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हावड़ा ब्रिज से लेकर सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट तक में टाटा स्टील के इस्पात का इस्तेमाल, भारत को आर्थिक आजादी दिलाने में अग्रणी रही है यह कंपनी, पढ़ें वि‍स्‍तार से

Sanjay Prasad
Jamshedpur:  देश के विकास में टाटा स्टील अग्रणी रहा है. टाटा स्टील सही मायने में पहला भारतीय उद्यम और संगठन है, जिसकी नींव में राष्ट्र निर्माण है. संस्थापक जेएन टाटा ने देश के लिए एक स्टील प्लांट की कल्पना की थी, तो यह भारत के औद्योगिक आधार को मजबूत करने के उनके दृढ़ विश्वास पर बनाया गया था. वैसे तो टाटा स्टील का इतिहास आजादी से पहले का है. कंपनी ने 100 वर्षों से जो काम किया है वह हमेशा देश और उसके लोगों की सेवा के लिए किया है. देश भर में प्रतिष्ठित संरचनाओं और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए स्टील प्रदान करने पर टाटा स्टील को गर्व है. हावड़ा ब्रिज से लेकर मुंबई सी लिंक तक, भाखड़ा-नांगल बांधों को पनबिजली के लिए मजबूत करने से लेकर सौर ऊर्जा संग्रहित करने के पैनल के निर्माण तक, विश्व स्तरीय हवाई अड्डों और महानगरों से लेकर अत्याधुनिक स्टेडियमों तक में टाटा स्टील का योगदान रहा है. इसके स्टील का उपयोग अब सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के निर्माण के साथ-साथ नए संसद भवन में हो रहा है, जो भारत के लोकतंत्र और गौरव के प्रतीक के निर्माण के लिए किया जा रहा है.
कर्मचारी सशक्तिकरण में आगे रहा है टाटा स्टील


टाटा स्टील ने हमेशा एक ऐसे संगठन के निर्माण में विश्वास किया है जो कर्मचारी सशक्तिकरण और उच्च स्तर के प्रदर्शन से प्रेरित हो. टाटा स्टील ने कार्यबल के विभिन्न वर्गों के लिए कई पथ-प्रदर्शक नीतियों और अभ्यासों को अपनाया हैं, जिससे संगठन के भीतर उत्पादकता और जुड़ाव बढ़ा है. टाटा स्टील स्वतंत्रता के गौरवशाली 100 वें वर्ष की ओर मजबूती से अग्रसर हैं और टाटा स्टील हमारी सामूहिक उपलब्धियों में योगदान देने और जश्न मनाने के लिए मौजूद रहेगी.

आत्मनिर्भर राष्ट्र के विचार ने जेएन टाटा को स्टील प्लांट स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित किया

Sanjeevani


भारत में स्वदेशी आंदोलन की शुरुआत 1900 में हुई थी. इसने भारत में बने उत्पादों की मांग बढ़ाने के लिए आयातित वस्तुओं के बहिष्कार को प्रोत्साहित किया. भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक भाग के रूप में यह आत्मनिर्भरता के सिद्धांतों के माध्यम से भारत में आर्थिक स्थितियों में सुधार करने के साथ-साथ यह साबित करने के लिए एक सफल आर्थिक रणनीति थी कि भारतीयों के पास खुद के लिए उत्पादन करने, प्रबंधित करने और आत्मनिर्भर होने के लिए सबकुछ है. बाजार को भी बढ़ावा की जरूरत है जो भारतीय व्यापार और उद्यम को प्रोत्साहित करे. इस आंदोलन ने भारतीय उद्योग को जबरदस्त प्रोत्साहन दिया, जिससे स्वदेशी नमक, चीनी और अन्य उत्पादों के निर्माण का रास्ता खुल गया. स्वदेशी आंदोलन ने जमशेदजी नसरवानजी टाटा को एशिया का पहला निजी स्वामित्व वाला एकीकृत लौह एवं इस्पात संयंत्र स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित किया. लोहे के निर्माण में उनकी रुचि 1882 में तब शुरू हुई जब उन्हें चंदा जिले की एक आधिकारिक रिपोर्ट मिली, जिसमें उच्च गुणवत्ता वाले लौह अयस्क के बड़े भंडार की पहचान की गई थी. लेकिन इस क्षेत्र में उपयुक्त कोयले की कमी का भी उल्लेख किया गया था.

1907 में हुई ट‍िस्‍को की स्‍थापना


अपने देश को अपना लौह एवं इस्पात उद्योग देने के उनके विचार को सरकार से भी समर्थन मिला और 1907 में जब स्वदेशी आंदोलन अपने चरम पर था, टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी लिमिटेड की स्थापना हुई. टाटा ने भारत के भीतर इस्पात संयंत्र बनाने के लिए वित्त जुटाया. यह भारतीय आर्थिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर था. उन्होंने तत्कालीन ब्रिटिश सरकार को साबित कर दिया कि एक भारतीय कंपनी के पास जमीनी स्तर से एक उद्योग निर्मित करने के लिए दूरदृष्टि और साधन था और स्थानीय जरूरतों को पूरा करने के लिए अंतरराष्ट्रीय मानकों को लागू करने का ज्ञान भी. टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी लिमिटेड की स्थापना ने भारतीय उद्योग को आवाज दी और भविष्य के कई उद्यमों के लिए मार्ग प्रशस्त किया.

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