कुलपति प्रवक्ता के सामने हाजिर भी हुए. जबकि प्रवक्ता का पद सरकार नहीं होता है. इसके बाद जेवियरोत्सव का आयोजन रोक दिया गया. एक्सआईएसएस ने अपने पनाश कार्यक्रम को स्थगित कर दिया. तमाम आयोजनों के बीच भाजपा नेताओं ने केवल जेवियरोत्सव को बंद कराकर किस तरह की देशभक्ति का परिचय दिया है. इसका जबाव उन्हें देना चाहिए.

किसी भी शिक्षण संस्थान में किसी राजनीतिक दल का दखल बेहद गंभीर मामला है. यह बताता है कि निहित स्वार्थ को देशहित पर हावी होने दिया जा रहा है और संवाद के रास्ते को छोड़कर यह संदेश दिया जा रहा है कि वे ही देशभक्ति को परिभाषित करते हैं और उनसे असमत होना ही देशभक्ति के खिलाफ हो जाता है. यह मानसिकता किसी भी हालत में सही नहीं ठहराया जा सकता है. पुलवामा घटना के बाद रांची के तमाम नागरिकों ने इसका विरोध किया और अपने गुस्से का इजहार भी. इसमें शिक्षण संस्थानों ने भी अपनी भूमिका का प्रदर्शन किया. किसी एक शिक्षण को निशाना बनाने की कोशिश को उचित नहीं ठहराया जा सकता है.

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