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टीडीएस घोटाला किया, उधार के पैसे से टीडीएस जमा किये और कंपनियों से पैसे भी नहीं वसूले

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Akshay Kumar Jha

Ranchi : जेबीवीएनएल के गठन से पहले 2009-10 में 15 करोड़ रुपये का टीडीएस घोटाला किया गया, यह तो विभाग की तरफ से साबित हो गया. लेकिन, घोटला कैसे किया गया और घोटाले को दबाने के लिए कैसे-कैसे पैंतरे अपनाये गये, यह चौंकाने वाली बात है. सबसे बड़ी बात कि सीएमडी के जांच के आदेश तक को जेबीवीएनएल के एमडी और जीएम एचआर ने दबा लिया. विधायक अरूप चटर्जी के सावलों के जवाब में विभाग ने साफ तौर से कहा है कि सीएमडी आरके श्रीवास्तव के जांच के आदेश के बाद भी कार्रवाई नहीं हुई. इस मामले में सबसे बड़े आरोपी तत्कालीन डायरेक्टर फाइनेंस उमेश कुमार हैं, जो अब जेबीवीएनएल में फाइनेंस कंट्रोलर हैं. इस मामले को लेकर उन्हें दोबार शो-कॉज तक किया गया है. अपने शो-कॉज के जवाब में उन्होंने ऐसी-ऐसी बातें लिखी हैं, जिनसे समझा जा सकता है कि चार कंपनियों से बिना टीडीएस की राशि लिये उन्हें टीडीएस सर्टिफिकेट क्यों थमा दिया गया और कैसे विभाग के फंड की ही राशि से इनकम टैक्स में पैसे जमा करा दिये गये.

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जानिये किन कंपनियों को मिली लूट की छूट

विभाग की तरफ से चार कंपनियों को 2006-07 में ग्रामीण इलाकों में विद्युतीकरण का काम मिला था. इनकी फाइल 10 साल के बाद भी बंद नहीं हुई है. बंद हो भी कैसे, फाइलें तभी बंद होंगी, जब टीडीएस की राशि उनसे वसूली जायेगी. अभी तक राशि की वसूली नहीं हुई है. बता दें कि इन चार कंपनियों में एक कंपनी ऐसी भी है, जो अभी भी जेबीवीएनएल के साथ काम कर रही है. लेकिन, बोर्ड की तरफ से कभी भी उस कंपनी से पैसे वसूलने की कोशिश नहीं की गयी. वे चार कंपनियां ये हैं- NECCON (बकाया राशि  2,52,00,000 रुपये), ATSL (बकाया राशि 3,39,00,000 रुपये), NCCL (बकाया राशि 1,91,00,000 रुपये), IVRCL (बकाया राशि 7,12,00,000 रुपये). इन चार कंपनियों में NCCL एक ऐसी कंपनी है, जो अभी भी जेबीवीएनएल के लिए काम कर रही है. लेकिन जेबीवीएनएल ने कभी भी इस कंपनी से 1,91,00,000 रुपये की राशि वसूलने की कोशिश नहीं की.

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शो-कॉज में कहा इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने मौखिक रूप से मांगा था टीडीएस

विभाग की तरफ से तत्कालीन डायरेक्टर फाइनेंस उमेश कुमार को मामले को लेकर शो-कॉज किया गया. शो-कॉज में उमेश कुमार का कहना है कि इनकम टैक्स डिपार्टमेंट की तरफ से उन्हें मौखिक रूप से टीडीएस जमा कराने को कहा गया, इसलिए उन्होंने इनकम टैक्स को उन्होंने टीडीएस का पैसा जमा कर दिया. कहा कि इनकम टैक्स के अधिकारियों का मौखिक रूप से कहना था कि अगर इनकम टैक्स डिपार्टमेंट लिखित रूप से टीडीएस का पैसा जमा करने को कहता, तो जुर्माना भी वसूलता. ऐसे में उन्होंने इनकम टैक्स का मौखिक आदेश मानकर विभाग के पैसे बचाये हैं.

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जिस राशि पर दे रहे हैं ब्याज, वही राशि इनकम टैक्स डिपार्टमेंट को दी

इस पूरे प्रकरण में सबसे दिलचस्प बात यह है कि इनकम टैक्स डिपाटर्मेंट को जो टीडीएस की राशि जमा की गयी है, वह ग्रामीण विद्युतीकरण योजना मद से की गयी है. जबकि, इस योजना के लिए जो राशि इस्तेमाल हो रही थी, वह लोन की राशि थी. मतलब इस राशि के एवज में राज्य सरकार ब्याज दे रही थी. तत्कालीन डायरेक्टर उमेश कुमार ने एक ऐसी राशि इनकम टैक्स में टीडीएस के रूप में जमा करवा दी, जिस पर ब्याज लग रहा है.

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सप्लाई पर नहीं कटता है टीडीएस, तो क्यों जमा करायी राशि

इस पूरे प्रकरण में यह साफ है कि विभाग के अधिकारियों ने आर्थिक लाभ लेने के लिए कंपनियों को फायदा पहुंचाने की कोशिश की है. मामले ने जब तूल पकड़ा, तो तत्कालीन फाइनेंस डायरेक्टर उमेश कुमार ने महाधिवक्ता से भी राय मांगी. महाधिवक्ता की राय में भी कहा गया है कि उन्होंने गलत किया है. महाधिवक्ता ने कहा है कि इनकम टैक्स एक्ट की धारा 194 (c) के मुताबिक सप्लाई पर टीडीएस नहीं लगता है. अगर ऐसा किया गया है, तो गलत किया है. ऐसे में सवाल उठता है कि किस आधार पर इनकम टैक्स को करीब 15 करोड़ रुपये टीडीएस के रूप में जमा किये गये हैं.

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