Opinion

चीन सीमा पर तनाव: मोदी सरकार की बड़ी भूल

Soumitra Roy

आजादी के बाद से चीन के साथ अपने संबंधों पर अगर हम नजर डालें तो ऐसा क्या है कि जिसके आधार पर हम उन्हें रहस्यपूर्ण मानेंगे?

1962 में उन्होंने दो मोर्चों पर हमपर जो हमला किया, वह हमारे नेताओं के लिए एक सदमा रहा होगा. मगर इसकी वजह यह थी कि वे मतिभ्रम के शिकार थे.

उसके बाद से भारत के मामले में चीन का हर कदम यही बताता है कि वह रहस्यपूर्ण तो कतई नहीं रहा है, बल्कि वह क्या करेगा, इसका अनुमान लगाया जा सकता था.

चाहे यह 1965 में पाकिस्तान के साथ हमारी 22 दिन की जंग के दौरान चीन की यह धमकी रही हो कि ‘चुराए गए हमारे याक और भेड़ें लौटा दो!’ या इस साल लद्दाख सीमा पर उसकी कथित ‘आश्चर्यजनक’ हरकतें हों.

नाथु ला (सिक्किम) में 1967 में चीन का दबाव शायद भारत की मजबूती का अंदाजा लगाने के लिए किया गया था.

1986-87 में फिर चीन ने वांगदुंग-सुमदोरोंग चू (अरुणाचल) में हमें तब आजमाने की कोशिश की, जब उसने देखा कि राजीव गांधी ने भारत के रक्षा बजट को जीडीपी के 4 प्रतिशत के बराबर कर दिया था क्योंकि ‘ऑपरेशन ब्रासटैक्स’ के बाद भारत-पाकिस्तान ने तलवारें खींच ली थीं.

डॉ. मनमोहन सिंह जब प्रधानमंत्री थे, तब उन्होंने कहा था कि चीन भारत को हमेशा अस्थिर रखने के लिए पाकिस्तान को बड़ी सफाई से मोहरा बना रहा है. हमारा भविष्य इसपर निर्भर है कि हम इस ‘त्रिशूल’ का तोड़ निकालें.

लेकिन मोदी-भाजपा की राजनीति पाकिस्तान से ज्यादा चीन से सुलह को तरजीह देती है. चीन ने लद्दाख में जो कुछ किया है, उसको लेकर हमें हैरत में नहीं पड़ना चाहिए. इसका अनुमान हमें पिछले साल 5 अगस्त को ही लग जाना चाहिए था, जब हमने जम्मू-कश्मीर में भारी बदलाव किये थे. हम इस तथ्य से नावाकिफ नहीं थे कि वहां के भौगोलिक पेंच में एक तीसरा पक्ष चीन भी है.

गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में यह बयान देकर कोई भी रास्ता नहीं छोड़ा कि ‘हम अपनी जान की बाज़ी लगाकर भी अक्साई चीन को हासिल करके रहेंगे.’ इसके बाद नये नक्शे आए.

चीन की हालिया हरकत का अनुमान तभी लगा लेना चाहिए था और तैयारी भी तभी कर लेनी चाहिए थी, जब 5 अगस्त 2019 को चाल चली गई थी.

इन 60 वर्षों में जो कुछ हुआ है उन्हीं की तरह चीनी कदमों को भी अप्रत्याशित नहीं माना जा सकता. क्या अभी भी मोदी सरकार को बर्फ़ पिघलने का इंतज़ार है?

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